राम मंदिर दान की चोरी से बेअसर लोगों को कोई शर्मिंदा नहीं कर सकता, यह भारतीयों की ईमानदारी का सबसे निचला स्तर: जस्टिस अतुल श्रीधरन
Shahadat
21 July 2026 4:26 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन ने यूपी सरकार की हालिया "बुलडोज़र कार्रवाई" पर कड़ी टिप्पणी करते हुए भारतीय संस्थाओं में फैले भ्रष्टाचार की आलोचना की। उन्होंने कहा कि अयोध्या में राम मंदिर में दान की हालिया चोरी "भारतीयों की ईमानदारी" के "सबसे निचले स्तर" को दिखाती है।
उन्होंने कहा कि आम भारतीय ने भ्रष्टाचार को सामान्य मान लिया और पकड़े जाने तक इसे गलत नहीं समझता। उन्होंने यह भी कहा कि ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल 2025 की रिपोर्ट में 182 देशों में भारत का 91वां स्थान होने के बावजूद, "हमें शर्म नहीं आती"।
इस संदर्भ में, राम मंदिर दान चोरी के हालिया विवाद का ज़िक्र करते हुए जस्टिस श्रीधरन ने कहा:
"राम मंदिर में दान की चोरी से जुड़ा हालिया विवाद 'ऊंट की पीठ पर आखिरी तिनके' (हद पार करने वाली घटना) जैसा है। राम मंदिर में हुई चोरी से बेअसर लोगों को कोई शर्मिंदा नहीं कर सकता; यह चोरी भारतीयों की ईमानदारी के सबसे निचले स्तर को दिखाती है।"
महत्वपूर्ण बात यह है कि समाज में भ्रष्टाचार के इतने सामान्य हो जाने पर गहरी चिंता जताते हुए जज ने यहां तक सुझाव दिया कि राज्य को भ्रष्टाचार के दोषियों के लिए मौत की सज़ा का प्रावधान करने के लिए 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988' में संशोधन करने पर विचार करना चाहिए।
ये कड़ी टिप्पणियां जस्टिस श्रीधरन की 51 पन्नों की राय में की गईं। यह राय "बुलडोज़र न्याय" और म्युनिसिपल नियमों के उल्लंघन के बहाने आरोपियों के घर गिराने के मुद्दे पर आए बंटे हुए फैसले (स्प्लिट वर्डिक्ट) का हिस्सा थी।
इन तोड़-फोड़ की कार्रवाई के संदर्भ में उन्होंने कहा कि अपराध के तुरंत बाद घर गिराना मुख्य रूप से उस समाज की "खून की प्यास" को शांत करने के लिए होता है, जिसे "बुलडोज़र न्याय" की आदत पड़ गई।
उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के बावजूद, बिना किसी डर के तोड़-फोड़ जारी है, "मानो ये फैसले मौजूद ही न हों, या राज्य को पक्का यकीन हो कि देश की सबसे बड़ी अदालत द्वारा तय कानून की अवहेलना करने पर उन्हें किसी बुरे नतीजे का सामना नहीं करना पड़ेगा"।
इसके अलावा, यह देखते हुए कि बिना मंज़ूरी वाले निर्माण कैसे होते हैं, जस्टिस श्रीधरन ने कहा कि कोई भी घर रातों-रात नहीं बन जाता।
उन्होंने कहा,
"जिन अधिकारियों की यह ज़िम्मेदारी है कि ऐसे निर्माण न हों, वे बिल्डर को मिलने वाले राजनीतिक या अफ़सरशाही के समर्थन या बेईमानी के कारण जानबूझकर आँखें मूंद लेते हैं।"
कोर्ट ने यह भी देखा कि नियमों के ख़िलाफ़ बने घरों को बनाने में बेईमान अधिकारी मदद करते हैं; वे बिल्डरों से रिश्वत लेते हैं और अंत में खरीदार को कानून की कार्रवाई झेलनी पड़ती है और दशकों बाद अचानक बेदखली का सामना करना पड़ता है।
इस संदर्भ में, जस्टिस श्रीधरन ने साफ़ तौर पर कहा कि राज्य नियमों का उल्लंघन करने वालों की मिलीभगत से और इन निर्माणों को पानी और बिजली जैसी सरकारी सुविधाएँ देकर उनकी सक्रिय रूप से मदद करता है, इसलिए वह भी अपराध में भागीदार (साथी) है।
उन्होंने यह भी कहा कि "ईमानदारी की यह सामूहिक कमी" विकास प्राधिकरणों सहित हर संस्था को प्रभावित करती है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि जस्टिस श्रीधरन ने चेतावनी दी कि देश में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार से कुछ ही लोगों के हाथों में गैर-कानूनी तरीके से धन जमा होगा, जिससे "अमीरों और गरीबों के बीच खाई बढ़ेगी" और "आने वाले दिनों में नागरिक अशांति की नींव पड़ेगी"।
इसे देखते हुए जस्टिस श्रीधरन ने राज्य से कड़े कानूनी उपाय करने का आग्रह किया, अगर वह वास्तव में सिस्टम को साफ़-सुथरा बनाना चाहता है।
उन्होंने राय दी,
"अगर राज्य भ्रष्टाचार को कम करने और भारत को बेईमानी और ईमानदारी की पूरी कमी के गहरे दलदल से बाहर निकालने के बारे में गंभीर है तो उसे भ्रष्टाचार के दोषी लोगों के लिए मौत की सज़ा का प्रावधान करने के लिए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 में संशोधन करने पर विचार करना चाहिए।"
किसी अपराध के आरोपी व्यक्ति के घर को गिराने के तत्काल मुद्दे से निपटने के लिए जस्टिस श्रीधरन ने निर्देश दिया कि FIR दर्ज होने की तारीख से दो साल की अवधि तक राज्य के लिए कोई भी कार्रवाई करना उचित नहीं होगा; हालांकि, जस्टिस सिद्धार्थ नंदन इस विशिष्ट निर्देश से सहमत नहीं थे।
Case title - Faimuddeen and 2 others v State of U.P. and 7 others 2026 LiveLaw (AB) 442

