2012 बस हादसा: श्रीनगर एमएसीटी ने 1.13 करोड़ मुआवजा दिया, बीमा कंपनी पर 50,000 रुपये का जुर्माना
Praveen Mishra
23 March 2026 2:04 PM IST

श्रीनगर मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) ने वर्ष 2012 के एक बस हादसे से जुड़े चार दावों में कुल 1.13 करोड़ रुपये का मुआवजा प्रदान किया। साथ ही, अधिकरण ने यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी (UIIC) पर 50,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया, क्योंकि कंपनी ने ट्रायल के दौरान जोखिम प्रारंभ होने से संबंधित महत्वपूर्ण पॉलिसी दस्तावेज को छिपाया था।
प्रेसाइडिंग ऑफिसर फैयाज़ अहमद कुरैशी की अध्यक्षता वाली पीठ ने मुआवजे का वितरण इस प्रकार किया:
मुश्ताक अहमद डार – ₹1,00,000
राजा बेगम – ₹15,04,000
रफीका बेगम – ₹92,83,400
परवेज अहमद गनई – ₹4,34,000
अधिकरण ने यह भी निर्देश दिया कि यदि राशि 30 दिनों के भीतर अदा की जाती है तो 8% ब्याज, अन्यथा 30 दिन के बाद 10% ब्याज देय होगा।
हादसे का विवरण
यह मामला 10 जनवरी 2012 को कश्मीर के वेयिल सुम्बल क्षेत्र में हुए बस हादसे से संबंधित है, जहां साधुपोरा से श्रीनगर जा रही बस सड़क से फिसलकर लगभग 50 फीट गहरी खाई में गिर गई थी।
बीमा कंपनी की लापरवाही पर सख्त टिप्पणी
अधिकरण ने पाया कि बीमा कंपनी ने बीमा पॉलिसी से जुड़ा महत्वपूर्ण दस्तावेज (certificate of insurance) छिपाया, जो जोखिम शुरू होने का समय स्पष्ट करता था। कोर्ट ने कहा कि यदि यह दस्तावेज समय पर प्रस्तुत किया जाता, तो मामला वर्षों तक लंबित नहीं रहता।
अधिकरण ने कहा कि बीमा कंपनी का यह कर्तव्य है कि वह सभी महत्वपूर्ण तथ्यों को निष्पक्ष रूप से प्रस्तुत करे, न कि जानकारी छिपाकर अनुचित लाभ उठाने की कोशिश करे।
पॉलिसी के समय को लेकर विवाद
बीमा कंपनी का तर्क था कि पॉलिसी 10 जनवरी 2012 को दोपहर 3:14 बजे (15:14 घंटे) से प्रभावी हुई, जबकि हादसा उसी दिन सुबह 10 बजे हुआ था। इसलिए दुर्घटना के समय वाहन बीमित नहीं था।
हालांकि, अधिकरण ने कहा कि यदि पॉलिसी में समय स्पष्ट नहीं होता, तो इसे उसी दिन मध्यरात्रि (midnight) से प्रभावी माना जाता है। साथ ही, कंपनी ने जोखिम प्रारंभ प्रमाणपत्र पेश नहीं किया, जिससे विवाद और बढ़ गया।
“गुड फेथ” का दावा खारिज
बीमा कंपनी ने यह भी कहा कि उसने “सद्भावना (good faith)” में पॉलिसी जारी की थी। लेकिन अधिकरण ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि:
कंपनी ने वाहन का भौतिक निरीक्षण किए बिना पॉलिसी जारी की
निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया
यह घोर लापरवाही और असावधानी दर्शाता है
लागत (Costs) लगाने का आदेश
अधिकरण ने कहा कि कंपनी द्वारा दस्तावेज छिपाने के कारण मामला वर्षों तक चला और पक्षकारों को अनावश्यक साक्ष्य प्रस्तुत करने पड़े।
इसलिए, सीपीसी की धारा 35 और मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 169 के तहत 50,000 रुपये की लागत लगाई गई, जिसे 30 दिनों के भीतर चुकाने का निर्देश दिया गया।
यह राशि:
आधी याचिकाकर्ताओं को
आधी निजी प्रतिवादियों को दी जाएगी
निष्कर्ष
अधिकरण ने स्पष्ट किया कि बीमा कंपनी का आचरण कानूनी और नैतिक दायित्वों के अनुरूप नहीं था, और उसने महत्वपूर्ण दस्तावेज छिपाकर न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास किया।

