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पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने नए लाॅ कॉलेज खोलने पर बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा लगाए प्रतिबंध रद्द किये

LiveLaw News Network
23 Dec 2020 12:49 PM GMT
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने नए लाॅ कॉलेज खोलने पर बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा लगाए प्रतिबंध रद्द किये
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पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) द्वारा नए लॉ कॉलेज खोलने पर लगाए गए तीन साल के स्थगन/प्रतिबंध को रद्द कर दिया है क्योंकि यह भारतीय संविधान के अल्ट्रा वायर्स/शक्ति से बाहर है।

न्यायमूर्ति रेखा मित्तल की एकल पीठ ने 4 दिसंबर 2020 को दिए एक फैसले में कहा है कि बीसीआई कानूनी शिक्षा को विनियमित करने के बहाने नए लॉ कॉलेज खोलने पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगा सकता है।

आदेश में कहा गया है कि,''इसमें कोई संदेह नहीं है, बीसीआई दिशानिर्देश/सर्कुलर आदि जारी कर सकता है। वहीं नए काॅलेज खोलने की मंजूरी देते समय या देशभर में पहले से ही विद्यमान कानूनी शिक्षा देने वाले काॅलेजों/संस्थानों पर इनके अनुपालन के साथ-साथ ही 2008 के नियमों के पालन के लिए दबाव दे सकता है। परंतु इन सभी नियमों के बहाने कानूनी शिक्षा प्रदान करने के लिए नए संस्थान खोलने पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगा सकता है।''

पृष्ठभूमि

कोर्ट चंडीगढ़ एजुकेशन सोसाइटी द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें कोर्ट से मांग की गई थी कि उनको एक नया लॉ कॉलेज यानी 'चंडीगढ़ लॉ कॉलेज' नाम से काॅलेज स्थापित करने की अनुमति दी जाए। उन्होंने कोर्ट से यह भी मांग की थी कि बीसीआई द्वारा लगाए गए प्रतिबंध को भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (जी) के तहत किसी भी पेशे का अभ्यास करने या कोई भी कारोबार, व्यापार या बिजनेस को करने के मौलिक अधिकार का उल्लंघन घोषित किया जाए।

याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया कि उन्होंने 15 जनवरी 2018 को लॉ कॉलेज की स्थापना के लिए जमीन खरीदी थी। उन्होंने आगे कहा कि उन्होंने अकादमिक सत्र 2020-21 से 240 छात्रों को दाखिला देकर एक नया कॉलेज शुरू करने का लक्ष्य रखा है। उन्होंने एक लैंड यूज चेंज रिपोर्ट (सीएलयू) भी प्राप्त कर ली है और बुनियादी ढांचे का निर्माण शुरू कर दिया है और पंजाब विश्वविद्यालय से संबद्धता भी प्राप्त कर ली है। वहीं राज्य सरकार से अनापत्ति प्रमाण पत्र भी प्राप्त कर लिया गया है। लेकिन, बीसीआई ने अभी भी उन्हें लॉ कॉलेज की स्थापना के लिए कानूनी शिक्षा नियम, 2008 के तहत आवश्यक अनुमति नहीं दी है।

याचिकाकर्ता ने जोर देकर कहा कि बीसीआई के पास एडवोकेट्स एक्ट 1961 की धारा 7 (1) (एच) के तहत कोई शक्ति नहीं थी कि वह नए लॉ कॉलेजों की स्थापना पर रोक लगा सके। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि यह धारा केवल काउंसिल को शिक्षा के मानक को निर्धारित करने का अधिकार देती है और उनका पालन लॉ कॉलेजों को करना होता है। याचिकाकर्ता के वकील ने आगे कहा, ''एक तरफ, बीसीआई सोसायटी के आवेदन पर कोई निर्णय नहीं कर रही है, लेकिन साथ ही, बीसीआई ने याचिका लंबित होने के बावजूद उनसे पैसे जमा करने के लिए कहा है।''

प्रतिवादियों के वकील ने तर्क दिया कि स्थगन केवल मौजूदा कानूनी शिक्षा संस्थानों के मानकों में सुधार के हित में लगाया गया था। वकील ने आगे कहा, ''शैक्षणिक संस्थानों को चलाने को नियमों/ अधिसूचनाओं/ दिशानिर्देशों और सर्कुलर आदि के माध्यम से कानूनी रूप से नियमित किया जा सकता है।''

निष्कर्ष

न्यायालय ने कहा कि काउंसिल एडवोकेट्स एक्ट के किसी भी ऐसे प्रावधान का उल्लेख करने में विफल रही है जो इसे किसी भी नए लाॅ कालेज की स्थापना पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का अधिकार देता हो। न्यायालय ने यह भी नोट किया कि काउंसिल यह भी बताने में विफल रही है कि आज तक कोई भी ऐसा कानून संस्थान है,जिसे बीसीआई द्वारा जारी किए गए सर्कुलर या उनके द्वारा निर्धारित कानूनी शिक्षा के मानक का पालन न करने के चलते बंद किया गया हो।

कोर्ट ने माना कि,"यदि कानूनी शिक्षा/लॉ कॉलेजों/ लॉ संस्थानों के मौजूदा केंद्र बीसीआई या बीसीआई द्वारा जारी दिशा-निर्देशों और सर्कुलर का पालन करने में विफल रहे हैं या बीसीआई समय पर निरीक्षण रिपोर्ट या निर्धारित जानकारी आदि भेजने के निर्देश का अनुपालन सुनिश्चित कराने में विफल रहा है तो ऐसी स्थिति में बीसीआई भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (जी) के तहत मौलिक अधिकार ( जो किसी भी पेशे का अभ्यास करने, या किसी कारोबार, व्यापार या बिजनेस को करने के लिए नागरिकों के अधिकार से संबंधित है) का उल्लंघन करते हुए नए लाॅ कालेजों की स्थापना पर पूर्ण प्रतिबंध लगाकर कानूनी शिक्षा के मानकों के रखरखाव को सुनिश्चित करने में अपनी विफलता को सही नहीं ठहरा सकता है।''

टीएमए पाई फाउंडेशन बनाम कर्नाटक राज्य मामले में दिए गए फैसले का संदर्भ दिया गया,जिसमें माना गया था कि शैक्षणिक संस्थान स्थापित करना एक मौलिक अधिकार है।

न्यायालय ने व्यक्त किया कि बीसीआई के पास यह सुनिश्चित करने के लिए कोई भी सर्कुलर या दिशानिर्देश जारी करने का अधिकार था कि कानून संस्थान या कानूनी शिक्षा के केंद्र कुछ मानकों का पालन करें, लेकिन इसके लिए कानूनी शिक्षा प्रदान करने वाले नए संस्थानों को खोलने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का अधिकार नहीं है।

वर्तमान मामले पर कोर्ट ने बीसीआई को निर्देश दिया है कि वह याचिकाकर्ता द्वारा दायर किए गए आवेदन पर जल्दी से कोई निर्णय ले, जो कि तीन महीने की अवधि के भीतर ले लिया जाए।

वहीं न्यायमूर्ति मित्तल ने इस फैसले में अलग से टिप्पणी करते हुए कहा कि

,''मैं यह व्यक्त करना चाहूंगी कि बीसीआई को कानूनी शिक्षा के मानक को बनाए रखने के मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। कानूनी पेशे में प्रवेश करने वाले कई नवयुवक याचिकाओं का मसौदा तैयार करने या न्यायालय की मदद करने में खरे नहीं उतरते हैं।

उनमें से कुछ अदालत की भाषा बोलने में भी पर्याप्त आश्वस्त नहीं हैं। बीसीआई कानून के छात्रों को वास्तविक अर्थ और सेंस में व्यावहारिक प्रशिक्षण सुनिश्चित करने के लिए कदम उठा सकता है। वहीं कानूनी शिक्षा के केंद्रों द्वारा बीसीआई के निर्देशों, दिशानिर्देशों, रूल्स 2008 आदि का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए एक पोर्टल या/ और नोडल एजेंसी बनाने पर भी विचार कर सकता है।''

केस का शीर्षकः चंडीगढ़ एजुकेशनल सोसाइटी बनाम बार काउंसिल ऑफ इंडिया व अन्य

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