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'पुलिस और अभियोजन हमेशा रिमांड की मांग करेंगे, ऐसे आवेदनों पर विवेकपूर्ण तरीके से फैसला करें': मद्रास हाईकोर्ट ने फेसबुक पोस्ट मामले में रिमांड देने से इनकार करने के मजिस्ट्रेट के फैसले की सराहना की

LiveLaw News Network
22 Dec 2021 7:09 AM GMT
पुलिस और अभियोजन हमेशा रिमांड की मांग करेंगे, ऐसे आवेदनों पर विवेकपूर्ण तरीके से फैसला करें: मद्रास हाईकोर्ट ने फेसबुक पोस्ट मामले में रिमांड देने से इनकार करने के मजिस्ट्रेट के फैसले की सराहना की
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मद्रास हाईकोर्ट (मदुरै बेंच) ने एक मजाकिया फेसबुक पोस्ट को लेकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के एक पदाधिकारी के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द करते हुए आदेश में कहा कि पुलिस और अभियोजन हमेशा हिरासत की मांग करेंगे और यह मजिस्ट्रेट पर है कि वह सीआरपीसी की धारा 41 और संविधान के अनुच्छेद 21 के आधार पर ऐसे आवेदनों पर विवेकपूर्ण तरीके से फैसला करें।

जस्टिस जीआर स्वामीनाथन ने 62 वर्षीय आरोपी के खिलाफ एफआईआर को रद्द करते हुए कहा कि वाडीपट्टी पुलिस की ओर से दर्ज किया गया 'राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने की तैयारी' का मामला 'बेतुका और कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग' है।

कोर्ट ने कहा,

"मैं चाहता हूं कि तमिलनाडु राज्य के अन्य मजिस्ट्रेट भी ऐसा ही करें। रिमांड मांगने के लिए कभी भी रिमांड नहीं लिया जा सकता है। पुलिस और अभियोजन पक्ष हर मामले में रिमांड की मांग करेंगे। यह मजिस्ट्रेट को खुद को विचार करना है कि गिरफ्तार व्यक्ति को रिमांड को पर भेजना है या नहीं। रिमांड के अनुरोधों का निर्णय सीआरपीसी की धारा 41 और संविधान के अनुच्छेद 21 की कसौटी पर किया जाना चाहिए। एम. सी.आर.यू. (न्यायिक मजिस्ट्रेट, वाडीपट्टी) द्वारा इतनी अच्छी तरह से प्रदर्शित विवेकपूर्ण आचरण के लिए धन्यवाद।"

वाडिपेट्टी पुलिस ने अन्य आरोपों के साथ 'राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने' के आरोप में मामला दर्ज करने के बाद याचिकाकर्ता आरोपी को गिरफ्तार कर न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया था।

याचिकाकर्ता पर आईपीसी की धारा 120बी, 122, 505(1)(बी) और 507 के तहत भी आरोप लगाए गए थे।

मजिस्ट्रेट ने राज्य बनाम नकीरन गोपाल (2019) पर भरोसा जताया और आरोपी की रिमांड देने से इनकार करते हुए एक विस्तृत आदेश पारित किया।

अदालत ने पाया कि न्यायिक मजिस्ट्रेट ने रिमांड से इनकार कर दिया था और प्राथमिकी 'बेतुकी और कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग' था।

न्यायमूर्ति जीआर स्वामीनाथन ने आदेश में कहा,

"जुग सुरैया, बच्ची करकारिया, ईपी उन्नी और जी संपत .. अगर किसी व्यंग्यकार या कार्टूनिस्ट ने इस फैसले को लिखा होता तो वे संविधान के अनुच्छेद 51-ए में उप-खंड (एल) को शामिल करने के लिए एक महत्वपूर्ण संशोधन का प्रस्ताव देते।.... इसमें काल्पनिक लेखक ने एक और मौलिक कर्तव्य जोड़ा होता- हंसने का कर्तव्य।"

कोर्ट ने कहा कि मजाकिया होने का सहसंबंध अधिकार "संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) में देखा जा सकता है"।

यह देखते हुए कि 'मजाकिया होना' और 'दूसरे का मज़ाक उड़ाना' अलग है, अदालत ने अलंकारिक रूप से कहा कि "किस पर हंसें?" यह एक गंभीर प्रश्न है। कोर्ट ने यह भी बताया कि भारत की क्षेत्रीय विविधता की पृष्ठभूमि में यह प्रश्न प्रासंगिक क्यों हो जाता है।

कोर्ट ने आदेश में कहा,

" यह इसलिए है क्योंकि हमारे यहां वाराणसी से वाडीपट्टी तक कई पवित्र चीजें हैं। कोई उनका मजाक उड़ाने की हिम्मत नहीं करता। हालांकि पवित्र चीजों की एक भी सूची नहीं है। यह हर व्यक्ति और क्षेत्र से क्षेत्र में भिन्न होती है। पश्चिम बंगाल में, टैगोर एक ऐसी प्रतिष्ठित शख्सियत हैं कि खुशवंत सिंह ने किसी कीमत पर सबक सीखा। मेरे अपने तमिल राज्य में आकर, सर्वकालिक आइकनोक्लास्ट "पेरियार" श्री.ईवीआरमासामी एक परम पवित्र हैं। आज के केरल में, मार्क्स और लेनिन आलोचना या व्यंग्य की सीमा से परे हैं। छत्रपति शिवाजी और वीर सावरकर को महाराष्ट्र में समान प्रतिरक्षा प्राप्त है, लेकिन पूरे भारत में सबसे महत्वपूर्ण जो है वह राष्ट्रीय सुरक्षा है।"

केस का शीर्षक: मथिवनन बनाम पुलिस निरीक्षक एंड अन्य।

केस नंबर: Crl OP(MD)No.18337 of 2021 and Crl (MD)No.10063 of 2021

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