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निलंबन की अवधि में गुजारा भत्ता न देना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन : उत्तराखंड हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
19 Jun 2020 4:15 AM GMT
निलंबन की अवधि में गुजारा भत्ता न देना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन : उत्तराखंड हाईकोर्ट
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उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बुधवार को एक बार फिर दोहराया है कि निलंबन के तहत रखे गए किसी सरकार कर्मचारी द्वारा गुजारा भत्ता (आजिविका) का भुगतान प्राप्त करना उसका ''अधिकार'' है।

न्यायमूर्ति मनोज के तिवारी की पीठ ने कहा,

''प्रत्येक निलंबित सरकारी कर्मचारी (जिसे निलंबन के तहत रखा गया है) के पास गुजारा भत्ता प्राप्त करने का वैधानिक अधिकार है। ऐसे में अगर गुजारा भत्ते का भुगतान नहीं किया जाता है तो उसे भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन माना जाएगा।''

अदालत ने यह टिप्पणी एक सेवा याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जो जिला शिक्षा अधिकारी, प्राथमिक शिक्षा के खिलाफ दायर की गई थी। इस मामले में याचिकाकर्ता को जनवरी 2020 में निलंबित कर दिया गया था, लेकिन उसे गुजारा भत्ता का भुगतान नहीं किया गया।

अदालत ने कहा कि निलंबन के आदेश में इसका उल्लेख होने के बावजूद भी भुगतान नहीं किया गया है।

इस प्रकार अदालत ने आदेश दिया कि-

''जिला शिक्षा अधिकारी, प्राथमिक शिक्षा, हरिद्वार (प्रतिवादी संख्या 4) को निर्देश दिया जाता है कि वह तीन सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता को बकाया एरियर सहित गुजारा भत्ता का भुगतान करे या फिर जवाबी हलफनामे के जरिए कारण बताएं।''

इस मुद्दे पर कानून की घोषणा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 'एमपी राज्य सरकार व अन्य बनाम शंकरलाल' के मामले में कहा था कि ''

"निलंबित किए गए किसी कर्मचारी को नियमों के अनुसार गुजारा भत्ते का भुगतान कोई इनाम या दान नहीं है, यह एक अधिकार है। एक कर्मचारी गुजर बसर का भुगतान पाने का हकदार है।''

'एके बिंदल व अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया व अन्य' के मामले में अदालत ने दोहराया था कि-

''इस अनुच्छेद में निहित जीवन का अधिकार जीवित रहने या पशु अस्तित्व की तुलना में कुछ अधिक है। इसमें गरिमा के साथ जीने का अधिकार शामिल होगा। निलंबन के तहत रखे गए किसी कर्मचारी को बहुत कम गुजारा भत्ते का भुगतान (जो उसके जीवन को बनाए रखने के लिए पूरी तरह अपर्याप्त हो) संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करने वाला माना गया है।''

हाल ही में मद्रास हाईकोर्ट ने 'रजिस्ट्रार व अन्य बनाम एम एलंगो' के मामले में कहा था कि एक निलंबित कर्मचारी को गुजारा भत्ते का भुगतान करने से इनकार करना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होगा।

कोर्ट ने कहा कि-

''यहां ''गुजारा भत्ता'' से तात्पर्य है जीवित रहने के लिए प्रबंधन करना, विशेष रूप से सीमित संसाधनों या धन के साथ। ऐसे जीवित रहने की अवस्था को गुजारा भत्ता के रूप में जाना जाता है, जो इस तथ्य का द्योतक है कि किसी व्यक्ति के पास बुनियादी न्यूनतम जरूरतों के साथ जीवन को बनाए रखने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं।

एक वेतनभोगी कर्मचारी का आजीविका के अल्प संसाधनों के साथ जीवित रहना ही गुजारा भत्ता के रूप में जाना जाता है। जो सेवा से दूर रहने के दौरान, उसके जीवित रहने के लिए किए जाने वाले तत्काल खर्चों को पूरा करने के लिए दिया जाने वाला अग्रिम भुगतान है।

इसलिए, यह एक ऐसी आय है जो जरूरी आवश्यकताओं को प्रदान करने के लिए पर्याप्त है। वहीं एक अनिवार्य संकट से गुजरने के दौरान यह आय वास्तविकता के रूप में मौजूद पर्याप्त सहायता होती है। यह एक जीविका के संरक्षण का विचार है, जो न्यूनतम आर्थिक स्तर पर जीवन स्तर के न्यूनतम मानक को बनाए रखना चाहता है।''

आदेश की प्रति डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें



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