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झारखंड हाईकोर्ट ने लोक अभियोजक की गिरफ्तारी से संबंधित मामले में उचित प्रक्रिया का पालन करने में विफलता के कारण बिहार और झारखंड के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को फटकार लगाई

LiveLaw News Network
11 Nov 2021 9:22 AM GMT
झारखंड हाईकोर्ट ने लोक अभियोजक की गिरफ्तारी से संबंधित मामले में उचित प्रक्रिया का पालन करने में विफलता के कारण बिहार और झारखंड के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को फटकार लगाई
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झारखंड हाईकोर्ट ने मंगलवार को रांची के एक वकील की गिरफ्तारी से संबंधित मामले में कानून की उचित प्रक्रिया का पालन करने में विफलता के कारण बिहार और झारखंड राज्य के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की कार्रवाई पर सवाल उठाया।

न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति आनंद सेन की खंडपीठ अतिरिक्त लोक अभियोजक (Additional Public Prosecutor) की पत्नी द्वारा दायर एक बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

याचिका में उसके पति के ठिकाने का पता लगाने की मांग की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उसे बिहार पुलिस ने हिरासत में लिया है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि रिट याचिका दायर करने के बाद और जब उसी की प्रति बिहार और झारखंड राज्यों के लिए पेश होने वाले वकील को दी गई, तो रिट याचिकाकर्ता के पति को पुलिस हिरासत से रिहा कर दिया गया था।

हालांकि, इस बात पर जोर देते हुए कि एपीपी को गिरफ्तार करने से पहले प्रक्रिया का पालन नहीं करने से संबंधित कुछ मुद्दे न्यायालय के लिए सर्वोपरि हैं, अदालत मामले की सुनवाई के साथ आगे बढ़ी।

बेंच ने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक, दानापुर और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, पटना और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, रांची को फटकार लगाई और विभिन्न प्रश्नों के जवाब मांगे।

संक्षेप में तथ्य

अतिरिक्त लोक अभियोजक, रजनीश वर्धन को 7 नवंबर को पटना पुलिस ने कथित तौर पर भारतीय दंड संहिता की धारा 341, 406, 420, 506 और 120 बी के तहत दर्ज मामले में कथित संलिप्तता के लिए उनके आवास से उठाया था।

बिहार और झारखंड राज्यों की ओर से पेश वकीलों ने अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया कि रिट याचिकाकर्ता के पति का नाम एफ.आई.आर. और उनकी अग्रिम जमानत अर्जी खारिज कर दी गई और उसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

अदालत के समक्ष पेश हुए रांची के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने अदालत को बताया कि रिट याचिकाकर्ता के पति को ट्रांजिट रिमांड के लिए किसी स्थानीय मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश नहीं किया गया था।

महत्वपूर्ण रूप से अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक, दानापुर (पटना, बिहार) ने अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया कि यह महसूस करने के तुरंत बाद कि उसके द्वारा किए गए कथित अपराध के लिए निर्धारित सजा 07 वर्ष से कम है, उसे सीआरपीसी की धारा 41(ए) के तहत नोटिस देकर रिहा कर दिया गया।

इस पृष्ठभूमि के खिलाफ न्यायालय ने प्रथम दृष्टया पाया कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता में निर्धारित प्रक्रिया, जो किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने से पहले अनिवार्य है, का पालन तत्काल मामले में नहीं किया गया है।

न्यायालय की टिप्पणियां

कोर्ट ने शुरुआत में इस बात पर जोर दिया कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 व्यक्तिगत स्वतंत्रता की परिकल्पना करता है, जिसे केवल उचित प्रक्रिया का पालन करके ही छीना जा सकता है और भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22 (2) गिरफ्तारी के बाद पालन की जाने वाली प्रक्रिया प्रदान करता है।

अदालत ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, रांची और अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक, दानापुर / वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, पटना को निम्नलिखित सहित कुछ सवालों के जवाब देने का निर्देश दिया;

- क्या गिरफ्तारी के बाद रिट याचिकाकर्ता के पति को सीआरपीसी की धारा 41(ए) के तहत नोटिस तामील किया गया? और अगर किया गया तो क्या सीआरपीसी की धारा 41 (ए) के तहत निर्धारित सही जनादेश कहा जा सकता है?

- क्या सीआरपीसी की धारा 41 (ए) के तहत नोटिस संबंधित व्यक्ति की गिरफ्तारी के बाद दिया जा सकता है?

- क्या याचिकाकर्ता के पति को सुखदेव नगर पुलिस स्टेशन (रांची) द्वारा किसी स्थानीय मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया था, जिसका अधिकार क्षेत्र रांची में है और उसे दानापुर पुलिस अधिकारियों के साथ जाने की अनुमति देने के लिए ट्रांजिट रिमांड के लिए पेश किया गया था?

- क्या भारत के संविधान के अनुच्छेद 22 (2) के तहत अनिवार्य रूप से गिरफ्तारी के बाद रिट याचिकाकर्ता के पति को पटना जिले के दानापुर पुलिस स्टेशन पर अधिकार क्षेत्र वाले स्थानीय मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया था?

मामले को अब आगे की सुनवाई के लिए 25 नवंबर, 2021 को पोस्ट किया गया है।

केस का शीर्षक - श्वेता प्रियदर्शनी बनाम झारखंड राज्य एंड अन्य

आदेश की कॉपी यहां पढ़ें:



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