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श्रीकृष्ण जन्म भूमि पर बनी मस्जिद को हटाने के मामले में दायर मुकदमे को खार‌िज करने के फैसले के खिलाफ दायर अपील को मथुरा जिला अदालत ने स्वीकार किया

LiveLaw News Network
17 Oct 2020 4:30 AM GMT
श्रीकृष्ण जन्म भूमि पर बनी मस्जिद को हटाने के मामले में दायर मुकदमे को खार‌िज करने के फैसले के खिलाफ दायर अपील को मथुरा जिला अदालत ने स्वीकार किया
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कथ‌ित रूप से श्रीकृष्ण जन्म भूमि पर बनी मस्जिद ईदगाह को हटाने के मामले में दायर मुकदमे को खार‌िज करने के सिविल जज, मथुरा के फैसले के खिलाफ दायर अपील को मथुरा जिला अदालत ने शुक्रवार (16 अक्टूबर) को स्वीकार कर ‌लिया।

जिला न्यायाधीश साधना रानी ठाकुर ने शुक्रवार (16 अक्टूबर) को उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड, ट्रस्ट मस्जिद ईदगाह, श्रीकृष्ण जन्मस्थान ट्रस्ट और श्रीकृष्ण जन्मभूमि सेवा संघ को नोटिस जारी किए। मामले की अगली सुनवाई गुरुवार (19 नवंबर) को होगी।

केस की पृष्ठभूमि

इससे पहले, सोमवार (12 अक्टूबर) को मथुरा जिला अदालत ने श्रीकृष्ण जन्म भूमि मामले को लेकर सभी कोर्ट रिकॉर्ड तलब किए थे। इसके बाद, जिला न्यायाधीश की अदालत ने शुक्रवार (16 अक्टूबर, 2020) को सुनवाई के लिए मामला पोस्ट किया था।

उल्लेखनीय है कि स्वीकार की गई स‌िविल अपील को 'भगवान श्रीकृष्ण विरजमान' की ओर से, अगली मित्र रंजना अग्निहोत्री, 'श्री कृष्ण जन्मभूमि' के माध्यम से दायर की गई है।

अपीलकर्ताओं ने अपनी अपील में दावा किया है कि सिविल जज ने उनके मुकदमे को खारिज करने में गलती की है। वे भगवान श्री कृष्ण के भक्त हैं और उन्हें संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत भगवान कृष्ण के वास्तव‌िक जन्मस्थान पर पूजा और दर्शन का अधिकार अधिकार है , जो इस समय मुसलमानों द्वारा अवैध रूप से उठाए गए ढांचे के नीचे है।

अपील में कहा गया है, "यह उपासकों का अधिकार और कर्तव्य है कि वे देवता की खोई हुई संपत्ति को वापस लाने के लिए और मंदिर और देवताओं की संपत्ति की सुरक्षा और उचित प्रबंधन के लिए हर कदम उठाए।"

अपील में विशेष रूप से कहा गया है कि सिविल जज (अपने 30 सितंबर के आदेश में) ने उल्लेख किया कि समझौता मस्जिद ईदगाह और कृष्णा जनमस्थान ट्रस्ट के बीच किया गया था, जबकि वादी पक्ष ने स्पष्ट रूप से वादी में कहा था कि श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ और ट्रस्ट मस्जिद ईदगाह के बीच समझौता किया गया था; और श्री कृष्ण जन्मस्थान ट्रस्ट समझौता में पार्टी नहीं थी और उसने मुकदमा दायर नहीं किया था।

अपील में आरोप लगाया गया है कि उक्त निर्णय को तथ्य की गलत धारणा पर आधारित है और म‌स्तिष्क का अनुप्रयोग नहीं किया गया है। जिला न्यायालय, मथुरा में अधिवक्ता हरि शंकर जैन, विष्णु शंकर जैन और पंकज कुमार वर्मा ने उक्त अपील दायर की है।

सिविल जज का 30 सितंबर को दिया गया आदेश

सिविल कोर्ट ने मुकदमे को खारिज करते हुए कहा था कि इस प्रकार के मुकदमों की स्थापना सेवायत (Shebait) के माध्यम से की जाती है, अदालत ने नोट किया था कि उक्‍त मुकदमें को सेवायत के माध्यम से स्थापित नहीं किया गया था।

न्यायालय ने उल्लेख किया था कि श्री कृष्ण को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है, और दुनिया भर में श्री कृष्ण के अनंत भक्त हैं।

महत्वपूर्ण रूप से, न्यायालय ने कहा था कि यदि प्रत्येक और सभी श्रद्धालुओं को ऐसे मुकदमों स्‍थापित करने की अनुमति दी जाती है, तो यह न्यायिक और सामाजिक व्यवस्था को खतरे में डाल देगा।

न्यायालय ने टिप्पणी की थी कि वादी को, भक्त होने के आधार पर, मुकदमा चलाने की अनुमति देना न्यायसंगत नहीं है और कानूनी रूप से अस्थिर है और कानून में भक्तों द्वारा मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं है।

उपरोक्त तर्कों के आधार पर हुए, अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची थी कि वर्तमान मामले में वादी को मुकदमा करने का अधिकार नहीं है और इसलिए मामला दर्ज करने के लिए कोई आधार नहीं हैं। इसलिए मुकदमा खार‌िज कर दिया गया था।

अपील में क्या कहा गया है

न्यायालय के तर्कों को खारिज करते हुए, अपीलकर्ताओं ने अपनी अपील में कहा है कि मुकदमा इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता है कि कई लोग अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

उन्होंने बताया कि न‌िचली अदालत "सीपीसी के नियम 8 के आदेश 1 के प्रावधान पर ध्यान देने में विफल रहा है और क‌ि उचित मामले में अदालत को किसी भी मुकदमे को प्रतिनिधि मुकदमा मानने की शक्ति है, जब उसमें कई व्यक्तियों के हित शामिल हों।"

गौरतलब है कि सिविल कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि अपीलकर्ताओं को 'मुकदमा करने का अधिकार' नहीं है।

आदेश को चुनौती देते हुए अपील में कहा गया है, "मुकदमा दायर करने के अधिकार के बारे में सवाल संक्षिप्त तरीके से तय नहीं किया जा सकता है। मुकदमे के प्रवेश के समय अदालत स्वतः संज्ञान लेकर मुकदमा चलाने के अध‌िकार का फैसला नहीं कर सकती है। निचली अदालत ने वादी के वकील अपना पक्ष रखने के लिए बुलाया तक नहीं।"

वादी और विवाद

मामले में पहला याचिकाकर्ता स्वयं भगवान को बनाया गया है, जिन्हें नाबालिग बताया गया है, जो कि सेवायत के माध्यम से मुकदमा दायर कर सकते हैं और अगले मित्र के माध्यम से उसकी अनुपस्थिति में मुकदमा दायर कर सकते हैं।

दूसरा वादी श्री कृष्ण जन्मभूमि को बनाया गया है, जिसका वादी के अनुसार धार्मिक ग्रंथों के साथ-साथ हिंदू कानून के तहत भी "विशेष महत्व" है। अन्य वादी भक्त हैं।

यह आरोप लगाया गया कि 1968 में, सोसाइटी श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ ने ट्रस्ट म‌स्जिद ईदगाह की प्रबंधन समिति के साथ समझौता किया, और उन्हें देवता की संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा दे दिया।

इस समझौते की वैधता पर सवाल उठाते हुए वादी ने कहा, "यह उल्लेख करना प्रासंगिक है कि श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ का कटरा केशवदेव की संपत्ति में कोई स्वामित्व या स्वामित्व का अधिकार नहीं है, जो देवता और ट्रस्ट में निहित है।"

आगे कहा गया, "मूल कारगार यानी भगवान कृष्ण का जन्मस्थान प्रबंधन समिति यानी ट्रस्ट मस्जिद ईदगाह द्वारा किए गए निर्माण के नीचे है। असली तथ्य खुदाई के बाद अदालत के सामने आएगा।"

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