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मद्रास हाईकोर्ट ने अपने रजिस्ट्रार के खिलाफ लगाए गलत आरोपों के मामले में अधिवक्ता के खिलाफ मानहानि की कार्यवाही शुरू की; 5 लाख रुपए की लागत लगाई

LiveLaw News Network
14 Oct 2020 5:18 AM GMT
मद्रास हाईकोर्ट ने अपने रजिस्ट्रार के खिलाफ लगाए गलत आरोपों के मामले में अधिवक्ता के खिलाफ मानहानि की कार्यवाही शुरू की; 5 लाख रुपए की लागत लगाई
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मद्रास हाईकोर्ट ने यह कहते हुए कि अधिवक्ता "गलत हलफनामा दायर करके नैतिक व्यवहार की सभी सीमाओं को लांघ गया है", वह भी संस्था (रजिस्ट्रार (सतर्कता) के एक महत्वपूर्ण कार्य के खिलाफ, ने सोमवार को उसके प्रैक्टिस के लाइसेंस को अगले आदेश तक के लिए निलंबित कर दिया।

चीफ जस्टिस एपी साही और जस्टिस सेंथ‌िलकुमार रामामूर्ति ने आदेश दिया,

"कानून की प्रैक्टिस का लाइसेंस एक गंभीर उद्यम है और इसे न्यायिक अधिकारी को गाली देने के लिए झूठ के इंजन के बदलने का प्रयास संभवत: एक सुनियोजित और षड्यंत्रकारी कदम हो सकता है, इस पृष्ठभूमि में कि संयोग से छठा प्रतिवादी हाईकोर्ट का रजिस्ट्रार सतर्कता है, जो अधीनस्थ न्यायपालिका, या अन्य मामलों में, जिनमें सतर्कता पूछताछ स्थापित की गई है, के व्यवहार की रिपोर्टिंग के लिए भी जिम्मेदार है।

हम निर्देश देते हैं कि याचिकाकर्ता श्री बी सतीश कुमार एक वकील के रूप में अगले आदेश तक या जब तक हमारे द्वारा शुरू की गई आपराधिक अवमानना ​​कार्यवाही में इस अदालत द्वारा अनुमति नहीं दी जाती है, प्रै‌क्टिस नहीं करेंगे।"

न्यायालय ने झूठ बोलने के लिए याचिकाकर्ता पर 5,00,000 की अनुकरणीय लागत भी लगाई और रजिस्ट्रार जनरल को उसके खिलाफ आपराधिक अवमानना ​​कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया।

कुमार द्वारा हाल ही में दायर किए गए क्वो वारंटों रिट में यह आदेश दिया गया है, आरोप था कि रजिस्ट्रार जनरल (सतर्कता), सुश्री पूर्णिमा अपने कार्यालय के लिए पात्र नहीं हैं, क्योंकि उनके पास 10+2 + 3 की मूल योग्यता नहीं है, वह +2 से भी नहीं गुजरीं हैं।

आरोपों को निराधार पाते हुए, अदालत ने याचिकाकर्ता को हाईकोर्ट और उसके रजिस्ट्रार (सतर्कता) को उसकी झूठे विचारधारा का "शिकार" बनाने से रोक दिया।

रजिस्ट्रार के शैक्षिक रिकॉर्ड का अध्‍ययन करने के बाद, ताकि रिट याचिका में लगाए गए मुख्या आरोप की सत्यता की जांच की जा सके, कोर्ट ने कहा, "हाईकोर्ट में संरक्षित पूरे रिकॉर्डों के अध्‍ययन के बाद, हमने अपने आप को पूर्णतया संतुष्ट किया कि छठी प्रतिवादी को चयन के समय किसी भी प्रकार से अपात्र नहीं थी, और आज भी तमिलनाडु राज्य की अधीनस्थ न्यायपालिका में एक न्यायिक अधिकारी का पद धारण करने के लिए अपात्र नहीं है। पूरी रिट याचिका झूठ का परिणाम है..."

न्यायालय ने नोट किया कि याचिकाकर्ता उच्च न्यायालय द्वारा कई बार झूठे आरोपों के दुष्परिणामों के बारे में आगाह किए जाने के बावजूद, "झूठा हलफनामा" दिया और जनता की नजर में न्यायालय का सम्मान कम किया। ।

कोर्ट ने पाया कि रजिस्ट्रार की शैक्षिक योग्यता का विवरण और प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए याचिकाकर्ता द्वारा किस स्रोत का दोहन नहीं किया गया था, यह दिखाने के लिए रिकॉर्ड पर कुछ भी नहीं था। इसके अलावा, जब इस बारे में पूछताछ की गई, तो उसने "ढोंग" किया।

इस पृष्ठभूमि में, कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर भारी लागत लगाई, और स्पष्ट किया कि यह मामला अपर्याप्त जानकारी का नहीं है, बल्कि "जिम्‍मेदारी के किसी बोध के बिना अदालत में झूठी जानकारी देने का स्पष्ट मामला है।"

कोर्ट ने कहा, "याचिकाकर्ता, हमारी राय में, छठी प्रतिवादी की शैक्षिक योग्यता बारे में जानकारी नहीं होने का ढोंग कर रहा था। यह, हमारी राय में, झूठ बोलने और तथ्या को छुपाने का एक स्पष्ट मामला है, जहां याचिकाकर्ता रिकॉर्ड पर कुछ दस्तावेजों को लाया,जो किसी भी तरह से यह नहीं दर्शाते हैं कि छठी प्रतिवादी ने 12 वीं कक्षा उत्तीर्ण नहीं की है। इस प्रकार, हम याचिकाकर्ता को तथ्यों से अनभिज्ञ होने की कोई सामग्री नहीं पाते हैं। हमारे पास यह विश्वास करने का कारण है कि ...इस न्यायालय को एक गलत हलफनामा दायर करने के लिए चुना गया है..."

कोर्ट ने कहा, यह न केवल झूठी गवाही का मामला है, बल्कि संपूर्ण न्यायिक प्रणाली की छवि को खराब करने का कृत्य है जैसे कि हाईकोर्ट ने अयोग्य व्यक्ति को नियुक्त किया है.."

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