आईएनएक्स मीडिया केस : दिल्ली हाईकोर्ट ने आरोपी द्वारा दस्तावेजों के निरीक्षण की अनुमति देने वाले ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली सीबीआई की याचिका खारिज की

LiveLaw News Network

10 Nov 2021 6:38 AM GMT

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    दिल्ली हाईकोर्ट ने सीबीआई की पूर्व मंत्री पी. चिदंबरम समेत आरोपी व्यक्तियों को आईएनएक्स मीडिया मामले की जांच के दौरान एजेंसी द्वारा एकत्र किए गए मलखाना कक्ष में रखे गए दस्तावेजों का निरीक्षण करने की अनुमति देने वाले विशेष न्यायाधीश के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी।

    न्यायमूर्ति मुक्ता गुप्ता ने अगस्त में इसे सुरक्षित रखने के बाद आदेश सुनाया।

    फैसले को सुरक्षित रखते हुए कोर्ट ने दोहराया था कि वह सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बाध्य है। इसमें कहा गया था कि सीआरपीसी की धारा 207/208 के तहत बयानों, दस्तावेजों और भौतिक वस्तुओं की सूची प्रस्तुत करते समय पीसी, मजिस्ट्रेट को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि अन्य सामग्रियों की एक सूची, (जैसे बयान, या वस्तुओं/दस्तावेजों को जब्त कर लिया गया है, लेकिन उन पर भरोसा नहीं किया गया है) आरोपी को दी जानी चाहिए।

    कोर्ट ने 20 अप्रैल, 2021 को सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया था। इसका शीर्षक था: इन रे: टू इश्यू सर्टेन गाइडलाइंस विद इनडेक्वेसीज एंड डेफिशिएंसी इन क्रिमिनल ट्रायल।

    उक्त मामले के पैरा 11 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था:

    "सीआरपीसी की धारा 207/208 के तहत बयानों, दस्तावेजों और भौतिक वस्तुओं की सूची प्रस्तुत करते समय मजिस्ट्रेट को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि अन्य सामग्रियों की एक सूची, (जैसे बयान, या वस्तुओं / दस्तावेजों को जब्त कर लिया गया है, लेकिन उन पर भरोसा नहीं किया गया है) अभियुक्त को दी जानी चाहिए। ऐसा करना यह सुनिश्चित करने के लिए है कि यदि अभियुक्त का विचार है कि उचित और न्यायपूर्ण ट्रायल के लिए ऐसी सामग्री आवश्यक है तो वह न्याय के हित में सुनवाई के दौरान उनके उत्पादन के लिए सीआरपीसी की धारा तीन के तहत उचित आदेश मांग सकता है। यह तदनुसार निर्देशित है कि मसौदा नियमों को तदनुसार संशोधित किया गया है। [नियम 4 (i)]"

    पिछली सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा था कि जब भी चार्जशीट दाखिल की जाती है तो जांच एजेंसी को विश्वसनीय और गैर-विश्वसनीय दस्तावेजों दोनों की एक सूची तैयार करनी होती है।

    सीबीआई की ओर से पेश हुए अनुपम एस शर्मा ने कहा कि मौजूदा मामले में जांच अभी बाकी है और इस तरह के दस्तावेजों से छेड़छाड़ की संभावना है।

    सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा करते हुए शर्मा ने कहा कि जांच के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि गोपनीयता अत्यंत महत्वपूर्ण है।

    विशेष सीबीआई न्यायाधीश एमके नागपाल द्वारा पांच मार्च को पारित आदेश को चुनौती देते हुए सीबीआई ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया था। इसमें कहा गया था कि विशेष न्यायाधीश ने सीबीआई को अपने द्वारा एकत्र किए गए सभी दस्तावेजों को दायर करने या अदालत के समक्ष पेश करने के निर्देश जारी करने में अपने अधिकार क्षेत्र को जांच के दौरान पार कर लिया था। इस तथ्य के बावजूद कि सीबीआई उन पर भरोसा कर रही है या नहीं, ऐसा यह यह देखने के लिए किया गया कि आरोपी व्यक्ति भी ऐसे दस्तावेजों की प्रतियों के हकदार हैं।

    याचिका में कहा गया,

    "सीआरपीसी में न तो कोई प्रावधान है जो जांच एजेंसी पर अदालत के दस्तावेजों को अग्रेषित करने के लिए कर्तव्य रखता है, जिस पर वह भरोसा नहीं करता है और न ही सीआरपीसी में कोई प्रावधान है जो मजिस्ट्रेट को आरोपी को निरीक्षण करने की अनुमति देता है। वह भी ऐसे दस्तावेज जिनको पूर्व ट्रायल चरण में न तो अदालत में दायर किया गया हैं और न ही जिन पर अभियोजन पक्ष द्वारा भरोसा किया गया है।"

    इसे ध्यान में रखते हुए याचिका में यह भी कहा गया कि दस्तावेजों के प्रकटीकरण के संबंध में अभियुक्त का अधिकार "संहिताबद्ध के रूप में सीमित अधिकार है और निष्पक्ष जांच और ट्रायल की नींव है।"

    सीबीआई ने आईएनएक्स मीडिया प्राइवेट लिमिटेड और कार्ति चिदंबरम के खिलाफ 15 मई, 2017 को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 120B सपठित धारा 420 धारा आठ, 12(2) और 13(1)(डी) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत एफआईआर दर्ज की थी।

    चूंकि अपराधों का उल्लेख धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 से जुड़ी अनुसूची में मिलता है, इसलिए प्रवर्तन निदेशालय (डीओई), वित्त मंत्रालय, राजस्व विभाग, भारत सरकार द्वारा 18 मई 2017 को एक मामला भी दर्ज किया गया था। इसलिए पीएमएलए के तहत संभावित कार्रवाई के लिए जांच शुरू की गई थी।

    उक्त एफआईआर इन आरोपों पर दर्ज की गई थी कि आईएनएक्स मीडिया के क्रमशः निदेशक और सीओओ इंद्राणी मुखर्जी और प्रतिम मुखर्जी ने कार्ति पी चिदंबरम के साथ एक आपराधिक साजिश के तहत विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड (एफआईपीबी) द्वारा अनुमोदित राशि से अधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) प्राप्त करने के लिए अवैध कार्य किया। अन्य आरोप यह था कि आईएनएक्स मीडिया द्वारा एफआईपीबी की मंजूरी के बिना इस तरह के अनधिकृत डाउनस्ट्रीम निवेश को कार्ति पी. चिदंबरम ने एफआईपीबी यूनिट, आर्थिक मामलों के विभाग (डीईए), वित्त मंत्रालय (एमओएफ) के लोक सेवकों को प्रभावित करके रोक दिया था।

    इसलिए यह आरोप लगाया गया कि पी चिदंबरम और कार्ति चिदंबरम की आपराधिक साजिश और प्रभाव के कारण ऐसे अधिकारियों ने अपने आधिकारिक पदों का दुरुपयोग किया और आईएनएक्स मीडिया को अनुचित लाभ पहुंचाया, जिसके कारण आईएनएक्स मीडिया ने कुछ कंपनियों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भारी मात्रा में भुगतान किया था, जो कार्ति पी चिदंबरम के पास था।

    जांच से पता चला कि आईएनएक्स मीडिया द्वारा अतिरिक्त एफडीआई और डाउनस्ट्रीम निवेश को नियमित करने के लिए उक्त मामले की आपराधिक गतिविधियों से कुछ मौकों पर गैर-कानूनी आय उत्पन्न हुई और वही कार्ति पी चिदंबरम को उनके साथ जुड़ी कुछ मुखौटा कंपनियों के माध्यम से प्राप्त हुई थी।

    इसके अलावा, यह पता चला कि एक नकली चालान दिनांक 26 जून 2008 रुपये का आईएनएक्स मीडिया को परामर्श सेवाएं प्रदान करने के लिए कार्ति चिदंबरम के स्वामित्व वाली कंपनी एएससीपीएल के नाम पर 11,23,600 रुपये जुटाए गए थे। जांच में आगे पता चला कि सितंबर, 2008 के महीने में चार अन्य कंपनियों के नाम पर लगभग 700,000 अमेरिकी डॉलर (3.2 करोड़ रुपये के बराबर) की राशि के लिए चार और नकली चालान भी आईएनएक्स मीडिया पर जारी किए गए थे।

    केस शीर्षक: सीबीआई बनाम मेसर्स आईएनएक्स मीडिया प्राइवेट लिमिटेड और अन्य।

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