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"पुलिस ने अपने अधिकार क्षेत्र के बाहर जाकर काम किया" : केरल हाईकोर्ट ने बलात्कार के आरोपी 7 साल से कम उम्र के बच्चों के ख़िलाफ़ आपराधिक सुनवाई स्थगित की

LiveLaw News Network
12 May 2020 4:30 AM GMT
पुलिस ने अपने अधिकार क्षेत्र के बाहर जाकर काम किया : केरल हाईकोर्ट ने बलात्कार के आरोपी 7 साल से कम उम्र के बच्चों के ख़िलाफ़ आपराधिक सुनवाई स्थगित की
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केरल हाईकोर्ट ने बलात्कार के एक मामले में जुवेनाइल जस्टिस अधिनियम के उल्लंघन पर कड़ा रुख अपनाते हुए सात साल से कम उम्र के तीन बच्चों के ख़िलाफ़ आपराधिक सुनवाई को स्थगित कर दिया। अदालत ने सभी संबंधित अधिकारियों से इस मामले को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के समक्ष पेश करने को कहा है।

इस मामले को एक रिट याचिका द्वारा हाईकोर्ट के संज्ञान में लाया गया जिसमें आरोपी बच्चों के ख़िलाफ़ मामले को आईपीसी की धारा 82 के तहत "अपराध करने की स्थिति में नहीं होने" के आधार पर निरस्त करने की मांग की गई।

इस मामले में सात साल से कम उम्र के तीन बच्चों के ख़िलाफ़ उसी उम्र की एक बच्ची के साथ बलात्कार का आरोप लगाया गया है।

वीडियो कंफ्रेंसिंग के माध्यम मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बेचू कुरीयन थोमस यह जानकर विस्मित थे कि इन बच्चों को न केवल जुवेनाइल जस्टिस अधिनियम, 2015 के तहत जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के समक्ष नहीं पेश किया गया बल्कि संबंधित एसएचओ ने इन बच्चों को पहचान परेड के लिए भी बुलाया।

अदालत ने कहा,

" हालांकि, पीडिता की पीड़ा को अदालत समझती है, लेकिन फिर भी क़ानून से उलझे बच्चों के ख़िलाफ़ जेजे अधिनियम के तहत कार्रवाई होनी है न कि किसी ख़ूंख़ार अपराधी की तरह।"

अधिकारियों के इस अक्षम्य व्यवहार पर नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए न्यायमूर्ति थोमस ने कहा कि क़ानून से उलझने वाले बच्चों को आवश्यक रूप से जेजे अधिनियम के तहत कार्रवाई होनी चाहिए।

अदालत ने कहा,

"…जब क़ानून से उलझने पर किसी बच्चे को आईपीसी या किसी अन्य क़ानून के तहत पकड़ा जाता है, तो जो अधिकारी उस बच्चे को पकड़ता है उसे जेजे अधिनियम की धारा 10 के तहत प्रावधानों का पालन करना होता है, लेकिन इस मामले में इस अदालत को यह देखकर गहरा दुःख हुआ है कि एसएचओ, जो कि इस मामले में चौथा प्रतिवादी है, उसने प्रतिवादी के साथ-साथ अन्य बच्चों को फ़ोटो के साथ अपने सामने हाज़िर होने और पहचान परेड में शामिल होने को कहा। इन बच्चों को अभी तक बोर्ड के समक्ष पेश नहीं किया गया है। अगर यह बात सही है, तो यह अक्षम्य है।"

अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया एसएचओ ने अपने अधिकार क्षेत्र के बाहर जाकर काम किया विशेषकर उसने जेजे अधिनियम का उल्लंघन किया है।

अदालत ने कहा कि इस कथित अपराध को हुए छह माह बीत चुके हैं, लेकिन इन बच्चों को अभी तक जेजे बोर्ड के समक्ष पेश नहीं किया गया है। यह परेशान करने और अधिकारों के दुरुपयोग का मामला है।

अदालत ने कहा,

"इस मामले में सभी तरह की अगली कार्रवाई पर अंतरिम स्थगन लागू होगा और चौथे प्रतिवादी को निर्देश दिया जाता है कि वह इस मामले के रिकॉर्ड को जेजे बोर्ड के समक्ष बिना किसी और देरी के रखे…।"

अन्य बातों के अलावा अदालत ने अभियोजन महानिदेशक को कहा है कि वह इस मामले के बारे में निर्देश प्राप्त करें और अलपुझा ज़िले के पोक्सो मामलों के विशेष लोक अभियोजक की राय को इस अदालत के समक्ष 20 मई 2020 तक एक सील कवर में पेश करे। पुलिस ने इसी अधिकारी की सलाह पर यह कार्रवाई की है।

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