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आरोपी द्वारा पहली बार यौन उत्पीड़न करने के समय विरोध न करना पीड़िता की पूर्व सहमति के समानः मद्रास हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
28 Aug 2021 5:15 AM GMT
आरोपी द्वारा  पहली बार यौन उत्पीड़न करने के समय विरोध न करना पीड़िता की पूर्व सहमति के समानः मद्रास हाईकोर्ट
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मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में माना है कि आरोपी द्वारा पहली बार यौन उत्पीड़न करने के समय पीड़िता द्वारा उसका विरोध न करना,पीड़िता की पूर्व-सहमति के समान माना जाएगा और इसलिए, इस प्रकार दी गई सहमति को तथ्य की गलत धारणा के रूप में नहीं माना जाना चाहिए।

जस्टिस आर. पोंगियप्पन की बेंच ने यह टिप्पणी आईपीसी की धारा 376 के तहत एक व्यक्ति/आरोपी की सजा को खारिज करने के लिए दायर एक अपील पर विचार करने के बाद की, जिसने कथित तौर पर पीड़िता से शादी करने का वादा किया था, लेकिन वादा पूरा नहीं किया।

संक्षेप में तथ्य

आरोपी और पीड़िता एक ही गांव में रहते हैं और घटना से पहले, दोनों में प्यार हो गया और एक साल की अवधि तक यह जारी रहा और शाम के समय में वे नियमित रूप से मिलते थे।

इस दौरान जब पीड़िता ने आरोपी से कहा कि वह उससे शादी कर ले तो आरोपी ने उससे शादी करने का वादा किया, लेकिन साथ ही आरोपी ने अपनी हवस पूरी करने की मांग की।

नतीजतन, मई 2009 में, आरोपी ने, कथित तौर पर, पीड़िता पर जबरन यौन हमला किया और इस तरह पीड़िता गर्भवती हो गई। उसके बाद, जुलाई 2009 में, जब पीड़िता ने आरोपी से उससे शादी करने का अनुरोध किया, तो उसने प्रस्ताव से इनकार कर दिया और उसे भ्रूण का गर्भपात करवाने के लिए कहा।

कथित तौर पर, यहां तक कि पीड़ित लड़की के माता-पिता ने भी आरोपी के माता-पिता से पीड़ित लड़की और आरोपी के बीच विवाह करवाने का अनुरोध किया तो उन्होंने दहेज में सोने के गहने और एक लाख रुपये की मांग की।

गांव में आयोजित पंचायत में भी आरोपी ने पीड़ित लड़की से शादी करने से इनकार कर दिया और इसलिए शिकायत दर्ज की गई। इस शिकायत के बाद मामला दर्ज किया गया, सुनवाई हुई और उसके बाद अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, महिला न्यायालय, मदुरै ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत अपराध के लिए दोषी पाया और उसे सजा सुना दी गई।

दलीलें

अपीलकर्ता/अभियुक्त के वकील ने तर्क दिया कि कथित घटना पीड़ित लड़की द्वारा दी गई पूर्व सहमति से हुई थी और यह भी कहा कि प्रासंगिक समय के दौरान, आरोपी और पीड़ित लड़की दोनों नियमित रूप से मिलते थे और उन्होंने शारीरिक संबंध बनाना जारी रखा।

इसलिए, यह तर्क दिया गया कि पीड़ित लड़की द्वारा दी गई सहमति पूर्व-सहमति थी और इसलिए, बलात्कार के अपराध के लिए आरोपी को दोषी ठहराना तय कानून के दायरे में नहीं आता है।

न्यायालय की टिप्पणियां

शुरुआत में, अदालत ने नोट किया कि पीड़िता ने घटना की तारीख से ढाई महीने के अंतराल के बाद इस मामले में शिकायत दायर की और उसने निचली अदालत के समक्ष विशेष रूप से कहा था कि आरोपी के प्यार में पड़ने के बाद, वे नियमित रूप से बगीचे में मिलते थे और उनके बीच संबंध बने।

इस अवसर पर, अदालत ने कहा, पीड़िता के कृत्य से यह स्पष्ट रूप से पता चलता है कि उसने शादी के वादे पर आरोपी के शारीरिक सुख के लिए खुद का प्रस्तुत किया था।

इसके अलावा, अदालत ने कहा कि घटना के समय पीड़िता और आरोपी/अपीलकर्ता बालिग थे और सबूत में कहीं भी यह नहीं पाया गया कि अपीलकर्ता ने पीड़िता से शादी करने के लिए कोई निश्चित तारीख या कोई समयसीमा तय की थी।

साथ ही, यह देखते हुए कि पीड़िता ने इस मुद्दे के बारे में दूसरों से तभी शिकायत की थी जब अपीलकर्ता ने अपना वादा अस्वीकार कर दिया था, अदालत ने कहा किः

''उक्त परिस्थितियां इस तथ्य को प्रकट करती हैं कि प्रासंगिक समय के दौरान, पीड़िता भी तैयार थी और आरोपी ने अपने भाई की शादी होने के बाद उससे शादी करने का वादा भी किया था। इस तरह के आश्वासन पर विश्वास करते हुए पीड़िता ने आरोपी के साथ सहवास करना शुरू कर दिया और यह कई महीनों तक जारी रहा, इस अवधि के दौरान आरोपी ने शाम का अधिकांश समय उसके साथ बिताया। आखिरकार, जब वह गर्भवती हुई और जोर देकर कहा कि शादी जल्द से जल्द होनी चाहिए, तो अपीलकर्ता ने गर्भपात का सुझाव दिया। चूंकि इस प्रस्ताव को पीड़िता ने स्वीकार नहीं किया तो अपीलकर्ता ने अपना वादा पूरा करने से इनकार कर दिया और अंततः मामला दर्ज करवा दिया गया।''

इस पृष्ठभूमि में, न्यायालय ने माना किः

''आरोपी द्वारा पहली बार यौन उत्पीड़न करने के समय उसका विरोध न करना पूर्व-सहमति के समान है। तदनुसार, पीड़ित लड़की द्वारा दी गई सहमति को तथ्य की गलत धारणा के रूप में नहीं माना जा सकता है।''

न्यायालय ने पीड़िता द्वारा तैयार की गई शिकायत के साथ-साथ डॉक्टर द्वारा दिए गए साक्ष्य के संबंध में भी संदेह व्यक्त किया, और इसलिए, आपराधिक अपील की अनुमति देते हुए, अपीलकर्ता/प्रथम आरोपी को दोषी करार देते हुए सजा सुनाने के फैसले को रद्द कर दिया। इसी के साथ अपीलकर्ता/प्रथम आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।

केस का शीर्षक - चिन्नापंडी बनाम राज्य

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