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केरल हाईकोर्ट ने बलात्कार और हत्या के आरोपी की जमानत रद्द की, लोक अभियोजक और आरोपी के वकील के खिलाफ जारी कार्रवाई समाप्त की

LiveLaw News Network
6 Jun 2020 7:17 AM GMT
केरल हाईकोर्ट ने बलात्कार और हत्या के आरोपी की जमानत रद्द की, लोक अभियोजक और आरोपी के वकील के खिलाफ जारी कार्रवाई समाप्त की
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केरल हाईकोर्ट ने एक बलात्कार और हत्या के मामले में आरोपी को दी गई जमानत रद्द कर दी है। इस मामले में हाईकोर्ट ने 17 साल की नाबालिग लड़की के अपहरण, बलात्कार और हत्या के आरोपी सफरशाह को इस आधार पर जमानत दे दी थी, क्योंकि आरोपी की गिरफ्तारी के 90 दिन बाद भी मामले में आरोप पत्र दायर नहीं किया गया है।

बाद में वरिष्ठ लोक अभियोजक ने अर्जी दायर करते हुए मांग की थी कि इस आदेश को वापस लिया जाए। साथ ही कहा था कि लोक अभियोजक (जिसने कहा था कि कोई चार्जशीट दायर नहीं की गई थी) द्वारा दी गई सूचना अनजाने में हुई एक गलती थी।

जस्टिस पीवी कुन्हिकृष्णन ने मामले की विस्तार से सुनवाई की और रिकॉर्डेड वीडियो कॉन्फ्रेंस सेशन का भी हवाला दिया।

जस्टिस पीवी कुन्हिकृष्णन ने कहा कि

''मैंने एक बार फिर जमानत आवेदन पर हुई सुनवाई की रिकॉर्ड की गई वीडियो कांफ्रेंसिंग को सुना है, जो कि मामलों की सूची में (बी.ए नंबर 2449/2020) आइटम नंबर चार था। इस तथ्य पर विचार किया जाना चाहिए कि जब जमानत अर्जी नंबर 2449/2020 12 मई 2020 को सुनवाई के आई थी तो यह अदालत याचिकाकर्ता को जमानत देने की इच्छुक नहीं थी। लेकिन लोक अभियोजक ने बताया कि अंतिम रिपोर्ट दायर नहीं की गई है और अभियुक्त को रिमांड पर भेजने के बाद से 90 दिन की अवधि पूरी हो गई है।

लेकिन, फिर भी इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि लोक अभियोजक श्री के .प्रसाद बार-बार जमानत अर्जी का विरोध कर रहे थे। उनका कहना था कि यह एक गंभीर अपराध है और इसलिए अदालत को आरोपी की जमानत अर्जी पर विचार नहीं करना चाहिए। भले ही आरोपी वैधानिक जमानत का हकदार है।

आरोपी की ओर से पेश वकील ने कहा था कि वह सीआरपीसी की धारा 167 के तहत वैधानिक जमानत का हकदार है। ऐसी परिस्थितियों में, जब अभियुक्त को सीआरपीसी की धारा 167 के तहत वैधानिक अधिकार मिल गया था तो इस अदालत ने 12 मई 2020 को आरोपी की जमानत अर्जी को स्वीकार कर लिया था।''

अदालत ने कहा कि लोक अभियोजक की तरफ से उसका कर्तव्य निभाने में कोई गंभीर व्युत्पत्ति या चूक नहीं हुई है। अदालत ने कहा कि जब गलती की पहचान हो गई तो तो अभियोजक ने अपनी गलती के बारे में इस अदालत को बता भी दिया। इसलिए, लोक अभियोजक के खिलाफ शुरू की गई कार्यवाही को खत्म किया जा रहा है।

अदालत ने आरोपी के वकील की तरफ से मांगी गई माफी को भी स्वीकार कर लिया।

जज ने कहा कि

वकील .. एक युवा वकील, जिसने केवल तीन साल पहले ही प्रैक्टिस शुरू की थी। मैं इस मामले में कोई टिप्पणी करके उसको और परेशान नहीं करना चाहता हूं। मैं उसकी माफी स्वीकार करता हूं। न्याय वितरण प्रणाली में बेंच और बार के बीच संबंध महत्वपूर्ण है। अदालत वकीलों की दलीलों के आधार पर कार्य करती है। प्रत्येक वकील न्यायालय के समक्ष सही तथ्य प्रस्तुत करने के लिए बाध्य है।

अगर वकील कोर्ट के सामने आ रहे हैं और तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश कर रहे हैं तो इससे कोर्ट असहाय हो जाएगा। कोर्ट का बोझ बढ़ेगा। इसलिए आपसी विश्वास जरूरी है। मैं इस मामले को अब यहीं छोड़ रहा हूं।

न्यायालय ने सीआरपीसी की धारा 439 (2) के तहत मिली शक्तियों को लागू करते हुए आरोपी की जमानत को रद्द कर दिया। आरोपी को पहले ही इस अदालत द्वारा पूर्व में दिए गए आदेश के तहत गिरफ्तार किया जा चुका है।

आदेश की कॉपी डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें



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