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महमूद प्राचा के कार्यालय पर छापेमारी का मामला : दिल्ली पुलिस मुवक्किल के निर्देश के तहत अधिकारियों को दस्तावेज भेजने के प्राचा के प्रस्ताव की जांच करेगी

LiveLaw News Network
4 Nov 2021 8:18 AM GMT
महमूद प्राचा के कार्यालय पर छापेमारी का मामला :  दिल्ली पुलिस मुवक्किल के निर्देश के तहत अधिकारियों को दस्तावेज भेजने के प्राचा के प्रस्ताव की जांच करेगी
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दिल्ली की एक अदालत को दिल्ली पुलिस ने इस हफ्ते बताया कि वह अधिवक्ता महमूद प्राचा के अपने मुवक्किल के निर्देशों के तहत उत्तर पूर्वी दिल्ली दंगों के मामले में संबंधित अधिकारियों को मसौदा तैयार करने और संबंधित दस्तावेजों को भेजने के के संबंध में दिए गए प्रस्ताव की जांच करेगी।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा प्राचा द्वारा दायर एक पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। इसमें सीएमएम के आदेश को चुनौती दी गई थी। इस आदेश में उनके कार्यालय में दिल्ली पुलिस के विशेष प्रकोष्ठ के छापे को चुनौती देने वाले उनके आवेदन को खारिज कर दिया गया था।

प्राचा द्वारा प्रस्तुत किया गया कि अपने अन्य क्लाइंट्स के अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए वह अधिकारियों को दस्तावेज भेजने के लिए तैयार है और इस मामले में तलाशी लेने का कोई उद्देश्य नहीं है।

दूसरी ओर, विशेष लोक अभियोजक अमित प्रसाद ने प्रस्ताव की जांच करने और उसके बाद अदालत के समक्ष दलीलें पेश करने के लिए कुछ समय के लिए स्थगन की मांग की।

दलीलें सुनने के उद्देश्य से मामले को 15 नवंबर तक के लिए स्थगित कर दिया गया।

विवाद का विषय यह है कि एक शरीफ मलिक की नौ मई, 2020 की शिकायत और 22 मई, 2020 को इरशाद अली को जारी नोटिस के जवाब से संबंधित एक ईमेल प्राचा द्वारा तैयार किया गया था। यह ईमेल उनके द्वारा विभिन्न अधिकारियों को भेजा गया था। मामले की जांच का विषय एफआईआर नंबर 120/20 पीएस दयाल पुर पर आधारित है।

इससे पहले, कोर्ट ने कोर्ट में सबसे कम उम्र के वकील को स्थानीय आयुक्त नियुक्त किया था। उनकी देख-रेख में प्राचा के कार्यालय से कंप्यूटर स्रोत को जब्त करने और सील करने की प्रक्रिया जांच अधिकारी (आईओ) द्वारा शुरू की जानी थी।

मामले के बारे में

एडवोकेट महमूद प्राचा ने 9 मार्च 2021 को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा की गई दूसरी छापेमारी के खिलाफ दिल्ली कोर्ट का रुख किया था, जिसमें इस तरह की छापेमारी को "पूरी तरह से गैर-कानूनी और अन्यायपूर्ण" बताया था। एडवोकेट प्राचा पिछले साल फरवरी में दिल्ली में हुए दंगों की साजिश के कई आरोपियों की कोर्ट में पैरवी कर रहे हैं।

दिल्ली पुलिस ने पिछले साल दिसंबर में भी एडवोकेट महमूद प्राचा के दफ्तर पर छापा मारा था, जिसमें कहा गया था कि प्रचा के लॉ फर्म के आधिकारिक ईमेल पते के "गुप्त दस्तावेजों" और "आउटबॉक्स के मेटाडेटा" की जांच स्थानीय अदालत की ओर से जारी वारंट के आधार पर की गई। एडवोकेट प्राचा ने आरोप लगाते हुए कहा कि दूसरा छापेमारी करने का एकमात्र उद्देश्य अवैध रूप से संवेदनशील मामलों के पूरे डेटा को चुरा रहा था। प्राचा ने अपने आवेदन में कहा कि एक वकील का कर्तव्य है कि वह केवल अपने क्लाइंट संबंधित डेटा और जानकारी की रक्षा करना।

इसके साथ ही यह मेरा मौलिक अधिकार भी है। कोर्ट के समक्ष पिछली सुनवाई के दौरान एडवोकेट प्राचा ने प्रस्तुत किया था कि, "अपने क्लाइंट के हितों की रक्षा करना मेरा मौलिक और संवैधानिक अधिकार है। अपनी अखंडता को बचाने के लिए उन्होंने जानबूझकर मेरे और मेरे क्लाइंट्स के जीवन को खतरे में डाल दिया है। यह बहुत ही संवेदनशील डेटा है। वे अपने राजनीतिक आकाओं के तहत कार्य करना चाहते हैं। मैं ऐसा नहीं कर सकता। यदि आप मुझे फांसी देना चाहते हैं, तो दें। लेकिन मैं अपने वकील के विशेषाधिकार का त्याग नहीं कर सकता।

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