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लोग महसूस कर सकते हैं कि मुख्यमंत्री और कानून मंत्री के नेतृत्व में भीड़ कानून के शासन पर हावी हो गई है: कलकत्ता उच्च न्यायालय ने 4 टीएमसी नेताओं की जमानत पर रोक लगाते हुए कहा

LiveLaw News Network
18 May 2021 2:50 AM GMT
लोग महसूस कर सकते हैं कि मुख्यमंत्री और कानून मंत्री के नेतृत्व में भीड़ कानून के शासन पर हावी हो गई है: कलकत्ता उच्च न्यायालय ने 4 टीएमसी नेताओं की जमानत पर रोक लगाते हुए कहा
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नारदा घोटाले में चार टीएमसी नेताओं की गिरफ्तारी के खिलाफ सीबीआई दफ्तर के सामने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में धरने और ट्रायल कोर्ट परिसर में दो से तीन हजार समर्थकों के साथ राज्य के कानून मंत्री की उपस्थिति पर आपत्त‌ि व्यक्त करते हुए कलकत्ता उच्च न्यायालय ने अभियुक्तों की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि यदि जबकि गिरफ्तार किए गए राजनीतिक नेताओं को न्यायालय में पेश किया जा रहा हो और ऐसी ऐसी घटनाएं होती हैं तो न्याय प्रणाली में लोगों का विश्वास कम हो जाएगा।

सोमवार रात (17 मई) को एक आपातकालीन बैठक के बाद, कलकत्ता उच्च न्यायालय ने विशेष सीबीआई अदालत के आदेश पर रोक लगा दी, जिसके तहत टीएमसी के दो मंत्रियों फिरहाद हकीम और सुब्रत मुखर्जी, टीएमसी विधायक मदन मित्रा और कोलकाता के पूर्व मेयर सोवन चटर्जी नारद घोटाला मामले में जमानत दी गई थी।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति अरिजीत बनर्जी की खंडपीठ ने निर्देश दिया कि आरोपी व्यक्ति को अगले आदेश तक न्यायिक हिरासत में माना जाएगा।

कोर्ट ने कहा, "न्यायिक प्रणाली में जनता का विश्वास अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह अंतिम शरण है। उन्हें यह महसूस हो सकता है कि यह कानून का शासन नहीं, बल्‍कि यह एक भीड़ है, जिसका हाथ ऊपर है और विशेष रूप से ऐसे मामले में जहां इसका नेतृत्व सीबीआई के कार्यालय में राज्य के मुख्यमंत्री और न्यायालय परिसर में राज्य के कानून मंत्री द्वारा किया जाता है। यदि मुकदमे के पक्ष कानून के शासन में विश्वास करते हैं तो ऐसी प्रणाली का पालन नहीं किया जाता है। विचार अलग था।"

अदालत ने अपना आदेश मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और कानून मंत्री मोलॉय घटक की "असाधारण स्थिति" का हवाला देते हुए शुरू किया, जिसमें चार टीएमसी नेताओं की सीबीआई की गिरफ्तारी के विरोध में समर्थकों की एक बड़ी भीड़ का नेतृत्व किया गया था।

कोर्ट ने कहा, "इस अदालत को एक असाधारण स्थिति से निपटने के लिए बुलाया गया है, जहां राज्य की मुख्यमंत्री अपने समर्थकों के साथ केंद्रीय जांच ब्यूरो (संक्षेप में, 'सीबीआई') के कार्यालय के बाहर धरने पर बैठ सकती हैं, जिसने मामले की जांच की है और आरोपियों के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र पेश करना था, जो राज्य में सत्ता में पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं, जिनमें से कुछ मंत्री हैं। इतना ही नहीं, राज्य के कानून मंत्री अदालत में, जहां आरोप‌ियों को पेश किया जाना था, दो से तीन हजार समर्थकों की भीड़ के साथ मौजूद थे।"

मामले के तथ्य

धारा 120बी आईपीसी, धारा 7, 13 (2), साथ में पढ़ें 13 (1) (ए) और (डी) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के तहत आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। उन पर आरोप है कि उन्होंने मैथ्यू सैमुअल नामक एक स्टिंग ऑपरेटर से धन स्वीकार किया था।

आरोपियों को सोमवार सुबह गिरफ्तार किया गया और उसके बाद सीबीआई की विशेष अदालत में पेश किया गया। उनकी गिरफ्तारी के तुरंत बाद बड़ी संख्या में समर्थकों ने सीबीआई कार्यालय का घेराव किया और सीबीआई अधिकारियों को अपने कार्यालय से बाहर नहीं जाने दिया।

इसके अलावा, राज्य की मुख्यमंत्री, ममता बनर्जी भी मौके पर पहुंचीं और धरने पर बैठ गईं और सीबीआई कार्यालय से आरोपी व्यक्तियों की बिना शर्त रिहाई की मांग की।

तुषार मेहता की प्रस्तुतियां

यह कहते हुए कि कुछ आरोपी व्यक्ति, जो राज्य मंत्रिमंडल के सदस्य हैं, को इस मामले में उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार गिरफ्तार किया गया था, एसजीआई ने अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया कि सीबीआई कार्यालय, जहां से आरोप‌ियों को अदालत में ले जाया जाना था, वहां उनके राजनीतिक समर्थकों ने घेराव किया।

मेहता ने कहा, राज्य के मुख्यमंत्री भी धरने पर बैठी थी, मेहता ने अदालत को अवगत कराया कि राज्य के कानून मंत्री अदालत में गए थे, जहां आरोपी व्यक्तियों को अदालत में पेश करते समय, वह दो से तीन हजार समर्थकों की भीड़ के साथ पूरे समय अदालत में रहे।

मेहता ने धारा 407 सीआरपीसी के तहत, यदि न्याय की दृष्टि से ऐसा करना आवश्यक हो तो, मामले को दूसरी अदालत में स्थानांतरित करने की न्यायालय की शक्तियों का प्रयोग करने का आग्रह किया।

पश्चिम बंगाल राज्य के महाधिवक्ता ने प्रस्तुत किया कि सीबीआई अधिकारियों को उनके कर्तव्य के निर्वहन के लिए स्थानीय पुलिस द्वारा पूर्ण सुरक्षा प्रदान की गई थी। किसी भी घटना को लेकर सीबीआई की ओर से पुलिस में कोई आधिकारिक शिकायत दर्ज नहीं की गई है। एजी ने यह भी कहा कि सीबीआई द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 407 के तहत स्थानांतरण के लिए उचित आवेदन दाखिल नहीं किया गया है।

उच्च न्यायालय ने हालांकि कहा कि ट्रायल कोर्ट की स्थिति, जैसा कि सॉलिसिटर जनरल ने बताया, मुकदमे के हस्तांतरण के मुद्दे पर विचार करने के लिए मामले का संज्ञान लेने के लिए पर्याप्त है।

न्यायालय का अवलोकन

कलकत्ता उच्च न्यायालय ने उल्लेख किया कि उच्च न्यायालय द्वारा जारी निर्देशों पर पश्चिम बंगाल राज्य में वर्तमान सरकार के कुछ मंत्रियों सहित कई आरोपियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया था।

इन तथ्यों और परिस्थितियों में, न्यायालय ने देखा, "यदि न्यायालय द्वारा कोई आदेश पारित किया जाता है तो न्याय प्रशासन प्रणाली में लोगों का विश्वास नहीं होगा। यदि इस प्रकार की घटनाओं, उन मामलों में जिनमें राजनीतिक नेताओं को गिरफ्तार किया जाता है और उन्हें अदालत में पेश किया जाना है, को को होने दिया जाता है तो न्याय प्रणाली में लोगों का विश्वास कम हो जाएगा।"

कोर्ट ने कहा कि उपरोक्त तथ्य मुकदमे के स्थानांतरण के संबंध में मामले की जांच के लिए भारत के सॉलिसिटर जनरल के अनुरोध के संदर्भ में वर्तमान मामले का संज्ञान लेने के लिए पर्याप्त हैं।

हालांकि, कोर्ट ने विवाद के गुण-दोष पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन जिस तरह से दबाव बनाने की कोशिश की गई, वह कानून के शासन में लोगों के विश्वास को प्रेरित नहीं करेगा।

इस प्रकार, न्यायालय ने यह नोट करते हुए आदेश पर रोक लगा दी: "चूंकि उस अवधि के दौरान जब दलीलें सुनी गईं, निचली अदालत द्वारा आदेश पारित किया गया था, हम उस आदेश पर रोक लगाना उचित समझते हैं और निर्देश देते हैं कि आरोपी व्यक्ति को अगले आदेश तक न्यायिक हिरासत में माना जाएगा। जिस प्राधिकारण में उन्हें हिरासत में रखा गया है, यह सुनिश्चित करेगा कि उनके पास आवश्यक सभी चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हैं और जेल मैनुअल के प्रावधानों के अनुसार उनका इलाज किया जाए।"

इस मामले पर आज 19 मई को आगे की सुनवाई के लिए विचार किया जाएगा।

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