CJP कैंपेन के बीच राजस्थान और यूपी में सरकारी स्कूलों में एंट्री पर लगी रोक को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती

Shahadat

25 Aug 2026 9:05 PM IST

  • CJP कैंपेन के बीच राजस्थान और यूपी में सरकारी स्कूलों में एंट्री पर लगी रोक को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती

    सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका (PIL) में राजस्थान और उत्तर प्रदेश के शिक्षा अधिकारियों द्वारा सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों, पत्रकारों, YouTubers, सोशल-मीडिया यूज़र्स और सिविल-सोसाइटी के प्रतिनिधियों के प्रवेश पर लगाई गई पाबंदियों को चुनौती दी गई। साथ ही फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, इंटरव्यू, ऑडियो रिकॉर्डिंग और लाइव-स्ट्रीमिंग पर लगाई गई रोक को भी चुनौती दी गई।

    यह याचिका 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) द्वारा सरकारी स्कूलों के इंफ्रास्ट्रक्चर में कमियों को उजागर करने के लिए चलाए जा रहे "स्कूल ठीक करो" कैंपेन के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाती है।

    प्रिया मिश्रा द्वारा दायर इस याचिका को मंगलवार को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने तत्काल सुनवाई के लिए पेश किया गया। याचिकाकर्ता की ओर से वकील नरेंद्र मिश्रा ने कहा कि राज्य अधिकारियों द्वारा जारी आदेशों के कारण उन लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की जा सकती है जो सरकारी स्कूलों में कमियों को दिखाते हुए फोटो या वीडियो रिकॉर्ड करते हैं, जिसमें 'बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम' (POCSO Act) के तहत कार्रवाई भी शामिल हो सकती है।

    जब वकील ने बताया कि याचिका पहले ही दायर की जा चुकी है और सुनवाई के लिए तारीख मांगी, तो चीफ जस्टिस ने कहा, "हम देखेंगे।"

    याचिका में विशेष रूप से राजस्थान के माध्यमिक शिक्षा निदेशक द्वारा 16 अगस्त, 2026 को जारी एक सर्कुलर को चुनौती दी गई, जिसके तहत बाहरी लोगों को सरकारी स्कूल परिसर में प्रवेश करने से पहले प्रिंसिपल से पूर्व अनुमति लेनी होती है। इसमें फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, इंटरव्यू, ऑडियो रिकॉर्डिंग और लाइव-स्ट्रीमिंग के लिए भी पूर्व लिखित अनुमति की आवश्यकता होती है।

    उत्तर प्रदेश के संबंध में याचिका में अयोध्या के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी द्वारा 19 अगस्त को जारी एक आदेश का हवाला दिया गया, जिसमें निर्देश दिया गया कि बाहरी लोग, YouTubers और सोशल मीडिया से जुड़े लोग सक्षम अधिकारी की अनुमति के बिना काउंसिल स्कूलों में प्रवेश न करें या फोटो या वीडियो न लें। याचिका में कहा गया कि आजमगढ़, बलिया, बस्ती, बलरामपुर, शामली और आगरा सहित कई अन्य जिलों में भी इसी तरह के निर्देश जारी किए गए।

    याचिकाकर्ता का तर्क है कि ये प्रतिबंध संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(a), 19(1)(g), 21 और 21-A के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। इसमें कहा गया कि बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में वैध पत्रकारिता और सार्वजनिक संस्थानों से संबंधित जानकारी का प्रसार शामिल है। साथ ही यह भी माना गया कि राज्य का यह कर्तव्य है कि वह बच्चों की गोपनीयता, गरिमा और सुरक्षा की रक्षा करे।

    याचिकाकर्ता का तर्क है कि पहचान-योग्य बच्चों की रिकॉर्डिंग करने और सरकारी स्कूल की भौतिक स्थिति का दस्तावेज़ीकरण करने के बीच अंतर है। याचिका के अनुसार, बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाई गई पाबंदियों के कारण क्लासरूम, इमारतों, शौचालयों, पीने के पानी की सुविधाओं, बिजली, मिड-डे मील और अन्य बुनियादी ढांचे के जनहित से जुड़े दस्तावेज़ीकरण को अपने-आप नहीं रोका जाना चाहिए।

    याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि राजस्थान और उत्तर प्रदेश के उन आदेशों को रद्द किया जाए, जिनमें पूरी तरह से पाबंदियां लगाई गईं, और यह निर्देश दिया जाए कि जनहित से जुड़े दस्तावेज़ीकरण के लिए कोई भी नियम उचितता, आवश्यकता और आनुपातिकता की कसौटी पर खरा उतरे।

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