केवल ईमेल और फॉर्म 16A नियोक्ता-कर्मचारी संबंध स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं है: फ्रीलांसिंग पर दिल्ली हाईकोर्ट
Avanish Pathak
27 Sept 2022 11:07 AM IST

दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि फ्रीलांसिंग में मालिक-नौकर का कोई रिश्ता नहीं होता। फ्रीलांसर अपना मालिक खुद होता है। उसके पास अपने असाइनमेंट चुनने की क्षमता होती है, जिससे वह कई नियोक्ताओं के लिए भी काम कर सकता है।
जस्टिस दिनेश कुमार शर्मा ने कहा कि एक फ्रीलांसर वह होता है, जो किसी संगठन से संबद्ध या अधिकृत हुए बिना स्वतंत्र रूप से कार्य करता है और इस प्रकार अंशकालिक, पूर्णकालिक या संविदा कर्मचारियों से अलग होता है।
कोर्ट ने कहा,
"फ्रीलांसर या फ्रीलांसिंग शब्द का प्रयोग मौजूदा दौर में एक ऐसे व्यक्ति के लिए किया जाता है, जो किसी विशेष अवधि के लिए अलग-अलग नियोक्ताओं को अपनी सेवाएं और कौशल को बेचने को बिजनेस में एक स्वतंत्र कॉन्ट्रेक्टर है।"
कोर्ट ने यह टिप्पणी एक कामगार की याचिका को खारिज करते हुए की, जिसने 2011 में एक ट्रैवल एजेंसी के साथ 'स्वीकृत अंशकालिक फॉरेन लैंग्वेज लिंग्विस्ट गाइड' के रूप में काम करना शुरू किया और लगभग तीन साल की अवधि तक काम किया। उन्हें कोई नियुक्ति पत्र जारी नहीं दिया गया था।
कामगार ने दावा किया कि कंपनी के प्रबंधन ने मार्च 2014 में बिना कोई नोटिस दिए, कोई पूछताछ किए या कोई वैध कारण बताए बिना उसकी सेवाओं को अवैध रूप से समाप्त कर दिया।
इसके लिए उन्होंने प्रबंधन को डिमांड नोटिस भेजा, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। इसके बाद, कामगार ने दावा किया कि प्रबंधन ने उसके लंबित भुगतानों को तुरंत जारी कर दिया, लेकिन उसे बहाल नहीं किया गया।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि प्रबंधन के कार्य औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के प्रावधानों का उल्लंघन था।
उन्होंने 7 जून, 2018 को श्रम न्यायालय द्वारा पारित एक आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां कहा गया कि वह कंपनी के साथ नियोक्ता-कर्मचारी संबंध के अस्तित्व को स्थापित करने में विफल रहे और इस प्रकार अवैध या अनुचित टर्मिनेशन का कोई सवाल ही नहीं था। इसलिए उनके दावे के बयान को किसी भी गुण से रहित होने के कारण खारिज कर दिया गया था।
श्रम न्यायालय के आदेश को बरकरार रखते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि यह सही है कि कर्मचारी प्रबंधन के साथ नियोक्ता-कर्मचारी के संबंध स्थापित करने में विफल रहा है।
कोर्ट ने कहा, "याचिकाकर्ता की ओर से साक्ष्य के रूप में दायर किए गए दस्तावेजों का अवलोकन, जिसमें विभिन्न ईमेल और 16 ए के तहत फॉर्म शामिल हैं, किसी भी तरह से यह साबित नहीं करते हैं कि पार्टियों के बीच नियोक्ता-कर्मचारी का कोई संबंध था।"
कोर्ट ने कहा कि फॉर्म 16 ए स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि प्रबंधन द्वारा "कॉन्टेक्टर और सब-कॉन्टेक्टर को किए गए भुगतान के शीर्षक" के तहत याचिकाकर्ता को किए गए भुगतानों के संबंध में टीडीएस काटा गया था। इस प्रकार याचिकाकर्ता को कामगार की परिभाषा के अंतर्गत नहीं माना गया, जैसा कि आईडी एक्ट की धारा 2 (एस) के तहत बताया गया है।"
कोर्ट ने नोट किया कि याचिकाकर्ता कंपनी के साथ असाइनमेंट के आधार पर एक गाइड के रूप में काम कर रहा था, उसे वेतन या अन्यथा के रूप में कोई नियमित राशि प्रदान नहीं की गई थी और केवल असाइनमेंट के आधार पर भुगतान किया गया था।
कोर्ट ने यह भी कहा कि पर्यटन और संस्कृति मंत्रालय द्वारा याचिकाकर्ता को जारी किए गए लाइसेंस से प्रबंधन के साथ उसका कोई नियोक्ता-कर्मचारी संबंध स्थापित नहीं हुआ। कोर्ट ने कहा कि लाइसेंस केवल यह दिखाता है कि याचिकाकर्ता 'स्वीकृत पार्ट टाइम जर्मन भाषाई गाइड' था और प्रबंधन के साथ नियोक्ता-कर्मचारी के संबंध को साबित नहीं कर सका।
कोर्ट ने कहा,
"मेरे विचार में याचिकाकर्आ की ओर से पेश दस्तावेज नियोक्ता-कर्मचारी संबंध स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं..। इन दस्तावेजों का मूल्य तभी होगा जब अधिक स्वीकार्य साक्ष्य पेश किए जाएं, जैसे कि ईएसआई, पीपीएफ रिकॉर्ड या पीपीएफ नंबर आदि..अगर कर्मचारी वहां काम कर रहा होता तो कंपनी किस दायित्व से बच नहीं पाती।"
केस टाइटल: कौशल किशोर सिंह बनाम मेसर्स सीता कुओनी वर्ल्ड ट्रैवल इंडिया लिमिटेड।

