संसद ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति संशोधन विधेयक पारित किया, जेंडर के स्वयं-निर्धारण का अधिकार हटाना उद्देश्य

Shahadat

25 March 2026 8:07 PM IST

  • संसद ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति संशोधन विधेयक पारित किया, जेंडर के स्वयं-निर्धारण का अधिकार हटाना उद्देश्य

    संसद ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 पारित किया।

    राज्यसभा ने बुधवार को इस विधेयक को ध्वनि मत से पारित कर दिया; लोकसभा ने इसे मंगलवार को ही मंजूरी दे दी थी। DMK सांसद तिरुचि शिवा द्वारा विधेयक को एक प्रवर समिति (select committee) के पास भेजने के लिए पेश किया गया प्रस्ताव खारिज किया गया।

    इस विधेयक में प्रस्तावित विवादास्पद संशोधन यह है कि यह जेंडर के स्वयं-निर्धारण के अधिकार को छीन लेता है। यह विधेयक "स्वयं-अनुभूत लिंग पहचान" वाले व्यक्तियों को "ट्रांसजेंडर व्यक्ति" की परिभाषा से बाहर कर देता है।

    इस विधेयक का उद्देश्य "ट्रांसजेंडर व्यक्ति" की परिभाषा को सीमित करना, जेंडर पहचान की मान्यता की प्रक्रिया में बदलाव करना, और व्यक्तियों को अंग-भंग या ज़बरदस्ती के माध्यम से ट्रांसजेंडर पहचान में बदलने से जुड़े अपराधों के लिए अधिक कठोर दंडात्मक प्रावधान लागू करना है।

    ट्रांसजेंडर विधेयक में प्रमुख बदलाव

    2019 के अधिनियम में एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति को इस प्रकार परिभाषित किया गया:

    "जिसका जेंडर जन्म के समय उस व्यक्ति को दिए गए लिंग से मेल नहीं खाता है। इसमें ट्रांस-पुरुष या ट्रांस-महिला (चाहे उस व्यक्ति ने लिंग पुनर्निर्धारण सर्जरी, हार्मोन थेरेपी, लेज़र थेरेपी या ऐसी कोई अन्य थेरेपी करवाई हो या नहीं), इंटरसेक्स विभिन्नताओं वाले व्यक्ति, जेंडरक्वीर, और किन्नर, हिजड़ा, अरवानी तथा जोगता जैसी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान रखने वाले व्यक्ति शामिल हैं।"

    अब इस परिभाषा को बदलकर यह कर दिया गया:

    "(i) कोई ऐसा व्यक्ति जिसकी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान किन्नर, हिजड़ा, अरवानी और जोगता, या नपुंसक (eunuch) के रूप में हो; या कोई ऐसा व्यक्ति जिसमें नीचे बताई गई इंटरसेक्स विविधताएं हों; या कोई ऐसा व्यक्ति जिसमें जन्म के समय, पुरुष या महिला के विकास की तुलना में निम्नलिखित में से एक या अधिक यौन विशेषताओं में जन्मजात विविधता हो:— (A) प्राथमिक यौन विशेषताएं; (B) बाहरी जननांग; (C) गुणसूत्र पैटर्न; (D) गोनाडल विकास; (E) अंतर्जात हार्मोन उत्पादन या प्रतिक्रिया, या ऐसी कोई अन्य मेडिकल स्थिति; या

    (ii) कोई भी व्यक्ति या बच्चा जिसे बल, प्रलोभन, उकसावे, धोखे या अनुचित प्रभाव से—चाहे उसकी सहमति हो या न हो—एक ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने, धारण करने या बाहरी रूप से प्रदर्शित करने के लिए मजबूर किया गया हो; चाहे वह अंग-भंग (Mutilation), विमर्दन (Emasculation), बधियाकरण (Castration), अंग-विच्छेदन (Amputation), या किसी शल्य-चिकित्सा, रासायनिक या हार्मोनल प्रक्रिया द्वारा किया गया हो, या किसी अन्य तरीके से: बशर्ते कि इसमें अलग-अलग यौन रुझान (Sexual Orientations) और स्वयं द्वारा मानी गई यौन पहचान वाले व्यक्तियों को शामिल नहीं किया जाएगा, और न ही पहले कभी ऐसा शामिल किया गया।"

    2019 के अधिनियम की धारा 5 और 6 के तहत—जिसे ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) नियम, 2020 के साथ पढ़ा जाता है—एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति एक फॉर्म (जैसा कि अधिनियम में प्रमाणित है) जमा कर सकता था; और उस फॉर्म के आधार पर अपनी लैंगिक पहचान घोषित करने वाले एक शपथ-पत्र (Affidavit) के साथ, संबंधित ज़िला मजिस्ट्रेट पहचान प्रमाण-पत्र जारी करने के लिए ज़िम्मेदार होता था। 2020 के नियमों के नियम 4 के अनुसार, इसके लिए किसी भी मेडिकल या शारीरिक जाँच की आवश्यकता नहीं होती थी।

    यदि किसी व्यक्ति ने लैंगिक पुष्टि प्रक्रिया (Gender Affirming Procedure) के लिए कोई मेडिकल हस्तक्षेप करवाया है तो ऐसा व्यक्ति संबंधित चिकित्सा संस्थान के मेडिकलक अधीक्षक या चीफ मेडिकल ऑफिसर द्वारा इस आशय का जारी किया गया प्रमाण-पत्र संलग्न करके आवेदन कर सकता है। इसके आधार पर ज़िला मजिस्ट्रेट धारा 7 के अनुसार एक संशोधित पहचान प्रमाण-पत्र जारी कर सकता था।

    अब, 2026 के संशोधन के अनुसार, ज़िला मजिस्ट्रेट केवल "प्राधिकरण" (Authority) की सिफारिश की जांच करने के बाद ही प्रमाण-पत्र जारी कर सकता है। यह प्राधिकरण 'मेडिकल बोर्ड' (Medical Board) होता है, जिसका नेतृत्व एक मुख्य चिकित्सा अधिकारी या डिप्टी-चीफ मेडिकल ऑफिसर करता है>।इस बोर्ड की नियुक्ति केंद्र सरकार, राज्य सरकार या केंद्र-शासित प्रदेश (UT) के प्रशासन द्वारा की जा सकती है। मेडिकल बोर्ड की सिफ़ारिश के बाद भी अगर ज़िला मजिस्ट्रेट चाहें, तो वे दूसरे मेडिकल विशेषज्ञों की मदद ले सकते हैं। ये मेडिकल विशेषज्ञ कौन होंगे, यह संशोधन अधिनियम में साफ़ तौर पर नहीं बताया गया।

    धारा 7 में भी संशोधन किए गए, जिसके तहत किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति के लिए जेंडर बदलने वाली सर्जरी (Gender Affirming Surgery) के बाद ज़िला मजिस्ट्रेट को आवेदन देना ज़रूरी हो गया। अब संबंधित मेडिकल संस्थान के लिए भी यह ज़रूरी हो गया कि वह ऐसे लोगों की जानकारी ज़िला मजिस्ट्रेट को दे; यह नियम धारा 7 में जोड़े गए खंड (1A) के तहत लागू होता है।

    इसके अलावा, धारा 18 में भी संशोधन किया गया। इसमें कई तरह की सज़ाएं जोड़ी गईं। जैसे कि, अगर कोई व्यक्ति किसी वयस्क को अगवा करता है या उसका अपहरण करता है और उसकी मर्ज़ी या सहमति के बिना उस पर ज़बरदस्ती ट्रांसजेंडर पहचान थोपने के इरादे से उस पर कोई हार्मोनल या सर्जिकल प्रक्रिया करवाता है तो उसे कम-से-कम 10 साल की जेल और 2 लाख रुपये के जुर्माने की सज़ा दी जाएगी।

    इसी तरह अगर किसी बच्चे को अगवा करके इस काम में लगाया जाता है तो उस व्यक्ति को आजीवन कठोर कारावास और 5 लाख रुपये के जुर्माने की सज़ा हो सकती है। इन दोनों धाराओं में "अनुचित प्रभाव" (Undue Influence) शब्द भी शामिल है, जिसका इस्तेमाल ट्रांसजेंडर समुदाय के खिलाफ बड़े पैमाने पर किया जा सकता है, क्योंकि समाज में उनके बारे में कई तरह की गलत धारणाएं फैली हुई हैं।

    इस बिल के बारे में सांसदों का क्या कहना है?

    तेलंगाना से इंडियन नेशनल कांग्रेस की रेणुका चौधरी ने पूछा:

    "आज हम सब यहां इकट्ठा हुए हैं। हमें संसद—यानी राज्यसभा—में बैठने का सौभाग्य मिला है, क्योंकि हमें 'राज्यों की परिषद' (Council of States) द्वारा चुना गया। मैं यह जानना चाहती हूं कि जब हम संसद में प्रवेश करते हैं तो हम एक फ़ॉर्म भरते हैं, जिसमें हमारी पहचान हमारे लिंग (Gender) के आधार पर की जाती है। आप सभी ने खुद ही अपना जेंडर घोषित किया है; आपने बताया कि आप पुरुष हैं या महिला। क्या किसी मेडिकल बोर्ड ने इसकी पुष्टि की है? जब हमें यह विशेषाधिकार प्राप्त है कि कोई भी हमारे जेंडर की पहचान पर सवाल नहीं उठा सकता तो फिर हम ट्रांसजेंडर लोगों पर सवाल क्यों उठा रहे हैं? और हम राज्यों की पुलिस को यह अधिकार क्यों दे रहे हैं कि वे जाकर किसी ऐसे इंसान की पहचान करें, जिसके पास भी वही संवैधानिक अधिकार हैं, जो आपके और मेरे पास हैं?"

    उन्होंने यह दावा भी किया कि जस्टिस आशा मेनन की समिति की हाल ही में बैठक हुई, लेकिन केंद्र सरकार के सात सचिवों में से कोई भी उस बैठक में शामिल नहीं हुआ।

    उन्होंने पूछा,

    "क्या केंद्र सरकार ने देश के उन नागरिकों के साथ किसी भी तरह का विचार-विमर्श या चर्चा की है, जिन्हें ट्रांसजेंडर के रूप में जाना जाता है?... क्या उन्हें LGBTQIA+ का मतलब भी पता है?"

    अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के साकेत गोखले ने कहा,

    "मैं आपको बताता हूं कि सरकार बिल कैसे बनाती है। वे उन लोगों की बात नहीं सुनते, जिन पर इसका असर पड़ने वाला है। वे सोशल मीडिया देखते हैं। वह भी कि अमेरिका में क्या हो रहा है, क्योंकि हमने डोनाल्ड ट्रंप के आगे घुटने टेक दिए हैं। अगर डोनाल्ड ट्रंप कहते हैं कि दो ही जेंडर होते हैं तो हमारी सरकार भी कहेगी कि दो ही जेंडर होते हैं। हमें इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि हम समय में पीछे जा रहे हैं। इस देश का एक गौरवशाली इतिहास रहा है, जिसमें लोगों को अपनी जेंडर पहचान को मान्यता देने की अनुमति दी गई, लेकिन अब अगर ट्रंप ने ऐसा कहा तो उन्होंने ज़रूर सोच-समझकर ही कहा होगा।"

    उन्होंने आगे कहा,

    "यह बिल एक घटिया औपनिवेशिक कानून के अलावा और कुछ नहीं है।"

    उन्होंने कहा कि 2011 की जनगणना के अनुसार, ट्रांसजेंडर आबादी लगभग 5 लाख होनी चाहिए, लेकिन केवल 32,000 लोगों ने पहचान पत्र के लिए आवेदन किया, क्योंकि उनमें से ज़्यादातर लोग सामने आने से डरते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि 31% ट्रांसजेंडर लोगों ने आत्महत्या करने की कोशिश की, जिनमें से 50% ने 20 साल की उम्र से पहले ही ऐसा करने की कोशिश की थी।

    राष्ट्रीय जनता दल के प्रोफ़ेसर मनोज कुमार ने जॉर्ज ऑरवेल की 1984 की किताब और दार्शनिक मिशेल फ़ूको का हवाला देते हुए सवाल उठाया कि सरकार अधिकारों पर आधारित दृष्टिकोण का पालन क्यों नहीं कर रही है। उन्होंने यह भी पूछा कि सरकार युद्ध के बीच में यह संशोधन क्यों लेकर आई।

    उन्होंने कहा,

    "मुझे समझ नहीं आता कि सरकार को अधिकारों पर आधारित दृष्टिकोण से क्या दिक्कत है? हर कानून में सरकार अधिकारों पर आधारित दृष्टिकोण को खत्म करने की कोशिश कर रही है।"

    शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) की प्रियंका चतुर्वेदी ने सवाल उठाया कि सरकार 5 लाख ट्रांसजेंडर लोगों के लिए फ़ैसला कैसे ले सकती है, जबकि इस पर कई पक्षों से कोई सलाह-मशविरा नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि हालांकि ट्रांसजेंडर पहचान पत्र के लिए 32,000 आवेदन स्वीकार किए गए, लेकिन लगभग 5,500 आवेदन खारिज कर दिए गए और सार्वजनिक तौर पर इन आवेदनों को खारिज करने का कोई कारण भी नहीं बताया गया। इसी तरह अगर मेडिकल बोर्ड कोई फ़ैसला लेता है और किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति की पहचान को खारिज कर देता है तो यह उनके गरिमा के अधिकार का उल्लंघन होगा।

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