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जब अभियुक्त जमानत पर हो तो जांच अधिकारी द्वारा अभियुक्त को विशेष रूप से चार्जशीट दाखिल करने के बारे में सूचित करना चाहिए: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
11 Jan 2021 6:17 AM GMT
जब अभियुक्त जमानत पर हो तो जांच अधिकारी द्वारा अभियुक्त को विशेष रूप से चार्जशीट दाखिल करने के बारे में सूचित करना चाहिए: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि जब अभियुक्त जमानत पर हो तो जांच अधिकारी द्वारा अभियुक्त को विशेष रूप से चार्जशीट दाखिल करने के बारे में सूचित करना चाहिए। साथ ही हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक अदालतें गिरफ्तारी के पहले गैर-जमानती वारंट को सीधे जारी न करें।

न्यायमूर्ति संजय के.अग्रवाल की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया।

दरअसल, न्यायमूर्ति संजय के.अग्रवाल की खंडपीठ अतिरिक्त सत्र न्यायालय के आदेश की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस मामले में अदालत ने मजिस्ट्रेट कोर्ट के आदेश की पुष्टि करते हुए उसे सीआरपीसी की धारा 437 के तहत जमानत देने से इनकार कर दिया था।

मामले के तथ्य

याचिकाकर्ता के खिलाफ आईपीसी की धारा 509, महिलाओं के प्रतिषेध प्रतिनिधित्व (निषेध) अधिनियम, 1986 की धारा 4 और धारा 6, इसके साथ आईटी अधिनियम की धारा 66(3), धारा 67 और धारा 72 के तहत 18 जनवरी 2013 को प्राथमिकी दर्ज की गई।

चूंकि उसके खिलाफ दर्ज सभी अपराध जमानती अपराध थे, इसलिए उन्हें संबंधित पुलिस अधिकारी ने 19 जनवरी 2013 को निजी मुचलके पर रिहा कर दिया। इस मामले में उसके यानी याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल किया गया था। 28 मार्च 2014 को अधिकार क्षेत्र की आपराधिक अदालत के समक्ष आरोप-पत्र दाखिल करने के बारे में न्यायिक पुलिस द्वारा उसे सूचित नहीं किया गया था।

इसके बाद कोर्ट ने आपराधिक मामला दर्ज किया और 28 मार्च 2014 को गिरफ्तारी का गैर-जमानती वारंट जारी किया (भले ही विभिन्न सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसले में कहा गया है कि सीधे गैर-जमानती वारंट जारी नहीं किया जाना चाहिए)।

उसे 10 अप्रैल 2014 को गिरफ्तार किया गया और मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। उस दिन अभियुक्त / याचिकाकर्ता के मुताबिक उसे सबसे पहले, परीक्षण मजिस्ट्रेट के सामने शाम को 5.30 बजे पेश किया गया था। आदेश पत्र में दर्ज किया गया है कि आरोपी को शाम को 4.45 बजे पेश किया गया, और सीधे उसे सेंट्रल जेल भेजने का निर्देश दिया गया था।

इसके तुरंत बाद, जब अभियुक्त ने जमानत देने के लिए सीआरपीसी की धारा 437 के तहत आवेदन प्रस्तुत किया, तो उसकी जमानत की अर्जी रिकॉर्ड पर (उसी दिन 05:30 बजे) ली गई और उसे अगली तारीख यानी 11 अप्रैल को सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया।

इसके बाद अगली तारीख (11 अप्रैल 2014) को, नियमित जमानत के लिए उनकी अर्जी खारिज कर दी गई। कहा गया कि भले ही उन पर जो आरोप लगाए गए थे, वे जमानती हैं, फिर भी आईटी एक्ट की धारा 67 ए के तहत अपराध, दंडनीय है और यह एक गैर-जमानती अपराध है। इस प्रकार उसके आवेदन को अस्वीकार किया गया।

यहां, यह ध्यान देने वाली बात है कि याचिकाकर्ता के खिलाफ गैर-जमानती अपराध के लिए कोई आरोप नहीं था, फिर भी, वह केवल मजिस्ट्रेट द्वारा किए गए अवलोकन के आधार पर हिरासत में रहा। मजिस्ट्रेट का कहना था कि आईटी अधिनियम की धारा 67 ए के तहत अपराध ही प्रथम दृष्टया है। (विशेषकर तब जब पुलिस या न्यायालय द्वारा विधिवत गठित कार्यवाही में कोई अपराध नहीं जोड़ा गया है)।

न्यायालय का अवलोकन

हाईकोर्ट का कहना है कि,

"आरोपी व्यक्तियों की उपस्थिति को सुरक्षित करने के लिए गिरफ्तारी के सीधे गैर-जमानती वारंट को जारी करने वाले न्यायालयों के व्यवहार को शीर्ष अदालत ने विभिन्न फैसलों में निरस्त कर दिया है।"

हाईकोर्ट ने इंदर मोहन गोस्वामी और एक अन्य बनाम उत्तरांचल राज्य और अन्य (2007) 12 SCC 1 के मामले में शीर्ष अदालत द्वारा दिए गए फैसले को दोहराया।

इस मामले में कहा गया था कि,

"गैर-जमानती वारंट जारी करना व्यक्तिगत स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करना है और इसलिए अदालत को गैर-जमानती वारंट जारी करने से पहले बेहद सावधानी बरतनी चाहिए।"

हाईकोर्ट ने कहा कि,

"मजिस्ट्रेट सीधे तौर पर गलत था जो पुलिस स्टेशन द्वारा व्यक्तिगत बांड पर याचिकाकर्ता की उपस्थिति को सुरक्षित रखने के लिए गिरफ्तारी का गैर-जमानती वारंट जारी किया था, जब विशेष रूप से रिकॉर्ड के लिए कोई सबूत / दस्तावेज न नहीं था। जिसे चार्जशीट दाखिल करने के बारे में सूचित किया गया या वह फरार हो गया था और वह संबंधित पुलिस स्टेशन की पहुंच से बाहर था।"

प्रदीप राम बनाम केस ऑफ 14 झारखंड और दूसरा (2019) 17 SCC 326 के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में निर्धारित सिद्धांत को रेखांकित करते हुए कोर्ट ने कहा कि,

"चूंकि याचिकाकर्ता पहले से ही क्षेत्राधिकार पुलिस द्वारा जमानत पर थे। साथ ही वह उस दिन से ही जमानत पर था जिस दिन उसे गिरफ्तार किया गया था, और इसके बाद जमानती अपराध के रूप में इस मामले को कोर्ट के सामने लाया गया था। पुलिस या आपराधिक अदालत के पास गैर-जमानती अपराध का कोई सबूत नहीं था इसलिए याचिकाकर्ता / अभियुक्त रिहाई का हकदार था। जमानत मिलनी चाहिए।"

कोर्ट ने आगे कहा कि,

"इस मामले में मजिस्ट्रेट द्वारा अपनाई गई प्रकिया यह दिखती है कि बिना चार्जशीट को सत्यापित किए मनोरंजन ढंग से काम किया गया है। जब याचिकाकर्ता/अभियुक्त के खिलाफ सीधे गिरफ्तारी का वारंट जारी करने के लिए नोटिस देने से पहले यह पता होना जरूरी था कि इस मामले में अभियुक्त पहले ही जमानत पर है, और इसके भी उसे केंद्रीय जेल में भेजा गया। जमानत के लिए किए गए आवेदन की सुनवाई अगली तारीख को होगी और अगली तारीख को आईटी अधिनियम की धारा 67 ए के तहत अपराध को शामिल किए बिना उसकी जमानत की अर्जी को खारिज कर दिया जाता है। ऐसा लगता है यह सब कानून के हिसाब से नहीं हुआ है।"

नतीजतन, संशोधित आदेश के साथ-साथ ट्रायल मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेश को भी अलग रखा गया।

यह याचिका निम्नलिखित निर्देशों के साथ निपटा दी गई;

1. जब भी आरोप-पत्र दाखिल किया जाता है और अभियुक्त को पहले ही जमानत दे दी गई है तब संबंधित जांच अधिकारी को यह सुनिश्चित करना होगा कि अभियुक्त को आरोप-पत्र दाखिल करने की तारीख और स्थान के बारे में सूचना देना जरूरी है। इसके साथ ही चार्जशीट के साथ-साथ सबूत भी अदालत में प्रस्तुत करने होंगे।

2. संबंधित अदालत के सामने चार्जशीट पेश करते वक्त अभियुक्त को दी गई सूचना देने की तारीख और अभियुक्त के बारे में पुष्टि करनी होगी। चार्जशीट दाखिल करने के बारे में अभियुक्त को सूचना दी गई है या नहीं और इस संतुष्टि के आधार पर अदालत अभियुक्त की उपस्थिति सुनिश्चित करेगी।

3. आपराधिक न्यायालयों को जमानत के आवेदनों पर विशेष रूप से उन अपराधों के संबंध में विचार करना चाहिए, जो बिना किसी देरी के एक ही दिन में जमानती हैं और आरोपी को जेल भेजने के अगले दिन के लिए जमानत आवेदन की सुनवाई को अनावश्यक रूप से स्थगित नहीं करनी चाहिए।

इस तरह के अभ्यास को सभी आपराधिक अदालतों द्वारा सख्ती से पालन किया जाना चाहिए।

ऑर्डर डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें



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