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"शक्तियां आभूषण नहीं हैं": दिल्ली हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग से 'वोट के बदले नकद' की प्रैक्टिस को रोकने के लिए उठाए गए कदमों के बारे में पूछताछ की

LiveLaw News Network
15 Sep 2021 11:57 AM GMT
शक्तियां आभूषण नहीं हैं: दिल्ली हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग से वोट के बदले नकद की प्रैक्टिस को रोकने के लिए उठाए गए कदमों के बारे में पूछताछ की
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दिल्ली हाईकोर्ट ने चुनावों के दौरान वोट के बदले नकद की पेशकश करने वाले राजनीतिक दलों की कथित प्रैक्टिस के खिलाफ एक जनहित याचिका पर चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है।

चीफ जस्टिस डीएन पटेल और जस्टिस ज्योति सिंह की खंडपीठ ने आयोग से यह जानना चाहा कि एस सुब्रमण्यम बालाजी बनाम तमिलनाडु राज्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले ही प्र‌तिबंध‌ित ऐसी गतिविधियों को रोकने के लिए चुनाव आयोग ने क्या कदम उठाए हैं।

बेंच ने आयोग से कहा, "शक्तियां आभूषण नहीं हैं। आप जनता के कल्याण के लिए अपने अधिकारों का प्रयोग करें।"

कोर्ट ने आगे जोड़ा, "अगर कोई पार्टी झूठे वादे कर रही है, जो कानून के खिलाफ है तो आपने क्या कार्रवाई की है? यह जानते हुए भी कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देश हैं, आप लोग खामोश बैठे हैं।"

याचिकाकर्ता पाराशर नारायण शर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सौम्या चक्रवर्ती ने दलील दी कि चुनाव घोषणापत्र में बिना किसी श्रम/कार्य के बदले नकदी देने का वादा करना अवैध है।

इस संबंध में, उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की 'न्यूनतम आय योजना ' (न्यूनतम आय सहायता योजना) का उल्लेख किया, जिसमें कथित तौर पर किसी भी प्रयास के बावजूद 72,000 वार्षिक नकद लाभ की पेशकश की गई थी। उन्होंने 2019 के चुनावी घोषणापत्र में तेलुगु देशम पार्टी द्वारा किए गए कुछ वादों का भी हवाला दिया।

उन्होंने कहा कि इस तरह की प्रैक्टिस जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123 ( भ्रष्ट आचरण ) की भावना के खिलाफ है। यह चुनाव आयोग की आदर्श आचार संहिता के विपरीत है और सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन है।

इसलिए उन्होंने एक घोषणा की मांग की कि चुनावी घोषणापत्र में राजनीतिक दलों द्वारा नकद हस्तांतरण / मुफ्त की वस्तुओं की पेशकश एक भ्रष्ट चुनावी प्रैक्टिस है और भारत के संविधान के खिलाफ है।

याचिका में कहा गया, "जब तक मुफ्त की वस्तुओं की आड़ में नकदी देने की बढ़ती प्रवृत्ति को असंवैधानिक और अवैध घोषित नहीं किया जाता है, तब तक सभी राजनीतिक दल इसे दोहराएंगे, जो न केवल दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्‍था का मजाक उड़ाएगा, बल्‍कि यह देश की अर्थव्यवस्था, उद्योग और कृषि को भी बर्बाद कर देगा।"

चुनाव आयोग की ओर से पेश एडवोकेट अंजना गोसाईं ने पीठ को सूचित किया कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान मुफ्त उपहार देने के खिलाफ चुनाव आयोग ने उचित दिशा-निर्देश तैयार किए हैं, और यह सुब्रमण्यम बालाजी मामले (सुप्रा) के अनुपालन में है।

हालांकि, बेंच ने व्यक्त किया कि प्राधिकरण के लिए केवल नोटिस और दिशानिर्देश जारी करना पर्याप्त नहीं है, और उसे गलती करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए।

मामले की सुनवाई अब 24 सितंबर को तय की गई है। चुनाव आयोग को एक हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया है, जिसमें इस दिशा में उठाए गए कदमों और प्रस्तावित कार्रवाई, यदि कोई हो, का उल्लेख किया गया है।

केस शीर्षक: पाराशर नारायण शर्मा बनाम यूनियन ऑफ इं‌डिया

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