हिजाब प्रतिबंध - याचिकाकर्ता और प्रतिवादी सहमत हों तभी मध्यस्थता के अनुरोध पर विचार किया जा सकता है : कर्नाटक हाईकोर्ट

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    Mediation Request Can Be Considered Only If Petitioners & Respondents Agree: Karnataka HC

    हिजाब मामले में मध्यस्थता की याचिका पर जवाब देते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट ने गुरुवार को कहा कि मध्यस्थता तभी संभव है, जब याचिकाकर्ता और प्रतिवादी (राज्य और कॉलेज विकास समिति) दोनों इस पर सहमत हों।

    पूर्ण पीठ मामले में मध्यस्थता के लिए एक वकील द्वारा किए गए मौखिक अनुरोध का जवाब दे रही थी। वकील ने कहा कि निर्णय जो भी हो, समस्याएं होंगी और इसलिए समस्या को हल करने के लिए मध्यस्थता का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि मुस्लिम लड़कियों के अधिकारों का हनन किया जा रहा है।

    हालांकि कॉलेजों में हिजाब पर प्रतिबंध को चुनौती देने वाली मुस्लिम छात्रों द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही पीठ ने संदेह व्यक्त किया कि क्या संवैधानिक तरीके से मध्यस्थता संभव हो सकती है।

    मुख्य न्यायाधीश रितु राज अवस्थी ने कहा ,

    "इसमें संवैधानिक मुद्दे शामिल हैं। हमें उन मुद्दों का जवाब देना होगा। मध्यस्थता कैसे संभव हो सकती है? ऐसे मामलों में इस तरह से मध्यस्थता नहीं की जा सकती।"

    इस पर वकील ने कहा कि वह इस मामले में मध्यस्थता की सफलता को लेकर आश्वस्त हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि मध्यस्थता वस्तुतः भी की जा सकती है।

    मुख्य न्यायाधीश ने कहा,

    "कृपया मूल सिद्धांत को समझने की कोशिश करें कि इस विचार पर सहमत पक्षकारों के बीच मध्यस्थता की जा सकती है। आप पहले अन्य याचिकाकर्ताओं और प्रतिवादियों के पास जाएं और यदि वे सभी सहमत हैं तो हम आपके अनुरोध पर विचार करेंगे।"

    हाईकोर्ट में गुरुवार को मामले में कोई बड़ा घटनाक्रम नहीं हुआ क्योंकि बेंच ने मुख्य रूप से कुछ जनहित याचिकाओं पर विचार किया।

    महाधिवक्ता प्रभुलिंग नवदगी ने याचिकाकर्ताओं द्वारा पिछले चार दिनों में की गई दलीलों के जवाब में अपनी दलीलें शुरू करने के लिए शुक्रवार तक का समय मांगा।

    मुख्य न्यायाधीश रितु राज अवस्थी , जस्टिस कृष्णा एस दीक्षित और जस्टिस जेएम खाजी की खंडपीठ ने मामले में हस्तक्षेप आवेदन दाखिल करने वालों को सुनने के लिए अपनी अनिच्छा को दोहराया।

    उन्होंने कहा,

    " हम हस्तक्षेप आवेदनों की अवधारणा को समझने में विफल हैं। हम याचिकाकर्ताओं और फिर उत्तरदाताओं को सुन रहे हैं। अगर हमें आवश्यकता होगी तो हम आपकी सहायता लेंगे। आपको सही तरीके से सुनवाई के लिए नहीं पूछना चाहिए। हमें किसी के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। "

    पीठ ने इस मामले में अधिवक्ता रहमतुल्लाह कोतवाल के माध्यम से एक कथित सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा दायर एक जनहित याचिका खारिज कर दी, जिसमें कहा गया था कि याचिकाकर्ता ने जनहित याचिका नियमों के तहत अपनी वास्तविकता के बारे में घोषणा नहीं की और इसलिए यह याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।

    कॉलेज जाने वाली पांच लड़कियों द्वारा हिजाब पहनने की अनुमति की मांग करने वाली एक अन्य याचिका को इस आधार पर खारिज कर दिया गया था कि याचिका में उस संस्थान के विवरण का उल्लेख नहीं किया गया है जिसमें वे पढ़ रही हैं। हालांकि, उन्हें सभी विवरणों के साथ नए सिरे से याचिका दाखिल करने की स्वतंत्रता दी गई थी।

    याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता प्रोफेसर रविवर्मा कुमार ने बुधवार को तर्क दिया कि राज्य मुस्लिम लड़कियों के साथ केवल उनके धर्म के आधार पर भेदभाव कर रहा है। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि 5 फरवरी के सरकारी आदेश में हिजाब पहनने को निशाना बनाया गया है जबकि अन्य धार्मिक प्रतीकों को ध्यान में नहीं रखा गया है। इससे संविधान के अनुच्छेद 15 का उल्लंघन करते हुए शत्रुतापूर्ण भेदभाव होता है।

    बेंच ने सुनवाई के दौरान मामले में हस्तक्षेप आवेदन दाखिल करने वालों को सुनने में अनिच्छा व्यक्त की। मुख्य न्यायाधीश ने कहा, "

    याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ अधिवक्ता कर रहे हैं। हस्तक्षेप आवेदनों पर विचार करने का सवाल कहां है? इन आवेदनों से अदालत का समय बर्बाद होगा। यदि पीठ को और सहायता की आवश्यकता महसूस होती है तो हस्तक्षेप करने वालों को बाद में सुना जा सकता है।"

    शिक्षा अधिनियम या नियमों के तहत हिजाब पहनना प्रतिबंधित नहीं : कुमार वरिष्ठ अधिवक्ता प्रो. रविवर्मा कुमार के सबमिशन का पहला भाग यह था कि कर्नाटक शिक्षा अधिनियम और उसके तहत बनाए गए नियमों द्वारा प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेजों के लिए कोई अनिवार्य यूनिफॉर्म निर्धारित नहीं है। उन्होंने बताया कि शैक्षणिक वर्ष 2021-22 के लिए पीयू शिक्षा विभाग द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के तहत सरकारी कॉलेजों के लिए कोई यूनिफॉर्म निर्धारित नहीं है। केस शीर्षक: रेशम और अन्य बनाम कर्नाटक राज्य

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