राजीव गांधी हत्याकांड के दोषी पेरारिवलन के वकील के तौर पर एनरोलमेंट को चुनौती, हाईकोर्ट ने जारी किया नोटिस

Shahadat

6 May 2026 7:33 PM IST

  • राजीव गांधी हत्याकांड के दोषी पेरारिवलन के वकील के तौर पर एनरोलमेंट को चुनौती, हाईकोर्ट ने जारी किया नोटिस

    मद्रास हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई, जिसमें राजीव गांधी हत्याकांड के दोषियों में से एक ए.जी. पेरारिवलन के तमिलनाडु और पुडुचेरी बार काउंसिल में वकील के तौर पर एनरोलमेंट को चुनौती दी गई।

    जस्टिस एस. सौंथर और जस्टिस पी.बी. बालाजी की वेकेशन बेंच ने प्रतिवादियों बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI), तमिलनाडु और पुडुचेरी बार काउंसिल, एनरोलमेंट कमेटी के चेयरमैन और पेरारिवलन को नोटिस जारी किया है। इस नोटिस का जवाब 4 हफ़्तों के भीतर देना होगा।

    गौरतलब है कि पेरारिवलन को सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में रिहा किया था। उन्होंने इस साल 27 अप्रैल को वकील के तौर पर अपना एनरोलमेंट कराया। इस मामले पर मिली-जुली राय सामने आई थी। कांग्रेस सांसद आर. सुधा समेत कुछ लोगों ने भारत के राष्ट्रपति को पत्र लिखकर पेरारिवलन के एनरोलमेंट पर सवाल उठाए थे।

    चेन्नई के रहने वाले बी. रवि राजा ने यह याचिका दायर की। याचिका में उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने पेरारिवलन को बरी नहीं किया था, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली असाधारण संवैधानिक राहत का इस्तेमाल करते हुए उसे सिर्फ़ रिहा किया।

    याचिकाकर्ता ने दलील दी कि पेरारिवलन LTTE का हमदर्द था और उसे भारत के पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या का दोषी ठहराया गया। यह एक ऐसा अपराध है, जिसमें 'नैतिक पतन' (moral turpitude) का स्तर सबसे ऊंचा है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि एडवोकेट्स एक्ट की धारा 24A के अनुसार, किसी भी ऐसे व्यक्ति को 'स्टेट रोल' में वकील के तौर पर शामिल नहीं किया जा सकता, जिसे नैतिक पतन से जुड़े किसी अपराध का दोषी ठहराया गया हो।

    राजा ने आगे तर्क दिया कि बार काउंसिल सिर्फ़ एनरोलमेंट करने वाली संस्था नहीं है, बल्कि यह एक वैधानिक नियामक भी है। इस पर कानूनी पेशे की गरिमा, पवित्रता और मानकों को बनाए रखने की ज़िम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि बार काउंसिल कानूनी पेशे के लिए एक 'द्वारपाल' (Gatekeeper) की तरह काम करती है, जो यह सुनिश्चित करती है कि सिर्फ़ वही लोग वकीलों की सूची में शामिल हों, जिनमें ईमानदारी, अच्छा चरित्र और पेशे के लिए ज़रूरी योग्यता हो।

    राजा ने अपनी याचिका में कहा कि बार काउंसिल के पास एनरोलमेंट करने की जो शक्ति है, उसके साथ ही यह कर्तव्य भी जुड़ा है कि वह आवेदक के पिछले रिकॉर्ड (Antecedents) की बारीकी से जांच करे। साथ ही यह भी देखे कि कहीं आवेदक में कोई अयोग्यता तो नहीं है, और क्या वह इस पेशे में आने के लिए पूरी तरह से उपयुक्त है। उन्होंने आगे कहा कि इस मामले में एनरोलमेंट कमेटी ने कानून के प्रावधानों की यांत्रिक रूप से व्याख्या की और अपराध की गंभीरता या जनता के गुस्से को नज़रअंदाज़ करते हुए, पूरी तरह से दो साल की समय सीमा की शर्त पर ही ध्यान केंद्रित किया।

    उल्लेखनीय है कि कानून की धारा 24A के परंतुक (Proviso) के अनुसार, किसी व्यक्ति की अयोग्यता, उसकी रिहाई, सज़ा माफ़ी या पद से हटाए जाने के दो साल बीत जाने के बाद समाप्त हो जाएगी।

    याचिकाकर्ता ने कहा कि पेरा रिवलन का एनरोलमेंट कानूनी पेशे में जनता के भरोसे को कमज़ोर करेगा, क्योंकि उसकी सज़ा माफ़ी से उसकी दोषसिद्धि (Conviction) समाप्त नहीं हो जाती है।

    इसलिए याचिकाकर्ता ने बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया और बार काउंसिल ऑफ़ तमिलनाडु और पुडुचेरी को यह निर्देश देने की मांग की कि वे पेरा रिवलन को वकील के तौर पर प्रैक्टिस करने से रोकें। साथ ही याचिका के निपटारे तक पेरा रिवलन के एनरोलमेंट को निलंबित करने के लिए एक अंतरिम राहत की भी मांग की गई।

    Case Title: B Ravi Raja v The Bar Council of India and Others

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