जस्टिस यशवंत वर्मा ने 'घर पर कैश' विवाद की जांच प्रक्रिया से खुद को अलग किया, प्रक्रिया को 'अनुचित' बताया

Shahadat

10 April 2026 8:38 PM IST

  • जस्टिस यशवंत वर्मा ने घर पर कैश विवाद की जांच प्रक्रिया से खुद को अलग किया, प्रक्रिया को अनुचित बताया

    इलाहाबाद हाईकोर्ट जज जस्टिस यशवंत वर्मा ने जजों की जांच समिति के सामने चल रही कार्यवाही से खुद को अलग कर लिया। इस समिति का गठन लोकसभा ने किया था, जिसका काम जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास के एक स्टोररूम से कथित तौर पर कैश मिलने के आरोपों की जांच करना था।

    उल्लेखनीय है कि यह कदम उन्होंने भारत के राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा सौंपने के साथ-साथ उठाया।

    तीन सदस्यों वाली जजों की जांच समिति का गठन पिछले साल लोकसभा स्पीकर ने 'जजों की जांच अधिनियम, 1968' के तहत किया। यह तब हुआ जब 100 से ज़्यादा लोकसभा सांसदों ने जस्टिस वर्मा पर महाभियोग चलाने की मांग करते हुए एक प्रस्ताव पेश किया।

    इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार, बॉम्बे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस (CJ) जस्टिस श्री चंद्रशेखर और सीनियर वकील बी.वी. आचार्य शामिल हैं।

    जस्टिस वर्मा ने पिछले साल सुप्रीम कोर्ट में इस समिति के गठन को चुनौती दी थी, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली थी। उन्होंने अपने खिलाफ शुरू की गई जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए।

    समिति को भेजे गए 13 पन्नों के एक विस्तृत पत्र में जस्टिस वर्मा ने जांच प्रक्रिया के तरीके पर "गहरा दुख" व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया में बने रहने का मतलब उस जांच को वैधता देना होगा, जिसे उन्होंने "अनुचित" बताया है। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया ने असल में 'सबूत का बोझ' (Burden of Proof) ही उलट दिया और उन्हें अपना बचाव करने का उचित अवसर नहीं दिया।

    जस्टिस वर्मा ने बताया कि यह घटना मार्च, 2025 में होली की छुट्टियों के दौरान उनके सरकारी आवास के एक स्टोररूम में लगी आग से जुड़ी है। उस समय वह और उनकी पत्नी छुट्टी मनाने के लिए एक दूरदराज के इलाके में गए हुए, जहां संपर्क के साधन बहुत सीमित थे। उन्होंने कहा कि उन्हें आग लगने की जानकारी तब मिली, जब आग पर काबू पा लिया गया। साथ ही उन्हें आवास परिसर में कथित तौर पर कैश मिलने की बात का पता भी काफी बाद में चला।

    प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए जस्टिस वर्मा ने कहा कि कई ऐसे गवाहों को बिना किसी स्पष्टीकरण के हटा दिया गया, जिन्होंने उनके पक्ष में गवाही दी थी। पत्र में दर्ज जानकारी के अनुसार, पहले जिन 54 गवाहों की जांच की गई, उनमें से 27 को हटा दिया गया। इनमें दिल्ली अग्निशमन सेवा और दिल्ली पुलिस के अधिकारी भी शामिल थे। इन गवाहों को कथित तौर पर इसलिए हटाया गया, क्योंकि जिरह (Cross-Examination) के दौरान सामने आए तथ्य आरोपों से मेल नहीं खा रहे थे।

    उन्होंने आगे यह तर्क दिया कि जांच सबूतों के बजाय केवल अनुमानों के आधार पर आगे बढ़ी। इसने उन पर नकदी के मालिकाना हक या उसकी जगह के संबंध में लगाए गए आरोपों को गलत साबित करने का एक भारी बोझ डाल दिया—ऐसे आरोप जिनका सबूतों के ज़रिए उनसे कभी कोई सीधा संबंध साबित नहीं हुआ था।

    अपने पत्र के आखिरी हिस्से में जस्टिस वर्मा ने कहा कि उन्होंने इसके साथ ही भारत के राष्ट्रपति को भी एक पत्र भेजा है। यह कि इस जांच प्रक्रिया में बने रहना उनके और इस संस्था, दोनों के लिए ही एक तरह की नाइंसाफ़ी होगी।

    उन्होंने कहा कि जिस तरीके से यह जांच की गई, उसका मूल्यांकन भविष्य में किया जाएगा। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि इस पूरे घटनाक्रम ने मौजूदा हाईकोर्ट जज के साथ किए गए बर्ताव को उजागर किया, और आने वाली पीढ़ियां इस पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता का आकलन करेंगी।

    उन्होंने कहा,

    “इसलिए मैं तत्काल प्रभाव से इस जाँच प्रक्रिया से खुद को अलग करता हूं और मैंने अपने वकीलों को भी इसी के अनुरूप निर्देश दिए। मैं अत्यंत गहरे दुख के साथ इस प्रक्रिया से हट रहा हूँ—मुझे अपने इस निर्णय की गंभीरता का पूरा एहसास है—और इस उम्मीद के साथ हट रहा हूं कि एक दिन इतिहास इस बात को ज़रूर दर्ज करेगा कि एक मौजूदा हाई कोर्ट जज के साथ कितनी नाइंसाफ़ी की गई, और किस तरह की नाइंसाफ़ी ने इस पूरे घटनाक्रम को इसकी शुरुआत से लेकर अब तक लगातार घेरे रखा है।”

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