'जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा पर पक्षपात का आरोप नहीं लगाया जा सकता': CBI ने केजरीवाल की सुनवाई से हटाने की अर्जी का विरोध किया
Shahadat
8 April 2026 11:23 PM IST

केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने दिल्ली हाईकोर्ट में AAP प्रमुख अरविंद केजरीवाल और अन्य आरोपियों द्वारा दायर उन अर्जियों का विरोध किया, जिनमें आबकारी नीति मामले में उन्हें बरी किए जाने के एजेंसी के विरोध पर सुनवाई से जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के हटने की मांग की गई।
अपने जवाब में CBI ने कहा है कि जजों द्वारा अपने फैसलों में व्यक्त किए गए विचारों पर पक्षपात का आरोप नहीं लगाया जा सकता।
एजेंसी ने कहा कि जस्टिस शर्मा पर केवल अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के सेमिनार में शामिल होने के आधार पर लगाए गए पक्षपात के आरोप अदालत की अवमानना और अदालत के अधिकार को बदनाम करने के समान हैं।
यह जवाब अरविंद केजरीवाल, विजय नायर, अरुण रामचंद्र पिल्लई, मनीष सिसोदिया, चनप्रीत सिंह रायत और दुर्गेश पाठक द्वारा दायर सुनवाई से हटने की अर्जियों के जवाब में दाखिल किया गया।
CBI ने इस आरोप का विरोध किया कि जस्टिस शर्मा द्वारा जांच अधिकारी के खिलाफ ट्रायल कोर्ट की टिप्पणियों पर दी गई एकतरफा रोक (ex parte stay) से उनकी पहले से तय मानसिकता का पता चलता है। एजेंसी ने कहा कि जब कोई आदेश खुद ही किसी ऊपरी अदालत में चुनौती के अधीन हो तो उस आदेश को लागू करने के परिणामस्वरूप होने वाली कार्रवाइयों पर रोक लगाने में कुछ भी असामान्य या कानून के विपरीत नहीं है।
कार्यवाही में जल्दबाजी किए जाने के आरोप पर एजेंसी ने कहा कि इस मामले में 3 महीने से भी कम समय में कुल 27 सुनवाई हो चुकी हैं, जिससे यह साबित होता है कि सांसदों और विधायकों से जुड़े मामलों की सुनवाई एक समान और त्वरित तरीके से की जा रही है।
अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के साथ जस्टिस शर्मा के कथित वैचारिक जुड़ाव की संभावना पर CBI ने कहा कि ये "मनगढ़ंत और व्यापक आरोप" हैं, जिनके जरिए केवल कानूनी सेमिनारों में शामिल होने के आधार पर किसी विशेष पीठ पर पक्षपात का आरोप लगाने की कोशिश की जा रही है, जबकि वे सेमिनार किसी भी राजनीतिक विषय से बिल्कुल भी संबंधित नहीं थे।
जवाब में कहा गया,
"यदि अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के किसी कार्यक्रम में शामिल होना किसी जज के वैचारिक पक्षपात को दर्शाता है तो बड़ी संख्या में मौजूदा हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों को ऐसे किसी भी मामले की सुनवाई से हटना पड़ेगा, जिनमें 'राजनीतिक रूप से प्रभावशाली व्यक्ति' (Politically Exposed Persons) आरोपी हों।"
इसके अलावा, CBI ने कहा कि जस्टिस शर्मा ने असल में आरोपी पिल्लई को तीन मौकों पर अंतरिम ज़मानत का फ़ायदा दिया। CBI ने यह भी कहा कि आरोपी के पक्ष में और उसके ख़िलाफ़, दोनों तरह के आदेश देना ही यह दिखाता है कि किसी भी तरह के पक्षपात की आशंका नहीं हो सकती।
जवाब में कहा गया,
“न्यायिक कार्यवाही के दौरान जजों द्वारा अपने फ़ैसलों में व्यक्त किए गए विचारों को 'पक्षपात' से नहीं जोड़ा जा सकता। अगर जजों के हटने (Recusal) का यही पैमाना है—जैसा कि विरोधी वकीलों ने तर्क दिया—तो यह 'फ़ोरम शॉपिंग' (अपनी पसंद की अदालत चुनना) या पार्टियों द्वारा अपनी पसंद की बेंच चुनने जैसा होगा। ऐसा वे उन जजों को हटाने की मांग करके करेंगे, जिन्होंने अतीत में अपने फ़ैसलों में ऐसे विचार व्यक्त किए, जो उन्हें स्पष्ट रूप से या देखने में अपने ख़िलाफ़ लगते हैं। यह सिर्फ़ इस माननीय जज को हटाने की मांग तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि हर उस जज को हटाने की मांग की जाएगी, जिसने अतीत में उसी या मिलते-जुलते मुद्दे पर कोई प्रतिकूल फ़ैसला दिया हो।”
इसमें आगे कहा गया,
“इस माननीय अदालत को न्याय और क़ानून के शासन के हित में माननीय जज को हटाने के अनुरोध को स्वीकार नहीं करना चाहिए। यह निवेदन किया जाता है कि किसी मामले में न्यायिक दृष्टिकोण अपनाना, मूल रूप से 'पक्षपात' के सिद्धांत से अलग है। पक्षपात पर क़ानून यह कहता है कि पक्षपात या पूर्वाग्रह का आभास किसी 'न्यायिक-बाह्य स्रोत' (Extra-Judicial Source) से ही होना चाहिए।”
इसके अलावा, CBI ने यह भी कहा है कि किसी भी पार्टी को अपनी पसंद की बेंच द्वारा सुनवाई का अधिकार नहीं है, क्योंकि बेंच गठित करने का विशेषाधिकार चीफ जस्टिस के पास होता है, जो 'रोस्टर के स्वामी' (Master of the Roster) होते हैं। CBI ने यह भी कहा है कि MP/MLA रोस्टर जस्टिस शर्मा के पास है और इसे सिर्फ़ आवेदकों के अनुरोध पर बदला नहीं जा सकता।
CBI ने कहा,
“सिर्फ़ इसलिए कि किसी जज ने कुछ न्यायिक कार्यवाहियों में कोई न्यायिक दृष्टिकोण अपनाया, इसका यह मतलब नहीं है कि वह जज उन्हीं पार्टियों के बीच बाद के मामलों की सुनवाई नहीं कर सकता। आज जो तर्क पेश करने की कोशिश की जा रही है, वह न सिर्फ़ 'पक्षपात' पर क़ानून के स्थापित सिद्धांतों से अनजान है, बल्कि भारत में यह कभी भी 'अदालतों की प्रथा' (Practice of Courts) भी नहीं रही है।”
एजेंसी ने यह तर्क दिया कि हाईकोर्ट के अलग-अलग जजों ने आबकारी नीति मामले में रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के आधार पर प्रतिकूल निष्कर्ष दिए। ऐसे निष्कर्ष किसी भी जज के खिलाफ पूर्वाग्रह का आधार नहीं बन सकते।
CBI ने कहा कि अगर याचिकाकर्ताओं के तर्क को मान लिया जाए तो सभी जजों को इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग करना होगा।
जवाब में कहा गया,
"न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जजों की निष्पक्ष फैसले देने की क्षमता को बाहरी दबावों या बेबुनियाद आरोपों के प्रभाव से मुक्त रखते हुए संरक्षित किया जाना चाहिए। वादियों को बेंच की संरचना तय करने की अनुमति देना न्याय की नींव को ही कमजोर करता है और एक खतरनाक मिसाल कायम करता है जिससे न्यायिक प्रणाली में जनता का विश्वास कम हो सकता है।"
इसमें आगे कहा गया,
"सिर्फ इसलिए कि किसी आरोपी ने केस ट्रांसफर करने के लिए अर्जी दी, किसी जज के लिए यह ज़रूरी नहीं है कि वह अपनी अनिच्छा ज़ाहिर करे। कानून के तहत उसे अपना कर्तव्य निभाना ज़रूरी है। उसे अपना कर्तव्य निभाना है, न कि आरोपी द्वारा लगाए गए बेपरवाह आरोपों के दबाव में झुकना है। उससे यह उम्मीद नहीं की जाती कि वह ऐसे आरोपों के प्रति अनावश्यक संवेदनशीलता दिखाए और खुद को केस से अलग कर ले। अगर केस ट्रांसफर करने का आधार यही बन जाए तो इससे न्यायिक प्रक्रिया में अराजकता फैल जाएगी। बेईमान वादी 'बेंच-हंटिंग' (अपनी पसंद की बेंच ढूंढने) में लिप्त हो जाएंगे।"
इस हफ़्ते की शुरुआत में अरविंद केजरीवाल खुद कोर्ट में पेश हुए और खुद ही बेंच से हटने (Recusal) वाली अर्जी पर बहस की। इस मामले पर अगले हफ़्ते विचार किया जाएगा।

