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लिव-इन रिलेशन में विवाहित महिला-''ऐसी अवैधता की अनुमति नहीं दी जा सकती'': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 5 हजार जुर्माने के साथ संरक्षण याचिका खारिज की

LiveLaw News Network
17 Jun 2021 8:00 AM GMT
लिव-इन रिलेशन में विवाहित महिला-ऐसी अवैधता की अनुमति नहीं दी जा सकती:  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 5 हजार जुर्माने के साथ संरक्षण याचिका खारिज की
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यह देखते हुए कि महिला पहले से ही शादीशुदा है और किसी अन्य पुरुष के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में है, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को उसकी सुरक्षा याचिका को 5 हजार जुर्माने के साथ खारिज कर दिया।

न्यायमूर्ति कौशल जयेंद्र ठाकर और न्यायमूर्ति दिनेश पाठक की खंडपीठ ने कहा किः

''हम यह समझने में विफल हैं कि इस तरह की याचिका को कैसे स्वीकार किया जा सकता है,जो समाज में अवैधता को अनुमति देती हो।''

याचिकाकर्ता नंबर 1 (महिला) बालिग है और वह याचिकाकर्ता नंबर 2 (बालिग पुरुष) के साथ लिव-इन-रिलेशन में रह रही है। उन्होंने अपनी सुरक्षा याचिका में मांग की है कि प्रतिवादियों को परमादेश की प्रकृति में निर्देश दिया जाए कि वे कोई कठोर उपाय अपनाकर उनके शांतिपूर्ण लिव-इन-रिलेशन में कोई हस्तक्षेप न करें।

इस पर, अदालत ने कहा किः

''क्या हम उन लोगों को सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं जो ऐसा करना चाहते हैं जिसे हिंदू विवाह अधिनियम के जनादेश के खिलाफ एक कार्य माना जा सकता है। भारत के संविधान का आर्टिकल 21 किसी व्यक्ति को अपनी स्वतंत्रता की अनुमति देता है लेकिन स्वतंत्रता उस कानून के दायरे में होनी चाहिए जो उन पर लागू होता है।''

इसके अलावा, कोर्ट ने पाया कि महिला प्रतिवादी संख्या 5 की कानूनी रूप से विवाहित पत्नी है। इसलिए कोर्ट ने कहा कि,

''उसने किसी भी कारण से अपने पति से दूर जाने का फैसला किया है, क्या हम उन्हें जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा की आड़ में ऐसे संबंध में रहने की अनुमति दे सकते हैं।''

गौरतलब है कि कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर उसके पति ने कोई ऐसा काम किया है जिसे आईपीसी की धारा 377 के तहत अपराध कहा जा सकता है,तो उसने कोई शिकायत क्यों नहीं की?, यह सब तथ्यों के विवादित प्रश्न हैं।

हाल ही में पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने एसएसपी, फरीदकोट को निर्देश दिया था कि उस विवाहित महिला और अविवाहित पुरुष की शिकायत पर विचार करे, जो लिव-इन रिलेशनशिप में रहते हैं और उन्होंने निजी पक्षकारों से अपने जीवन और स्वतंत्रता को खतरा बताते हुए सुरक्षा देने की मांग की है।

न्यायमूर्ति विवेक पुरी की पीठ ने याचिकाकर्ताओं (विवाहित महिला और अविवाहित पुरुष) की शिकायत पर विचार करने के लिए वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, फरीदकोट को निर्देश देते हुए उनकी याचिका का निपटारा कर दिया था।

एक अन्य मामले में याचिकाकर्ताओं (अविवाहित महिला व विवाहित पुरुष) द्वारा जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा की मांग करते हुए दायर एक याचिका पर विचार करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा था किः

''एक विवाहित और अविवाहित व्यक्ति के बीच लिव-इन-रिलेशनशिप की अनुमति नहीं है।''

न्यायमूर्ति पंकज भंडारी की पीठ 29 साल की एक महिला और 31 साल के एक पुरुष की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिन्होंने जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा की मांग की थी।

एक लिव-इन-कपल की सुरक्षा याचिका पर विचार करते हुए (जिनकी अभी विवाह योग्य आयु नहीं हुई हैं) पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा था कि लिव-इन जोड़ों की अधिकांश याचिकाओं में औपचारिक प्रतीकात्मक दलीलें होती हैं, जो काल्पनिक कार्रवाई के कारणों पर आधारित होती हैं और शायद ही कभी किसी खतरे के 'वास्तविक' अस्तित्व पर आधारित पाई जाती हैं।

जस्टिस मनोज बजाज की बेंच दया राम (20 साल) और रीनू (14 साल) की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिन्होंने दावा किया था कि वे एक-दूसरे को पिछले एक साल से जानते हैं और समय बीतने के साथ उन्हें आपस में प्यार हो गया है। हालांकि, रीनू के माता-पिता उनके रिश्ते का विरोध कर रहे हैं।

एक इंटर-फेथ कपल की याचिका पर विचार( जिन्होंने आरोप लगाया था कि निजी प्रतिवादी उनके वैवाहिक जीवन और स्वतंत्रता में हस्तक्षेप कर रहे हैं) करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में स्पष्ट किया था कि याचिकाकर्ताओं की स्वतंत्रता में कोई हस्तक्षेप न करें,यह सुनिश्चित करते समय ये तथ्य प्रासंगिक नहीं होगा कि याचिकाकर्ता (लड़की) ने इस्लाम अपना लिया है।

न्यायमूर्ति सलिल कुमार राय की खंडपीठ एक लड़की (20 वर्ष की आयु,जिसने इस्लाम अपना लिया है) और पुरुष (40 वर्ष की आयु) की याचिका पर सुनवाई कर रही थी और उन्होंने प्रतिवादियों को उनके वैवाहिक जीवन और स्वतंत्रता में हस्तक्षेप न करने का निर्देश देने की मांग की थी।

केस का शीर्षक- श्रीमती गीता व एक अन्य बनाम यू.पी. राज्य व 4 अन्य

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