राजनीतिक झुकाव वाले मंचों से दूरी रखनी चाहिए: जस्टिस अभय एस. ओका
Praveen Mishra
16 April 2026 12:14 PM IST

जस्टिस अभय एस. ओका ने कहा कि यदि वे कार्यरत (सिटिंग) जज होते, तो किसी राजनीतिक झुकाव वाले संगठन के मंच से बोलने का निमंत्रण स्वीकार नहीं करते।
वे अधिवक्ता परिषद द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बोल रहे थे, जहां उन्होंने कहा, “अगर मैं सिटिंग जज होता और अधिवक्ता परिषद मुझे अपने मंच पर बुलाती, तो मैं विनम्रता से मना कर देता, क्योंकि मेरा मानना है कि इस संगठन का राजनीतिक झुकाव है।”
सेवानिवृत्त जजों को भी बरतनी चाहिए सावधानी
जस्टिस ओका ने कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद जजों पर वही सख्त नियम लागू नहीं होते, लेकिन फिर भी संवैधानिक अदालत के पूर्व न्यायाधीशों को कुछ सीमाओं और मर्यादाओं का पालन करना चाहिए।
वे “Robes Cannot Be Rented” विषय पर आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे।
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा विवाद के संदर्भ में टिप्पणी
जस्टिस ओका की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली हाईकोर्ट की जज जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रमों में भागीदारी को लेकर उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए थे और शराब नीति मामले में उनके रीक्यूजल की मांग की थी।
इस पर Central Bureau of Investigation (केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो) ने जस्टिस शर्मा का बचाव करते हुए कहा था कि यह एक वकीलों का संगठन है और कई जज इसके कार्यक्रमों में भाग लेते रहे हैं।
निरव मोदी केस में पूर्व जज की राय पर भी बोले
जस्टिस ओका ने जस्टिस दीपक वर्मा द्वारा भगोड़े कारोबारी नीरव मोदी के प्रत्यर्पण मामले में दिए गए विशेषज्ञ मत पर भी टिप्पणी की।
उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत रूप से उनका मानना है कि किसी सेवानिवृत्त जज को किसी भगोड़े के कहने पर विदेशी अदालत में राय नहीं देनी चाहिए, लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि उस राय का निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाए, न कि तुरंत आलोचना की जाए।
जस्टिस वर्मा ने अपने मत में कहा था कि भारत सरकार द्वारा दिया गया आश्वासन कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं, बल्कि एक “राजनयिक आश्वासन” है।
न्यायिक सुधार की जरूरत पर जोर
जस्टिस ओका ने कहा कि असली चुनौती यह है कि न्यायिक प्रणाली में ऐसे सुधार किए जाएं, जिससे विदेशी अदालतों में भारतीय न्याय व्यवस्था की आलोचना न हो।
उन्होंने कहा, “हमें वस्तुनिष्ठ तरीके से यह देखना चाहिए कि क्या सेवानिवृत्त जज ने वास्तव में कुछ गलत कहा है या नहीं।”
निष्कर्ष
जस्टिस अभय एस. ओका की टिप्पणियां न्यायपालिका की निष्पक्षता, नैतिकता और आचरण को लेकर महत्वपूर्ण सवाल उठाती हैं और यह संकेत देती हैं कि जजों—चाहे कार्यरत हों या सेवानिवृत्त—दोनों को सार्वजनिक मंचों और गतिविधियों में संतुलन और सावधानी बरतनी चाहिए।

