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'दोषी होने पर भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता सुरक्षित करने का विचार': दिल्ली हाईकोर्ट ने ज़मानत की शर्त का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को सामुदायिक सेवा करने का निर्देश दिया

LiveLaw News Network
30 Nov 2021 12:59 PM GMT
दोषी होने पर भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता सुरक्षित करने का विचार: दिल्ली हाईकोर्ट ने ज़मानत की शर्त का उल्लंघन करने वाले  व्यक्ति को सामुदायिक सेवा करने का निर्देश दिया
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दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को जमानत की शर्त का उल्लंघन करने वाले एक व्यक्ति को संजय गांधी पशु देखभाल केंद्र में एक महीने की सामुदायिक सेवा करने का निर्देश देते हुए कहा कि मूल विचार व्यक्तियों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सुरक्षित करने का है, भले ही उन्हें दोषी ठहराया जा रहा हो।

न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल और न्यायमूर्ति अनूप जे भंभानी की पीठ ने एक शाहरुख अली को निर्देश दिया है कि वह हर दिन तीन घंटे यानी दोपहर 1 बजे से शाम 4 बजे तक केंद्र के प्रमुख द्वारा आवंटित कार्यों को पूरा करे।

कोर्ट ने मामले को आगे की सुनवाई के लिए 7 जनवरी को पोस्ट करते हुए पशु केंद्र के प्रमुख को निर्देश दिया है कि वह शाहरुख को ऐसा काम आवंटित करे,जो उन्हें उचित लगता है और मामले में अनुपालन रिपोर्ट दाखिल की जाए।

28 सितंबर, 2020 के आदेश के अनुसार, न्यायमूर्ति विपिन सांघी और न्यायमूर्ति रजनीश भटनागर की पीठ ने अपील की पेंडेंसी के दौरान शाहरुख को नियमित जमानत दी थी। कोर्ट ने कहा था कि वह पहले ही साढ़े 5 साल से अधिक समय जेल में गुजार चुका है।

अदालत ने कहा था कि,''दो अपीलकर्ताओं की उम्र और इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि सभी अपील की सुनवाई में समय लगने की संभावना है,हम इन अपील के लंबित रहने के दौरान उन्हें जमानत देने के इच्छुक हैं।''

उन पर लगाई गई जमानत की शर्तों में से एक यह थी कि वह जमानत की अवधि के दौरान दिल्ली शहर से बाहर नहीं जाएंगे।

अब अदालत इस मामले में शिकायतकर्ता द्वारा दायर एक आवेदन पर विचार कर रही है, जिसमें कहा गया है कि अपीलकर्ता शाहरुख ने दिल्ली से बाहर की यात्रा करके उपरोक्त शर्त का उल्लंघन किया है।

शिकायतकर्ता ने कुछ तस्वीरें और अन्य सामग्री की प्रति दाखिल की है,जिनको देखने के बाद पता चलता है कि अपीलकर्ता ने जमानत की शर्त का उल्लंघन करते हुए रामपुर और शिमला की यात्रा की थी।

इस आवेदन के जवाब में अपीलकर्ता के वकील ने इस तथ्य को स्वीकार किया कि शाहरुख रामपुर गया था,परंतु उन्होंने कहा कि ऐसा इसलिए किया गया था क्योंकि वह अपनी मां की इच्छा पूरी करने के लिए वहां के एक तीर्थ स्थान पर गया था। उसकी मां की इच्छा थी कि वह रिहा होने पर उस तीर्थ स्थान पर जाए।

वहीं शिमला की यात्रा करने के आरोप के संबंध में, उसके वकील ने कहा कि यह गलत आरोप है क्योंकि यह तस्वीरें पुरानी हैं।

दूसरी ओर, राज्य ने इस बात की पुष्टि की है कि अपीलकर्ता शर्तों का उल्लंघन करके दिल्ली से बाहर गया था, परंतु साथ ही कहा कि यह दिखाने के लिए कोई सामग्री नहीं है कि वह किसी भी अवैध गतिविधि में शामिल था।

कोर्ट ने कहा कि,''हम अपीलकर्ता की जमानत रद्द करने के इच्छुक नहीं हैं, लेकिन शर्तों के उल्लंघन का प्रायश्चित करने के लिए, हम अपीलकर्ता को संजय गांधी पशु केंद्र में प्रतिदिन दोपहर 1 बजे से शाम 4 बजे तक सेवा प्रदान करने का निर्देश देते हैं और उन्हें इस अवधि के दौरान केंद्र के प्रमुख द्वारा सौंपे गए सभी कार्य करने होंगे।''

शुरुआत में ही न्यायमूर्ति मृदुल ने कहा कि,''... तथ्य यह है कि इस अदालत ने अपील की लंबित अवधि के दौरान उसे नियमित जमानत प्रदान की है। अब उस जमानत को रद्द करने के लिए, आपके पास एक अच्छा आधार है लेकिन हमें बच्चे को नहाने के पानी से बाहर नहीं फेंकना चाहिए। मूल विचार व्यक्तियों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सुरक्षित करने का है, भले ही उन्हें दोषी ठहराया जा रहा हो।''

दूसरी ओर, न्यायमूर्ति भंभानी का मानना था कि जमानत की शर्त के उल्लंघन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है, लेकिन इसका परिणाम आनुपातिक होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि,''परिणाम आनुपातिक होना चाहिए। उसने पुलिस को सूचना दी है, वह भागा नहीं है, उसने कोई अपराध नहीं किया है। वह हमारे सामने खड़ा है। इसलिए आनुपातिक प्रायश्चित होना चाहिए।''

मामले की सुनवाई अब 7 जनवरी को होगी।

केस का शीर्षक- शाहरुख अली बनाम दिल्ली राज्य

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