वित्तीय निहितार्थ या व्यापक प्रभाव वाले नीतिगत फैसलों में न्यायिक हस्तक्षेप अनुचित: सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network

11 Jan 2022 1:38 PM IST

  • सुप्रीम कोर्ट, दिल्ली

    सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वित्तीय निहितार्थ और/या व्यापक प्रभाव (cascading effect) संबंध‌ित नीतिगत फैसले में न्यायपालिका का हस्तक्षेप बिल्कुल भी आवश्यक और उचित नहीं है।

    मौजूदा मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने कुछ कर्मचारियों की रिट याचिकाओं को स्वीकार करते हुए राज्य सरकार को जल और भूमि प्रबंधन संस्थान (WALMI) के कर्मचारियों को पेंशन लाभ देने का निर्देश दिया था। महाराष्ट्र राज्य और अन्य ने मामले में मौजूदा अपीलें दायर की थी।

    राज्य ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य रूप से यह तर्क देते हुए अपील दायर की कि WALMI के कर्मचारियों पर लागू सेवा नियमों के अनुसार, पेंशन/पेंशनरी लाभों के लिए कोई प्रावधान नहीं है आगे यह तर्क दिया गया कि राज्य सरकार के कर्मचारियों पर लागू पेंशन नियम WALMI के कर्मचारियों पर लागू नहीं होंगे और इसलिए वे पेंशन लाभ के हकदार नहीं हैं।

    इसलिए, इस मामले में विचार किया गया मुद्दा यह था कि क्या WALMI के कर्मचारी, जो कि सोसायटी पंजीकरण अधिनियम के तहत पंजीकृत एक स्वतंत्र स्वायत्त संस्था है, राज्य सरकार के कर्मचारियों के समान पेंशन लाभ के हकदार हैं?

    यह तर्क दिया गया था कि जब राज्य सरकार द्वारा उचित विचार-विमर्श के बाद एक सचेत निर्णय लिया गया था तो इसे नीतिगत निर्णय कहा जा सकता है और यह निर्णय लिया गया कि राज्य सरकार के कर्मचारियों पर लागू पेंशन नियम WALMI के कर्मचारियों पर लागू नहीं होंगे और इसलिए वे पेंशन लाभ के हकदार नहीं हैं, हाईकोर्ट को भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए इस तरह के नीतिगत निर्णय में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए था।

    इस तर्क से सहमत, जस्टिस एमआर शाह और ज‌स्टिस बीवी नागरत्ना (पंजाब राज्य सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ लिमिटेड और अन्य बनाम बलबीर कुमार वालिया और अन्य, (2021) 8 एससीसी 784 का भी जिक्र करते हुए) की पीठ ने कहा,

    "कानून के तय प्रस्ताव के अनुसार, न्यायालय को नीतिगत निर्णय में हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए, जिसका व्यापक प्रभाव हो सकता है और वित्तीय प्रभाव पड़ सकता है। कर्मचारियों को कुछ लाभ देना है या नहीं, यह विशेषज्ञ निकाय और उपक्रमों पर छोड़ दिया जाना चाहिए और न्यायालय हल्के ढंग से हस्तक्षेप नहीं कर सकता। कुछ लाभों को प्रदान करने के परिणामस्वरूप प्रतिकूल वित्तीय परिणाम हो सकते हैं।"

    अदालत ने कहा कि इस मामले में राज्य सरकार के कर्मचारियों के लिए लागू पेंशन नियमों को नहीं अपनाने के लिए एक सचेत नीतिगत निर्णय लिया गया था। हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए, पीठ ने कहा कि WALMI के कर्मचारी पेंशन लाभ के हकदार नहीं हैं।

    "पेंशन लाभ प्रदान करना एकमुश्त भुगतान नहीं है। पेंशन लाभ प्रदान करना एक आवर्ती मासिक व्यय है और भविष्य में पेंशन लाभों के प्रति एक सतत दायित्व है। इसलिए, केवल इसलिए कि एक समय में, WALMI के पास कुछ फंड हो सकते हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि आने वाले समय के लिए, यह अपने सभी कर्मचारियों को पेंशन का भुगतान करने का इतना बोझ उठा सकता है। किसी भी मामले में, यह अंततः राज्य सरकार और सोसाइटी (WALMI) पर अपना नीतिगत निर्णय लेने के लिए है कि अपने कर्मचारियों को पेंशन लाभ दिया जाए या नहीं। वित्तीय निहितार्थ वाले और/या व्यापक प्रभाव वाले ऐसे नीतिगत निर्णय में न्यायपालिका द्वारा हस्तक्षेप बिल्कुल भी आवश्यक और उचित नहीं है।

    केस शीर्षक: महाराष्ट्र राज्य बनाम भगवान

    सिटेशन: 2022 लाइवलॉ (एससी) 28

    मामला संख्या। और तारीख: सीए 7682-7684 ऑफ 2021| 10 जनवरी 2022

    कोरम: जस्टिस एमआर शाह और बीवी नागरत्न

    वकील: एसजी तुषार मेहता के साथ एडवोकेट सचिन पाटिल अपीलकर्ता के लिए, प्रतिवादी के लिए एडवोकेट जेएन सिंह।

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