पत्रकार पर कथित तौर पर डॉक्टर से पैसे ऐंठने का आरोप, हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने से किया इनकार

Shahadat

19 May 2026 10:00 AM IST

  • पत्रकार पर कथित तौर पर डॉक्टर से पैसे ऐंठने का आरोप, हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने से किया इनकार

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक पत्रकार की याचिका खारिज की, जिसमें उसने निजी एलोपैथी डॉक्टर द्वारा लगाए गए जबरन वसूली के आरोपों से जुड़ी FIR रद्द करने की मांग की। कोर्ट ने कहा कि जांच अभी शुरुआती चरण में है और पत्रकार का पिछला आपराधिक रिकॉर्ड देखते हुए कार्यवाही रद्द करना जल्दबाजी या अनुचित होगा।

    जस्टिस राजेश कुमार गुप्ता की बेंच ने यह टिप्पणी की:

    "चूंकि जांच अभी भी शुरुआती चरण में है और याचिकाकर्ता (तथा उसके साथियों) का आपराधिक इतिहास रिकॉर्ड पर आ चुका है, इसलिए कार्यवाही को रद्द करना जल्दबाजी और अनुचित होगा।"

    एक पत्रकार ने भिंड जिले में दर्ज एक FIR रद्द करने की मांग करते हुए याचिका दायर की थी, जिसमें उस पर BNS की धारा 308 के तहत जबरन वसूली का आरोप लगाया गया।

    मामले के तथ्यों के अनुसार, डॉ. हरमेंद्र सिंह ने 2 मई, 2025 को शिकायत दर्ज कराई, जिसमें आरोप लगाया गया कि 30 अप्रैल, 2025 को याचिकाकर्ता अन्य पत्रकार (प्रीतम सिंह) के साथ उनके पास आया था। शिकायत में आरोप लगाया गया कि उनके पास BAMS की डिग्री है, लेकिन वे एक बिना रजिस्टर्ड क्लिनिक में एलोपैथी पद्धति से इलाज कर रहे थे।

    याचिकाकर्ता और उसके साथी ने कथित तौर पर उनसे हर महीने 5,000 रुपये देने की मांग की। जब उन्होंने पैसे देने से इनकार किया तो उन्होंने शिकायतकर्ता को धमकी दी कि वे तब तक उनके खिलाफ रोज़ाना खबरें छापते रहेंगे, जब तक कि उनका क्लिनिक बंद नहीं हो जाता।

    शिकायतकर्ता ने आगे आरोप लगाया कि 1 मई, 2025 को याचिकाकर्ता ने उसे WhatsApp पर क्लिनिक के बारे में एक लेख भेजा। FIR में 1 मई, 2025 को 'बेजोड़ रत्न' अखबार में छपी एक खबर का भी ज़िक्र है, जिसे याचिकाकर्ता ने ही लिखा था और जिसमें शिकायतकर्ता के क्लिनिक के अवैध संचालन का विस्तृत ब्योरा दिया गया।

    याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि उसने हाल ही में चंबल नदी में चल रही अवैध रेत माफिया की गतिविधियों के बारे में रिपोर्टिंग की थी। ये गतिविधियां रेत माफिया द्वारा स्थानीय पुलिस की मिलीभगत से चलाई जा रही थीं। इस बात से नाराज़ होकर एसपी यादव ने याचिकाकर्ता को अपने साथ चाय पीने के लिए बुलाया, जहां उसे और उसके साथ आए दूसरे पत्रकार को अपने अंतर्वस्त्रों तक कपड़े उतारने पर मजबूर किया गया और उनके साथ मारपीट भी की गई।

    याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि हाल ही में ऐसी कई घटनाएं हुई हैं, जिसके चलते स्टेट प्रेस क्लब ने 3 मई, 2025 को एक बयान जारी कर पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी।

    प्रतिवादियों के वकील ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ने कथित तौर पर एक पत्रकार के तौर पर अपनी हैसियत का इस्तेमाल लोगों से वसूली और उन्हें ब्लैकमेल करने के लिए किया।

    अदालत ने सबसे पहले इस बात को दोहराया कि यदि किसी जानकारी से किसी संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) के होने का पता चलता है तो शिकायतकर्ता/पुलिस की कोई निजी रंजिश या कोई छिपा हुआ मकसद होना, जांच को उसके शुरुआती चरण में ही रोकने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है।

    अदालत ने गौर किया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ लगाए गए आरोप तथ्यों से जुड़े विवादित सवाल हैं। इसलिए उनकी जांच हाई कोर्ट द्वारा नहीं की जा सकती, बल्कि उनका फैसला ट्रायल कोर्ट द्वारा किया जाना है।

    इसके अलावा, पत्रकार द्वारा हिरासत में दुर्व्यवहार के आरोपों के संबंध में, अदालत ने यह टिप्पणी की:

    "याचिकाकर्ता और स्थानीय पुलिस के बीच किसी समानांतर विवाद के होने से याचिकाकर्ता को किसी निजी मेडिकल प्रैक्टिशनर द्वारा दर्ज कराई गई किसी विशिष्ट, तीसरे पक्ष की शिकायत की जांच से छूट नहीं मिल जाती।"

    इस प्रकार, यह देखते हुए कि जांच अभी शुरुआती चरण में थी और याचिकाकर्ता का आपराधिक इतिहास रहा है, अदालत ने कार्यवाही रद्द करना जल्दबाजी भरा कदम माना।

    Case Title: Shashikant Jatav v State of Madhya Pradesh, WP-34590-2025

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