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''परिवार में होने वाले सामान्य झगड़े ऐसी प्रताड़ना के समान नहीं कि एक दुल्हन को आत्महत्या के लिए उकसाएंः दिल्ली कोर्ट ने पति और परिवार के सदस्यों को बरी किया

LiveLaw News Network
5 April 2021 9:00 AM GMT
परिवार में होने वाले सामान्य झगड़े ऐसी प्रताड़ना के समान नहीं कि एक दुल्हन को आत्महत्या के लिए उकसाएंः दिल्ली कोर्ट ने पति और परिवार के सदस्यों को बरी किया
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दिल्ली की एक अदालत ने हाल ही में उस मृत महिला के पति व ससुराल वालों को बरी कर दिया है, जिसने शादी के एक महीने के भीतर ही आत्महत्या कर ली थी और उन सभी पर दहेज प्रताड़ना,दहेज हत्या और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप लगाए गए थे। कोर्ट ने कहा कि शादी होने के बाद शुरूआती दिनों में परिवार में होने वाले छोटे-मोट झगड़े या कहासुनी ऐसे नहीं होते हैं कि उन्होंने महिला को इस हद तक प्रताड़ित कर दिया था कि वह आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो गई थी।"

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश चारू अग्रवाल ने यह भी कहा कि,''अगर एक दुल्हन/लड़की अपनी शादी के कुछ दिनों या महीने के भीतर अप्राकृतिक परिस्थितियों में आत्महत्या कर लेती है, तो कानून लड़के के परिवार के खिलाफ अनुमान लगाता है, लेकिन क्या यह लड़की की अति संवेदनशीलता को नहीं दिखाता है जिसने इस पवित्र रिश्ते को समय ही नहीं दिया।''

मामले के तथ्य वर्ष 2014 के हैं, जब एक नवविवाहित पत्नी ने शादी के एक महीने के भीतर अपने वैवाहिक घर में पंखे से लटक कर आत्महत्या कर ली थी। कमरे में एक सुसाइड नोट भी मिला, जिसे मौके पर पहुंचकर आईओ ने जब्त कर लिया था। कोर्ट ने आईपीसी की धारा 498ए, 304बी, 306 और 34 के तहत पति, जीजा और मृतक की सास के खिलाफ आरोप तय किए थे।

''रोम एक दिन में नहीं बना था'',इस कहावत का हवाला देते हुए, न्यायालय का विचार था कि उक्त कहावत सही मायने में दो व्यक्तियों के बीच विवाह पर भी लागू होती है।

कोर्ट ने कहा कि,

''एक सफल विवाह को एक दूसरे का प्यार, सम्मान, आपसी समझ और विश्वास की आवश्यकता होती है। ये सभी कारक दो व्यक्तियों को एक या दो दिन में नहीं, बल्कि एक ही छत के नीचे बिताए गए समय के साथ एक कपल बनाते हैं। शादी के शुरुआती दिनों में, सभी नहीं, लेकिन अधिकांश विवाह चाहे वह लव मैरिज हो या फिर अरेंज मैरिज, विभिन्न चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। शादी के बाद बहुत सी चीजें बदल जाती हैं, भले ही वह प्रेम विवाह क्यों न हो। इन चुनौतियों का समाधान लड़का और लड़की दोनों के हाथों में समान रूप से होता है और उक्त समाधान केवल दंपति का धैर्य और शांति है।''

अदालत ने अभियोजन पक्ष के गवाहों की गवाही को देखने के बाद कहा कि हालांकि, गवाहों ने दहेज की मांग व प्रताड़ना के कारण उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं, परंतु उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि मृतक को किस तरह से परेशान किया गया।

इसके अलावा, सुसाइड नोट का जिक्र करते हुए, न्यायालय ने कहा कि यह नोट केवल इस बात को दर्शाता है कि मृतका और उसके पति के बीच कुछ गलतफहमी थी और कुछ भी नहीं। यह देखते हुए कि उक्त नोट में ''आरोपी व्यक्तियों की तरफ से किसी भी तरह के उकसावे के बारे में कुछ नहीं कहा गया है'', कोर्ट ने कहा कि,

'''खुद को फांसी लगाकर मृतक द्वारा आत्महत्या करना, वह भी शादी के एक महीने के भीतर, एक संदेह पैदा करता है कि सबकुछ सामान्य नहीं था। हालांकि यह संदेह, दहेज की मांग के सबूत या मृतक के उत्पीड़न का विकल्प नहीं हो सकता है यानी, आवश्यक घटक जो आईपीसी की धारा 498ए/ 304 बी या 306 के तहत अपराध का गठन करते हैं।''

रानी बनाम स्टेट आॅफ एनसीटी आॅफ दिल्ली मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा था कि शादी के बाद की जाने वाली हर आत्महत्या को दहेज की मांग के कारण की जाने वाली आत्महत्या नहीं माना जा सकता है। इस फैसले का हवाला देते हुए न्यायालय ने कहा किः

''न्यायालय की प्रवृत्ति यह नहीं होनी चाहिए कि ''चूंकि शादी के बाद किसी दुल्हन की मृत्यु हो गई थी, तो अब किसी को तो दोषी ठहराना है और किसी की गर्दन में फंदा जरूर फिट किया जाना चाहिए।''

पूर्वोक्त टिप्पणियों के मद्देनजर, न्यायालय ने आरोपी व्यक्तियों को बरी करते हुए निर्देश दिया है कि वह सीआरपीसी की धारा 437ए के तहत फिर से दस हजार रुपये के जमानती बॉन्ड प्रस्तुत कर दें।

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