Begin typing your search above and press return to search.
मुख्य सुर्खियां

धारा 307 आईपीसी के तहत गिरफ्तारी के कारण लॉ स्टूडेंट की अटेंडेंस हुई कम, कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी ने परीक्षा देने से रोका; पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने निर्णय की पुष्टि की

Avanish Pathak
6 Aug 2022 8:05 AM GMT
P&H High Court Dismisses Protection Plea Of Married Woman Residing With Another Man
x

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने हाल ही में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के विधि संस्थान के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसके तहत आईपीसी की धारा 307 (हत्या का प्रयास) के तहत आरोपी कानून के एक छात्र को 10वीं सेमेस्टर [बीए एलएलबी (ऑनर्स) कोर्स] की थ‌ियरी की परीक्षा में शामिल होने से रोक दिया गया था।

जस्टिस सुधीर मित्तल की पीठ ने कहा कि चूंकि विश्वविद्यालय अध्यादेश के खंड 4 में न्यायिक हिरासत में होने के कारण उपस्थिति की कमी को माफ करने का प्रावधान नहीं है, इसलिए अदालत ने छात्र द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया।

याचिकाकर्ता (अरमान सिंह) कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र के विधि संस्थान द्वारा संचालित बीए एलएलबी (ऑनर्स) कोर्स के 10वें सेमेस्टर का छात्र है।

उसके खिलाफ फरवरी 2022 में धारा 148, 149, 323, 325, 307, 506, 120-बी आईपीसी के तहत एक एफआईआर दर्ज की गई थी। 05 मार्च, 2022 को उसे गिरफ्तार किया गया था। हिरासत में रहते हुए 27 अप्रैल, 2022 से 29 अप्रैल, 2022 तक और 10 मई, 2022 को वाइवा और प्रैक्टिकल परीक्षा देने की अनुमति दी गई थी।

जिसके बाद उसने सैद्धांतिक परीक्षा में बैठने की अनुमति के लिए आवेदन किया, जिसकी अनुमति दी गई थी। हालांकि अटेंडेंस की कमी के कारण संस्थान ने उन्हें परीक्षा में शामिल होन से रोक दिया था।

इस प्रकार, याचिकाकर्ता ने 20 मई, 2022 से 15 जून, 2022 तक निर्धारित थ‌ियरी एग्जाम में में शामिल होने की अनुमति के लिए हाईकोर्ट से संपर्क किया था। उसने न्यायालय के समक्ष तर्क दिया कि अटेंडेंस में कमी ऐसे कारणों से थी, जिन पर याचिकाकर्ता का नियंत्रण नहीं थी और इस प्रकार , उसे थ्योरी परीक्षा देने की अनुमति दी जानी चाहिए थी।

आगे प्रस्तुत किया गया कि विश्वविद्यालय के डीन या कॉलेज के प्राचार्य को एक छात्र को परीक्षा देने की अनुमति देने की शक्ति दी गई है यदि उसने 65% कक्षाओं में भाग लिया हो। इस प्रकार, इस कारण से भी याचिकाकर्ता ने राहत की मांग की।

दूसरी ओर, प्रतिवादी विश्वविद्यालय के वकील ने प्रस्तुत किया कि याचिकाकर्ता ने केवल 43% व्याख्यानों में भाग लिया है और इस प्रकार उसे परीक्षा देने से रोक दिया गया है और इसलिए, रिट याचिका खारिज करने योग्य है।

याचिकाकर्ता को परीक्षा देने से रोकने के विश्वविद्यालय प्रशासन के निर्णय में औचित्य पाते हुए, न्यायालय ने कहा,

"...विश्वविद्यालय अध्यादेश के खंड 4 में न्यायिक हिरासत में होने के कारण उपस्थिति की कमी को माफ करने का प्रावधान नहीं है। कमी को माफ किया जा सकता है बशर्ते यह खेल आयोजनों, युवा उत्सवों, विश्वविद्यालय स्तर की बहस में भागीदारी, एनसीसी शिविर, पर्वतारोहण पाठ्यक्रमों में उपस्थिति, स्वैच्छिक रक्तदान, अखिल भारतीय मूट कोर्ट/वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में उपस्थिति और राष्ट्रीय विधि संस्थान/विधि विभाग द्वारा आयोजित विस्तार व्याख्यानों की उपस्थिति के कारण हो।"

इस संबंध में, न्यायालय ने गौरव दहिया (नाबालिग) का मामला, उनके पिता बनाम केंद्रीय स्कूल शिक्षा बोर्ड, दिल्ली और अन्य के माध्यम से को भी संदर्भित किया, जिसमें हाईकोर्ट एक छात्र के मामले से निपट रहा था, जिस पर किशोर न्याय बोर्ड द्वारा मुकदमा चलाया गया था।

हालांकि उसे बरी कर दिया गया, लेकिन उपस्थिति की कमी के कारण उसे दसवीं कक्षा की परीक्षा देने की अनुमति नहीं दी गई। उनकी रिट याचिका को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा बनाए गए परीक्षा उप-नियमों के नियम 14 को ध्यान में रखा था, जिसमें न्यायिक हिरासत में होने का उल्लेख उपस्थिति की कमी को माफ करने के आधार के रूप में नहीं किया गया था।

नतीजतन, मौजूदा रिट याचिका खारिज कर दी गई थी

केस शीर्षक - अरमान सिंह बनाम निदेशक, विधि संस्थान, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र और अन्य

आदेश पढ़ने/डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें

Next Story