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एनआई एक्ट की धारा 138 को लागू करने से धारा 406, 420 आईपीसी के तहत अपराध के पंजीकरण पर रोक नहीं है: कर्नाटक हाईकोर्ट

Avanish Pathak
14 May 2022 10:23 AM GMT
एनआई एक्ट की धारा 138 को लागू करने से धारा 406, 420 आईपीसी के तहत अपराध के पंजीकरण पर रोक नहीं है: कर्नाटक हाईकोर्ट
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कर्नाटक हाईकोर्ट ने माना है कि भले ही शिकायत में एनआई एक्ट की धारा 138 लागू की गई हो, आईपीसी की धारा 420 के तहत कार्यवाही सुनवाई योग्य है।

जस्टिस एम नागप्रसन्ना की सिंगल जज बेंच ने कहा,

"अधिनियम के तहत एक मामले में ध्यान देने की आवश्यकता है कि क्या यह कानूनी रूप से लागू करने योग्य ऋण के लिए है और जुर्माना लगाया जाता है। धारा 406 या 420 आईपीसी के तहत एक ही साधन पर शामिल अपराध में सात साल की सजा दी जा सकती है और अन्य बातों के साथ-साथ आईपीसी की धारा 420 के तहत धोखाधड़ी के अपराध के मामले में मेन्स री का तत्व देखा जाना आवश्यक है।"

मामला

याचिकाकर्ताओं ने एक सोमशेखर बी द्वारा दायर निजी शिकायत पर आईपीसी की धारा 420 के तहत दंडनीय अपराध के लिए 22-07-2021 को दर्ज की गई कार्यवाही पर सवाल उठाते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था।

याचिकाकर्ता हेडविन एक्ज़िम प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी के निदेशक थे। उन्होंने दूसरे प्रतिवादी/शिकायतकर्ता से संपर्क किया और अपने व्यवसाय में पैदा होने वाली तत्काल वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए वित्तीय सहायता की मांग की। वित्तीय सहायता जुलाई 2015 और सितंबर 2015 के बीच प्रदान की गई थी, जिसके विरुद्ध कंपनी ने कुल पांच चेक जारी किए थे। चेक बाउंस हो गए। जिसके बाद शिकायतकर्ता द्वारा एनआई एक्ट, 1881 को लागू करने की कार्यवाही की गई। यह सक्षम न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है।

इसके अलावा, चेक जारी करने के उसी साधन पर, जिसके लिए अधिनियम की धारा 138 के तहत कार्यवाही शुरू की गई थी, शिकायतकर्ता ने सीआरपीसी की धारा 200 को लागू करते हुए एक निजी शिकायत दर्ज की, कंपनी और उसके निदेशकों की ओर से आईपीसी की धारा 420 के तहत धोखाधड़ी का आरोप लगाया गया। विद्वान दंडाधिकारी ने उक्त निजी शिकायत पर सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत जांच के निर्देश दिए हैं। पुलिस उक्त निर्देश के अनुसार सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत एफआईआर दर्ज किया है।

निष्कर्ष

पीठ ने संगीताबेन महेंद्रभाई पटेल बनाम गुजरात और अन्‍य (2012) 7 SCC 621 के मामले में शीर्ष अदालत के फैसले का हवाला दिया, जिसमें अदालत ने इस मुद्दे पर विचार किया कि अधिनियम की धारा 138 के तहत लंबित या दोषसिद्धि के बाद भी क्या आईपीसी की धारा 420 के तहत एक याचिका सुनवाई योग्य होगी।। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि दोनों अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते हैं।

कोर्ट ने कहा,

"सुप्रीम कोर्ट का मानना ​​है कि संविधान के अनुच्छेद 20 (2) या सीआरपीसी की धारा 300 (1) का उल्लंघन करने का कोई सवाल ही नहीं हो सकता क्योंकि यह दोहरा खतरे के बराबर नहीं है। इसलिए याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश विद्वान वकील का यह निवेदन कि एक बार शिकायतकर्ता द्वारा अधिनियम की धारा 138 को लागू करने के बाद, आईपीसी की धारा 420 के तहत दंडनीय अपराध के लिए कार्यवाही सुनवाई योग्य नहीं है, स्वीकार्य नहीं है। यह याचिकाकर्ताओं के लिए ट्रायल का मामला है।"

इसके अलावा, अदालत ने शिकायत की जांच की और कहा, "शिकायत पर एक अवलोकन स्पष्ट रूप से इंगित करता है कि शिकायत प्रियंका श्रीवास्तव के मामले में निर्णय के आदेश के अनुपालन में है क्योंकि शिकायतकर्ता शिकायत में पुलिस के समक्ष अपराध दर्ज करने के लिए किए गए प्रयासों का वर्णन करता है...।"

इसने कहा, "इसलिए, दर्ज की गई शिकायत भी प्रियंका श्रीवास्तव के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन नहीं है।"

याचिका को खारिज कर दिया गया।

केस शीर्षक: रश्मि टंडन और अन्‍य बनाम कर्नाटक राज्य

केस नंबर: CRIMINAL PETITION No.6638 OF 2021

सिटेशन: 2022 लाइव लॉ (कर) 159


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