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'पक्षकार शिक्षित और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक': राजस्थान हाईकोर्ट ने आपसी सहमति से तलाक के लिए छह महीने का कूलिंग पीरिडय माफ किया

LiveLaw News Network
18 Jan 2022 12:46 PM GMT
पक्षकार शिक्षित और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक: राजस्थान हाईकोर्ट ने आपसी सहमति से तलाक के लिए छह महीने का कूलिंग पीरिडय माफ किया
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राजस्थान हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता-पत्नी और प्रतिवादी-पति द्वारा दायर एक संयुक्त आवेदन को आपसी सहमति से तलाक के लिए हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13-बी (2) के तहत निर्धारित छह महीने के कूलिंग ऑफ पीरियड (वैधानिक अवधि) की छूट के लिए अनुमति दी।

जस्टिस दिनेश मेहता ने कहा,

"मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आलोक में विशेष रूप से तथ्य यह है कि पक्षकार पर्याप्त रूप से शिक्षित हैं और अपने अधिकारों के बारे में जानते हैं। उन्होंने पारस्परिक रूप से अपने विवाह को समाप्त करने का फैसला किया है, सुलह की कोई उम्मीद नहीं है। मेरी यह राय है कि 1955 के अधिनियम की धारा 13-बी (2) के तहत निर्दिष्ट छह महीने की वैधानिक अवधि की छूट के लिए उनका आवेदन स्वीकार करने योग्य है।"

पक्षकारों ने फैमिली कोर्ट, भीलवाड़ा द्वारा पारित आदेश से व्यथित होने के बाद अदालत का दरवाजा खटखटाया था। फैमिली कोर्ट ने 16 दिसंबर, 2021 को पक्षकारों की उक्त प्रार्थना को खारिज कर दिया था।

पक्षकारों का विवाह 25.11.2003 को मंडलगढ़, भीलवाड़ा में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। शादी के कुछ समय बाद ही दोनों के रिश्ते में खटास आ गई और पिछले चार साल से दोनों अलग-अलग रह रहे हैं। तत्पश्चात, वैवाहिक संबंधों को बहाल करने के सर्वोत्तम प्रयास किए गए और उनके करीबी रिश्तेदारों द्वारा नियमित परामर्श के बावजूद, उनके बीच वैवाहिक विवाद को सुलझाया नहीं जा सका।

नतीजतन पक्षकारों ने संयुक्त रूप से आपसी सहमति से फैमिली कोर्ट में तलाक का आवेदन दायर किया। फैमिली कोर्ट ने बदले में उक्त आवेदन को पंजीकृत किया और काउंसलिंग के लिए अगली तारीख 20 जनवरी, 2022 तय की।

पक्षकारों के वकीलों ने प्रस्तुत किया कि पक्षकारों द्वारा अपनी शादी को समाप्त करने का निर्णय जल्दबाजी में नहीं लिया गया और पक्षकारों के बीच सुलह की संभावना बहुत कम है।

यह ध्यान दिया जा सकता है कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 बी (2) में आपसी सहमति से तलाक की याचिका दायर करने के बाद छह महीने से पहले तलाक देने पर रोक है।

हाईकोर्ट ने कहा कि पक्षकारों की याचिका स्वीकार करने योग्य है, क्योंकि पक्षकार पर्याप्त रूप से शिक्षित हैं और अपने अधिकारों से अवगत हैं। प्रतिवादी (पति) एक दुकान भी चला रहा है। इस संबंध में अदालत ने यह भी देखा कि पक्षकारों ने सुलह की कोई उम्मीद/मौका न मिलने के बाद पारस्परिक रूप से अपने वैवाहिक संबंध को समाप्त करने का निर्णय लिया।

यह आदेश न्यायालय द्वारा भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के आधार पर उपलब्ध असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए जारी किया गया।

अदालत ने अमरदीप सिंह बनाम हरवीन कौर के मामले में निर्धारित शर्तों पर भरोसा किया, जहां सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 13-बी (2) के तहत अवधि अनिवार्य नहीं बल्कि निर्देशिका है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह न्यायालय के लिए खुला होगा कि वह प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में अपने विवेक का प्रयोग करे, जहां पक्षकारों के सहवास फिर से शुरू करने की कोई संभावना नहीं है और जहां वैकल्पिक पुनर्वास की संभावना है।

अदालत ने पक्षकारों को 20 जनवरी, 2022 को फैमिली कोर्ट के सामने पेश होने का निर्देश दिया, जिसके बाद संबंधित फैमिली कोर्ट कानून के अनुसार तलाक का फैसला सुनाएगा।

केस शीर्षक: शीला धोबी बनाम सतीश

प्रशस्ति पत्र: 2022 लाइव लॉ (राज) 19

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