Lakhimpur Kheri Case | पीड़ितों की चिंताओं पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ट्रायल जज बदला
Shahadat
26 Oct 2026 9:47 AM IST

अक्टूबर 2021 के लखीमपुर खीरी हिंसा मामले में अब एक नए जिला जज सुनवाई करेंगे। बता दें, इस मामले में पूर्व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा 'टेनी' के बेटे आशीष मिश्रा मुख्य आरोपी हैं।
यह बदलाव सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट को दिए गए उस निर्देश के एक महीने के भीतर हुआ, जिसमें कोर्ट से कहा गया कि वह ट्रायल जज के आचरण को लेकर पीड़ितों के परिवारों द्वारा जताई गई चिंताओं की जांच करे और सुधारात्मक कदम उठाए।
न्यायिक अधिकारी लोकेश राय ने लखीमपुर खीरी के जिला एवं सेशंस जज का पदभार संभाल लिया है। उन्होंने शिव कुमार सिंह की जगह ली है, जो अब तक इस मामले की सुनवाई कर रहे थे। राय को 14 अक्टूबर को इस पद पर नियुक्त किया गया।
इससे पहले 22 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच (जिसमें जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल थे) ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया था कि वह इस आवेदन को हाई कोर्ट भेजे, ताकि हाईकोर्ट मामले की जांच कर उचित सुधारात्मक कदम उठा सके।
हाईकोर्ट से यह भी कहा गया कि की गई कार्रवाई के बारे में एक रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट को सौंपी जाए।
इस मुकदमे में एक और अहम बदलाव के तहत, उत्तर प्रदेश सरकार ने वकील कपिल कटियार को विशेष लोक अभियोजक (Special Public Prosecutor) नियुक्त किया। उन्होंने प्रभाकर ब्रह्म मिश्रा की जगह ली है, जो अब तक अतिरिक्त जिला सरकारी वकील (Additional District Government Counsel) के रूप में काम कर रहे थे।
यह मामला अक्टूबर 2021 में 8 लोगों की हत्या से जुड़ा है। कृषि कानूनों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान, कथित तौर पर मिश्रा के काफिले से जुड़ी गाड़ियों ने प्रदर्शन कर रहे 4 किसानों को कुचल दिया था। आशीष मिश्रा पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा के बेटे हैं।
संक्षेप में मामला
22 सितंबर की सुनवाई के दौरान पीड़ितों के परिवारों की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि ट्रायल जज (पीठासीन अधिकारी) का आचरण "चौंकाने वाला" था।
भूषण ने इस बात पर आपत्ति जताई कि जज ने एक बीमार गवाह के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया था। भूषण ने यह भी कहा कि अन्य मामलों में भी जज का आचरण सवाल खड़े करता है, क्योंकि वे अन्य अदालतों से मुकदमे अपने पास मंगाकर आरोपियों को बरी कर रहे थे।
भूषण ने कहा,
"कुछ परेशान करने वाली घटनाएं हुई हैं। जो जज अभी इस मामले को देख रहे हैं... उन्होंने जो किया है, वह काफी चौंकाने वाला है। उन्होंने NDPS और SC/ST मामलों को अपने पास ले लिया और जमानत दे दी... ऐसे मामलों में लोगों को बरी कर दिया, जो ट्रायल के बिल्कुल आखिरी चरण में थे। इस मामले में उन्होंने सबसे पहले एक चश्मदीद गवाह के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया। उन्होंने इस मामले में मनमानी की है! सिर्फ इसी मामले में नहीं, बल्कि कई मामलों में ऐसा हुआ है। डॉक्टर के सर्टिफिकेट के साथ बीमारी की पर्ची भी दी गई। अब इस जज के खिलाफ जांच शुरू हो गई है। पुलिस जब इस गवाह के पास गई, तो उसने कहा- 'माफ कीजिए, मैं पेश नहीं होना चाहता'।"
भूषण ने यह भी आरोप लगाया कि ट्रायल जज ने NDPS और SC/ST मामलों सहित कुछ केस अपने पास ले लिए और उन मामलों में आरोपियों को बरी कर दिया, जो ट्रायल के काफी आगे के चरण में थे।
उन्होंने आगे आरोप लगाया कि इस मामले से जुड़ा 'साइट प्लान' कोर्ट के रिकॉर्ड से 'गायब' हो गया।
सुप्रीम कोर्ट ने खुद कोई निर्देश जारी नहीं किया, बल्कि इन आरोपों को इलाहाबाद हाईकोर्ट के पास भेज दिया। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक अधिकारी से जुड़ी चिंताओं की जांच करने और उचित सुधारात्मक कार्रवाई करने के लिए हाईकोर्ट ही सही अथॉरिटी है।
इसके बाद 5 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि लखीमपुर खीरी हिंसा मामले के ट्रायल जज से जुड़ी विजिलेंस रिपोर्ट, इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के सामने रखी जाए, ताकि वे इस पर उचित फैसला ले सकें।
उसी दिन, उत्तर प्रदेश सरकार ने कोर्ट को बताया कि एक नए सरकारी वकील (प्रॉसिक्यूटर) का प्रस्ताव रखा गया है और उनकी सिफारिश की गई।
राज्य की ओर से पेश वकील रुचिरा गोयल ने बताया कि प्रस्तावित सरकारी वकील के पास 16 साल का अनुभव है, वे 'डिस्ट्रिक्ट गवर्नमेंट काउंसिल' के रूप में काम कर चुके हैं और उन्हें क्रिमिनल लॉ (आपराधिक कानून) का विशेष अनुभव है।
सितंबर की सुनवाई में भूषण ने पुराने सरकारी वकील को हटाए जाने पर चिंता जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि नए वकील के पास पर्याप्त अनुभव नहीं है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि ट्रायल के दौरान कुछ अहम गवाहों को छोड़ दिया गया।
तब सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से कहा था कि इस मामले में किसी सीनियर सरकारी वकील को नियुक्त किया जाए। कोर्ट के दखल के बाद, कटियार की नियुक्ति ट्रायल की प्रक्रिया में हुआ एक और बदलाव है।

