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विवाह के झूठे वादे के बहाने यौन संबंध क्या है, यह परिभाषित करने के लिए संशोधन की आवश्यकताः उड़ीसा उच्‍च न्यायालय

LiveLaw News Network
2 April 2021 1:15 PM GMT
विवाह के झूठे वादे के बहाने यौन संबंध क्या है, यह परिभाषित करने के लिए संशोधन की आवश्यकताः उड़ीसा उच्‍च न्यायालय
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उड़ीसा उच्च न्यायालय ने बुधवार को माना कि बलात्कार के लिए शादी के झूठे वादे पर संभोग रेप के बराबर है, का कानून "गलत प्रतीत होता है"। हालांकि, अदालत कहा कि पीड़ित की हालत और उसकी छवि धूमिल करने में आरोपी की संलिप्तता का आकलन किया जाना जाना चाहिए, जिस पर जमानत के सवाल का फैसला हो रहा है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि विवाह के झूठे वादे के बहाने अभियोजन पक्ष के साथ संभोग करना क्या है, इसे परिभाषित करना वाले कानून में संशोधन की आवश्यकता है।

यह अवलोकन जस्टिस एसके पाणिग्रही की एकल पीठ ने किया। मामले में एक महिला से बलात्कार के आरोपी व्यक्ति, जिसने शादी करने का झूठे बहाना बनाकर महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाया ‌था, की जमानत अर्जी को खारिज कर दिया गया।

महिला ने आरोप लगाया कि आवेदक ने दो बार गर्भवती होने की बाद दवा देकर उसका गर्भपात भी कराया था।

इसके बाद, आवेदक ने शादी से इनकार कर दिया, इसके बावजूद कि पीड़िता के परिवार ने आवेदक के माता पिता से विवाह की सहमति प्राप्त करने के लिए संपर्क किया था। हालांकि, उस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया गया, जिसके बाद महिला के परिवार ने उसकी शादी कहीं और तय कर दी।

आगे आरोप लगाया गया कि 26 अप्रैल 2020 को, आवेदक ने पीड़िता के नाम से एक फर्जी फेसबुक अकाउंट पर बनाकर उसकी निजी तस्वीरें उस पर शेयर की थी, जिसमें उसे बद्-चरित्र की महिला बताया गया। जिसके परिणामस्वरूप, उसकी शादी टूट गई।

इसके बाद धारा 376 (1) (बलात्कार के लिए सजा), धारा 313 (महिला की सहमति के बिना गर्भपात), धारा 294 (अश्लील हरकतें और गाने) और धारा 506 (भारतीय दंड संहिता की आपराधिक धमकी के लिए सजा) और धारा 66 (ई) (गोपनीयता के उल्लंघन के लिए सजा) और सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधन) अधिनियम, 2008 की धारा 67 (ए) (इलेक्ट्रॉनिक रूप में यौन स्पष्ट कृत्य युक्त सामग्री के प्रकाशन या प्रसारण के लिए सजा) के तहत एफआईआर दर्ज की गई।

शादी के झूठे वादे पर संभोग संबंध‌ित कानून में स्पष्टता का अभाव है

कोर्ट ने धारा 90 (डर या गलत धारणा के तहत दी जाने वाली सहमति) और धारा 375 आईपीसी के अंतर्सबंधों का विश्लेषण करते हुए कहा कि भले ही न्यायपालिका इस तरह की अवधारणाओं के उपयोग से निपटी है, हालांकि, "एक निश्चित दृष्टिकोण तक नहीं पहुंचा गया है और अभी भी भ्रम की स्थिति है।"

कोर्ट ने कहा, "शादी के झूठे वादे के बहाने" अभियोजन पक्ष के साथ "संभोग" का गठन करने वाले कानून में संशोधन की आवश्यकता है। जैसा कि वर्तमान परिदृश्य में, इस मामले में कानून में अभ‌ियुक्त की दोषसिद्धि के लिए स्पष्टता का अभाव है।"

कोर्ट ने फैसले में अनुराग सोनी बनाम छत्तीसगढ़ राज्य के एआईआर 2019 एससी 1857 के फैसले पर भरोसा किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि शुरू से ही किसी आरोपी ने वादे को पूरा करने के इरादा जाहिर किए बिना शादी का वादा किया है और इस तरह के वादे के बदले कि आरोपी उससे शादी करेगा, तो ऐसी सहमति वैध सहमति के बराबर नहीं होगी।

"बलात्कार कानूनों का उपयोग अंतरंग संबंधों को विनियमित करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए, खासकर उन मामलों में जहां महिलाएं एजेंसी हैं और पसंद से रिश्ते में प्रवेश कर रही हैं। हालांकि,यह ध्यान देने की जरूरत है कि कई शिकायतें सामाजिक रूप से वंचित और गरीब तबके, समाज और ग्रामीण क्षेत्रों से आती हैं, इन वर्गों की महिलाओं को अक्सर शादी के झूठे वादों पर पुरुषों द्वारा सेक्स का लालच दिया जाता है और फिर गर्भवती होने पर उन्हें डंप कर दिया जाता है। बलात्कार कानून अक्सर उनकी दुर्दशा को समझने में विफल रहता है।"

कोर्ट ने कहा कि चूंकि धारा 375 उन विशिष्ट परिस्थितियों को प्रदान करती है, जब सहमति " असहमति" के बराबर होती है, उक्त प्रावधान एक परिस्‍थ‌िति के रूप में "विवाह के बहाने यौन क्रिया के लिए सहमति" का उल्लेख करने में विफल रहता है।

"इसलिए, आईपीसी की धारा 375 के तहत सहमति के प्रभाव को निर्धारित करने के लिए आईपीसी की धारा 90 के प्रावधानों का स्वत: विस्तार को गंभीर रूप से पुनः देखने की जरूरत है। शादी के झूठे वादे के बहाने बलात्कार का कानून गलत है, हालांकि पीड़ित की हालत और उसकी छवि धूमिल करने में आरोपी की संलिप्तता का आकलन किया जाना जाना चाहिए, जिस पर जमानत के सवाल का फैसला हो रहा है। "

यह देखते हुए कि एफआईआर का अवलोकन आवेदक अभियुक्तों के खिलाफ प्रथम दृष्टया विशिष्ट आरोपों को दर्शाता है, कोर्ट ने उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया।

कोर्ट ने जमानत अर्जी खारिज करते हुए कहा कि, "चार्जशीट में कई अन्य आरोप भी हैं जो बहुत विस्तृत हैं और इन्हें पुन: पेश करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि उपरोक्त अंश यह संकेत देने के लिए पर्याप्त हैं कि आरोप विशिष्ट हैं और सामान्य प्रकृति के नहीं हैं। वे प्रथम दृष्टया मामला बनाते हैं।"

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