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"सुसाइड नोट में लिखे नाम की पूरी गंभीरता के साथ जांच होनी चाहिए": पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय

LiveLaw News Network
3 Aug 2021 10:00 AM GMT
सुसाइड नोट में लिखे नाम की पूरी गंभीरता के साथ जांच होनी चाहिए: पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय
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पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने हाल ही में कहा क‌ि यदि आत्महत्या किए किसी पुरुष/महिला ने ऐसे चरम कृत्य के लिए मजबूर करने के लिए किसी अन्य व्यक्‍ति को जिम्‍मेदार ठहराया है तो उसके इस प्रकार के बयान सभी आवश्यक गंभीरताओं के साथ उठाया जाना चाहिए।

जस्टि‌स एचएस मदान की खंडपीठ ने कहा, "एक व्यक्ति, जो अपने जीवन को खत्म कर इस नश्वर दुनिया को छोड़ रहा है, खुद की मौत के लिए एक निर्दोष व्यक्ति को क्यों दोषी ठहराएगा, यह समझना मुश्किल है।"

मामला

पीठ IPC की धारा 306/34 (IPC की धारा 506 बाद में जोड़ी गई) के तहत दर्ज एफआईआर संख्या 260 के संबंध में एक अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी। अभियोजन पक्ष के मामले के अनुसार, जून 2020 में जोरावर नाम के एक व्यक्ति ने आत्महत्या कर ली। उसने एक सुसाइड नोट छोड़ा, जिसमें उसने वर्तमान याचिकाकर्ता सुधा @ बबली और उसके पति यसपाल को आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी ठहराया था।

मृतक के बेटे द्वारा पुलिस को मामले की सूचना दिए जाने पर प्राथमिकी दर्ज की गई, जिसमें आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ता के कृत्यों ने मृतक को आत्महत्या के लिए मजबूर किया था।

सुसाइड नोट में यह लिखा गया था कि याचिकाकर्ता/आरोपी ने वर्ष 2018 में उससे (मृतक) से संपर्क किया था और उसे अपने घर के निर्माण के लिए पैसे उधार देने के लिए कहा था और उसने फसल बेचने के बाद उसे 11,50,000 रुपये की नकद राशि दी थी।

इसके अलावा, नोट में कह गया था कि जब उसने (मृतक) सुधा और उसके पति से पैसे वापस करने के लिए कहा तो उन्होंने मामला टाल दिया और अंततः उसे धमकी दी और एक बार, जब वह उनके घर गया था तब सुधा ने उसे कॉलर से पकड़ लिया और उसे धमकी दी कि वह उसे मार डालेगी।

न्यायालय की टिप्पणियां

शुरुआत में, कोर्ट ने कहा कि एक इंसान के लिए उसका जीवन बहुत ही कीमती है और इंसान मौत से खौफ खाता है। वह एक लंबा जीवन जीना चाहता है।

कोर्ट ने कहा, " बूढ़ों में भी अधिक जीने की इच्छा होती है। यह बहुत ही बड़ी मजबूरी होती है कि कोई अपना जीवन खत्म कर लेता है और यदि आत्महत्या करने वाले व्यक्ति ने किसी अन्य व्यक्ति को ऐसा चरम कदम उठाने के लिए उसे मजबूर करने का जिम्मेदार ठहराया है, तो उसके इस तरह के बयान को पूरी गंभीरता के साथ उठाने की जरूरत है।"

इसके अलावा, यह देखते हुए कि गिरफ्तारी पूर्व जमानत एक विवेकाधीन राहत है और असाधारण मामलों में दी जानी है न कि नियमित रूप से, कोर्ट ने कहा कि तत्काल मामले में, याचिकाकर्ता की हिरासत में पूछताछ पूर्ण और प्रभावी जांच के लिए आवश्यक थी ताकि पता लगाया जा सके कैसे और किन परिस्थितियों में उसने मृतक को आत्महत्या के लिए उकसाया।

कोर्ट ने आगे कहा, "मामले में याचिकाकर्ताओं की कस्टोडियल पूछताछ की अनुमति जांच एजेंसी को नहीं दी गई है, जिसने जांच को प्रभावित करने वाले कई सिरों को ढीला छोड़ दिया है, जिससे जांच पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है..।"

इसलिए, मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के मद्दनजर कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।

केस टाइटिल- सुधा @ बबली बनाम हरियाणा राज्य

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