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अगर अपराध का मकसद जातिवादी हमला नहीं है तो एससी/एसटी अधिनियम के प्रावधान लागू नहीं किए जा सकते: कर्नाटक हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
2 Nov 2021 7:27 AM GMT
अगर अपराध का मकसद जातिवादी हमला नहीं है तो एससी/एसटी अधिनियम के प्रावधान लागू नहीं किए जा सकते: कर्नाटक हाईकोर्ट
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कर्नाटक हाईकोर्ट ने दोहराया कि पीड़ित के एससी/एसटी समुदाय का सदस्य होने कारण अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (एससी / एसटी अधिनियम) के प्रावधानों को हर अपराध में लागू नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति श्रीनिवास हरीश कुमार ने कहा,

"ऐसा नहीं है कि हर अपराध में यदि पीड़ित अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य होता है तो अधिनियम की धारा तीन के तहत अपराध किया गया है। यदि अपराध का मकसद जातिवादी हमला नहीं है तो आरोपी केवल भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत किसी भी अपराध के लिए आरोप पत्र दायर किया जा सकता है, जिसे अपराध की घटना की पृष्ठभूमि में या अन्य कानून के तहत उचित रूप से लागू किया जा सकता है। इसे तथ्यों और परिस्थितियों के अनुसार लागू किया जा सकता है।"

इसके अलावा बेंच ने कहा,

"अधिनियम अस्पृश्यता के उन्मूलन के लिए और अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को जातिवादी हमले और जाति आधारित भेदभाव से बचाने के लिए अधिनियमित किया गया है। इस पृष्ठभूमि में धारा तीन में विभिन्न अपराधों की गणना की गई है। किसी को भी लागू करने की प्राथमिक आवश्यकता धारा तीन के तहत अपराध उस जाति के प्रति जाति आधारित हमला या घृणा है, जब तक कि जांच में अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित किसी व्यक्ति के उत्पीड़न के लिए अधिनियम की धारा तीन के तहत किसी भी अपराध को करने के इरादे को इंगित या प्रकट नहीं किया जाता है। साथ ही अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य का अपमान या उपहास करना, क्योंकि ऐसा व्यक्ति केवल उसी जाति का है, इसे भी धारा तीन के तहत अपराध को चार्जशीट में शामिल नहीं किया जा सकता।"

कोर्ट ने आगे कहा,

"हालांकि अधिनियम अनिवार्य रूप से अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को अत्याचार या उत्पीड़न से बचाने के लिए है। इसका दुरुपयोग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। इसलिए जांच अधिकारी पर अधिक जिम्मेदारी है कि वह चार्जशीट दाखिल करने से पहले समझदारी से निर्णय ले।"

अदालत ने श्रीसंगम प्रिया द्वारा की गई शिकायत के आधार पर लोकनाथ द्वारा दायर याचिका को अनुमति देते हुए यह टिप्पणी की। इसमें उसके खिलाफ आईपीसी की धारा 172, 173 और एससी/एसटी (पीओए) की धारा तीन(एक)(एफ), तीन(एक)(जी) के तहत दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की गई थी।

दोनों पक्षकारों के बीच संपत्ति का विवाद चल रहा है। तदनुसार, याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि केवल इसलिए कि वह अपनी संपत्ति की रक्षा के लिए लड़ रहा है तो यह काफी अजीब है कि प्रतिवादी ने एससी/एसटी अधिनियम के प्रावधानों के तहत उसके खिलाफ झूठी शिकायत की।

उसने कहा कि विवाद पूरी तरह से दीवानी प्रकृति का है और अगर एफआईआर पढ़ी जाती है तो यह याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई अपराध साबित नहीं करता।

न्यायालय के निष्कर्ष:

पीठ ने याचिकाकर्ता द्वारा पेश किए गए संबंधित भूमि अभिलेखों का अध्ययन किया। इसने एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा तीन(एक)(एफ) का उल्लेख किया और कहा,

"खंड (एफ) को लागू करने के लिए अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य की भूमि पर किसी व्यक्ति द्वारा गलत तरीके से कब्जा या खेती की जानी चाहिए। अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित नहीं है।"

इसमें कहा गया है,

"चार्जशीट में इन सामग्रियों का खुलासा नहीं किया गया।"

इसके अलावा, अदालत ने कहा,

"जहां तक ​​अधिनियम की धारा तीन(एक)(जी) के तहत अपराध का संबंध है तो यह आवश्यक घटक गलत तरीके से बेदखली या गलत हस्तक्षेप का है। दूसरे प्रतिवादी को उसकी जमीन से गलत तरीके से बेदखल या उसकी जमीन के साथ गलत हस्तक्षेप करने का संकेत देने वाली कोई सामग्री नहीं है।"

तब यह राय बनी,

"यदि मुकदमेबाजी के आधार को देखा जाए तो यह दो निकटवर्ती भूस्वामियों के बीच विवाद के अलावा और कुछ नहीं है। याचिकाकर्ता दूसरे प्रतिवादी की भूमि की पहचान पर विवाद करता है और इसलिए एक सक्षम सिविल कोर्ट अकेले इस संबंध में निर्णय ले सकता है। इसलिए इस कारण धारा तीन(एक)(जी) भी लागू नहीं होती है।"

इसके बाद अदालत ने कहा,

"मामले में जैसा कि पहले ही चर्चा की जा चुकी है ऐसा प्रतीत होता है कि अत्याचार का कोई अपराध नहीं हुआ है। फिर आईपीसी की धारा 172 और 173 के तहत दो अपराध हैं। दोनों अपराध परिहार से संबंधित हैं। सम्मन या नोटिस का चूंकि आरोप पत्र सामग्री अधिनियम की धारा तीन(एक)(एफ) और तीन(एक)(जी) के तहत अपराध का खुलासा नहीं करती है। याचिकाकर्ता पर आईपीसी के तहत अपराधों के लिए मुकदमा चलाना अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।"

तदनुसार इसने याचिका को अनुमति दी और याचिकाकर्ता के खिलाफ बेंगलुरु में एक सत्र न्यायालय के समक्ष लंबित कार्यवाही को रद्द कर दिया।

केस शीर्षक: लोकनाथ बनाम कर्नाटक राज्य

केस नंबर: 2021 की आपराधिक याचिका संख्या 80

आदेश की तिथि: 4 अक्टूबर, 2021।

उपस्थिति: याचिकाकर्ता के लिए एडवोकेट वी.बी.शिवकुमार; R1 के लिए एडवोकेट आर.डी.रेणुकाराध्या; R2 के लिए एडवोकेट एन.आर.नाइक।

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