हाइब्रिड सुनवाई अब हमेशा रहेगी, इंसानी फ़ैसलों की जगह नहीं ले सकता AI: चंडीगढ़ पैनल चर्चा में जजों की राय

Shahadat

10 March 2026 9:48 AM IST

  • हाइब्रिड सुनवाई अब हमेशा रहेगी, इंसानी फ़ैसलों की जगह नहीं ले सकता AI: चंडीगढ़ पैनल चर्चा में जजों की राय

    पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में चंडीगढ़ इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन सेंटर ने इंडियन इंटरनेशनल डिस्प्यूट्स वीक के सहयोग से "जज: वर्तमान और भविष्य" विषय पर एक पैनल चर्चा का आयोजन किया।

    इस चर्चा में भारत और विदेश से न्यायपालिका के सदस्य शामिल हुए, जिन्होंने कानूनी व्यवस्था में तेज़ी से हो रहे तकनीकी विकास के बीच जजों की बदलती भूमिका पर विचार-विमर्श किया।

    इस पैनल में राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस अरुण मोंगा, जस्टिस विनोद एस. भारद्वाज, पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के जस्टिस हरकेश मनुजा, यूके के न्याय मंत्रालय में फर्स्ट-टियर ट्रिब्यूनल जज सुखी गिल और टेक्सास (US) की सिविल कोर्ट की जज मनप्रीत मोनिका सिंह शामिल थीं। इस सत्र का संचालन सीनियर एडवोकेट आनंद छिब्बर ने किया।

    कोविड के बाद अदालतों में डिजिटल बदलाव

    न्यायपालिका पर टेक्नोलॉजी के असर के बारे में बात करते हुए जस्टिस अरुण मोंगा ने कहा कि कोविड-19 महामारी के दौरान अदालतों का डिजिटलीकरण तेज़ी से हुआ, जिसके परिणामस्वरूप "कोविड से पहले और बाद में एक स्पष्ट बदलाव" देखने को मिला।

    उन्होंने कहा,

    "यह पूरा डिजिटलीकरण कोविड के समय हुआ। इसलिए कोविड से पहले और बाद में एक बड़ा बदलाव आया।"

    उन्होंने बताया कि वर्चुअल कोर्ट की सुनवाई से पहुंच में काफ़ी सुधार हुआ है, खासकर सीमा पार कानूनी मामलों में।

    जस्टिस मोंगा ने कहा,

    "सीमा पार के वकील टिकटों पर पैसे खर्च करने और खुद मौजूद रहने के बजाय वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए आसानी से जुड़ सकते हैं।"

    उन्होंने आगे कहा कि वर्चुअल सुनवाई से अदालतों में भीड़ कम करने और कोर्ट परिसरों के आसपास ट्रैफिक कम करने में भी मदद मिलती है... "इसके कई सकारात्मक असर होते हैं।"

    हालांकि, उन्होंने आगाह किया कि वर्चुअल सुनवाई पूरी तरह से आमने-सामने होने वाली सुनवाई की जगह नहीं ले सकती।

    उन्होंने कहा,

    "हम शायद ही कोई अंतिम या लंबी सुनवाई वर्चुअल माध्यम से कर पाएं, क्योंकि इंसानी आवाज़ कानों को संगीत जैसी लगती है, जबकि कंप्यूटर की आवाज़ वैसी नहीं होती।"

    भारत में 'डिजिटल खाई' (Digital Divide) को उजागर करते हुए जस्टिस मोंगा ने पूरे देश में तकनीकी प्रणालियों को एकीकृत करने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। राजस्थान का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि मुक़दमे लड़ने वाले लोग अक्सर अदालत में पेश होने के लिए लंबी दूरी तय करके आते हैं।

    उन्होंने कहा,

    "राजस्थान में लोग अदालत आने के लिए 1200 किलोमीटर तक का सफ़र तय करते हैं, क्योंकि यह देश का सबसे बड़ा राज्य है। इसलिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा से उन्हें बहुत मदद मिलती है।"

    संचालक सीनियर एडवोकेट आनंद छिब्बर के इस सवाल के जवाब में कि क्या वर्चुअल कोर्ट को एक स्थायी व्यवस्था के तौर पर जारी रहना चाहिए, जस्टिस मोंगा ने कहा कि इसका जवाब बिल्कुल साफ़ है।

    उन्होंने आगे कहा,

    “वकीलों के फ़ायदे के लिए, हाँ। यह अब यहीं रहने वाला है। आपको टेक-गीक (तकनीकी विशेषज्ञ) होने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन आपको टेक-सेवी (तकनीक की जानकारी रखने वाला) होना होगा। यह 'करो या मिट जाओ' वाली स्थिति है। यह एक हाइब्रिड मोड के तौर पर यहीं रहने वाला है।”

    सरकारी मुक़दमेबाज़ी और वर्चुअल न्याय-निर्णयन

    सरकार के सबसे बड़ी मुक़दमेबाज़ होने के मुद्दे पर बात करते हुए, जस्टिस विनोद एस. भारद्वाज ने कहा कि इस बात को सही संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

    उन्होंने कहा,

    “सरकार के पास एक विशाल प्रशासनिक ढांचा है और उसकी अपनी प्राथमिकताएं हैं। इसीलिए वे हर विवाद को समय पर नहीं देख पाते।”

    उन्होंने आगे कहा कि जहां एक तरफ़ सरकार सबसे बड़ी मुक़दमेबाज़ है, वहीं दूसरी तरफ़ वह देश की सबसे बड़ी रोज़गार देने वाली संस्था भी है।

    इस संबंध में उन्होंने कहा,

    “सरकार के सबसे बड़ी मुक़दमेबाज़ होने को नकारात्मक नज़रिए से नहीं देखा जाना चाहिए। यह सबसे बड़ी रोज़गार देने वाली संस्था भी है।”

    साथ ही यह भी माना कि कुछ मुक़दमेबाज़ी से बचा जा सकता है।

    जस्टिस भारद्वाज ने कहा कि प्रशासनिक मामलों के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग काफ़ी फ़ायदेमंद हो सकती है।

    जस्टिस भारद्वाज ने कहा,

    “आप वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए अधिकारियों को बुला सकते हैं। यह एक बहुत काम का ज़रिया है।”

    अदालतों में 'लंबित मामलों' पर पुनर्विचार

    न्यायिक मामलों के बैकलॉग (बकाया मामलों) के मुद्दे पर जस्टिस भारद्वाज ने “बकाया” की पारंपरिक समझ पर सवाल उठाया।

    उन्होंने कहा,

    “बकाया से आपका क्या मतलब है? वे आंकड़े जो आप अक्सर अख़बारों में देखते हैं — लेकिन क्या वे न्याय-निर्णयन के लिहाज़ से सही हैं?”

    उन्होंने आगे कहा,

    “आंकड़ों में किसी भी मामले को उसी पल दर्ज कर लिया जाता है, जिस पल उसे फ़ाइल किया जाता है। लेकिन क्या वह तुरंत ही 'बकाया' बन जाता है? क्या वह न्याय-निर्णयन के लिए तैयार होता है?”

    साथ ही यह भी जोड़ा कि मामलों को 'बकाया' तभी माना जाना चाहिए, जब उनके लिए तय की गई अनिवार्य समय-सीमाएं बीत चुकी हों।

    जस्टिस भारद्वाज ने डिजिटल सुनवाई के एक नकारात्मक पहलू की ओर भी इशारा किया। साथ ही कहा कि कभी-कभी तकनीकी ख़राबियों का बहाना बनाकर बहस से बचने की कोशिश की जाती है।

    उन्होंने कहा,

    “एक जज के तौर पर आपको ऐसे मामलों को भी देखना पड़ता है जिनका असल में कोई वजूद ही नहीं होता। इससे न्याय-निर्णयन में देरी होती है।”

    न्यायिक कार्यों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस: LiveLaw जैसे टूल्स बेहतर कानूनी बिंदु और मामले खोजने में मदद करते हैं

    जस्टिस ह्रकेश मनुजा ने कानूनी प्रैक्टिस और न्याय-निर्णयन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की बढ़ती भूमिका के बारे में बात की, साथ ही सावधानी बरतने की ज़रूरत पर भी ज़ोर दिया।

    उन्होंने कहा,

    "AI पर मेरा नज़रिया यह है कि हमें इसके साथ आगे बढ़ना चाहिए, लेकिन थोड़ी सावधानी के साथ। यह न्यायपालिका की मदद करेगा, लेकिन न्याय-निर्णयन की पूरी प्रक्रिया AI के हवाले न करें।"

    उन्होंने बताया कि AI-आधारित टूल्स प्रासंगिक कानूनी मिसालों की पहचान करने में मदद कर सकते हैं और जजों को कानूनी मुद्दों का ज़्यादा कुशलता से विश्लेषण करने में सहायता कर सकते हैं।

    उन्होंने कहा,

    "ऐसे इंजन हैं, जो LiveLaw, SCC आदि जैसे बेहतर कानूनी बिंदु खोजने में मदद कर सकते हैं..."

    जस्टिस मनुजा ने भविष्य बताने वाली कानूनी तकनीकों के उभरने पर भी प्रकाश डाला।

    उन्होंने कहा,

    "AI में भविष्य बताने वाला विश्लेषण (Predictive Analysis) भी उपलब्ध है। सरकार इन टूल्स का उपयोग किसी अपील में सफलता की संभावना का आकलन करने के लिए कर सकती है।"

    उभरते हुए भारतीय टूल्स का ज़िक्र करते हुए उन्होंने ऐसे सिस्टम का उदाहरण दिया, जो FIR के विवरण और मामले के पैटर्न का विश्लेषण करके ज़मानत के नतीजों का अनुमान लगाने की कोशिश करते हैं।

    उन्होंने कहा,

    "एक भारतीय ज़मानत अनुमान प्रणाली है, जहां आप FIR दे सकते हैं और यह ज़मानत की सफलता का अनुमान लगाती है।"

    जस्टिस मनुजा ने आगे कहा कि कुछ अदालतें पहले से ही ऐसी तकनीक के साथ प्रयोग कर रही हैं, जो बड़ी केस फाइलों का सारांश बना सकती है।

    उन्होंने कहा,

    "केरल हाईकोर्ट के जजों ने मुझे बताया कि वे एक ऐसे टूल का उपयोग कर रहे हैं, जो पूरी फाइल का सारांश तैयार कर सकता है। हम पीछे रह गए। हमें बहुत काम करना है — और इससे समय बचेगा।"

    जब उनसे पूछा गया कि क्या स्टूडेंट्स, युवा वकीलों और जजों के लिए औपचारिक AI प्रशिक्षण शुरू किया जाना चाहिए, तो जस्टिस मनुजा ने कहा कि सीखने की प्रक्रिया जजों से ही शुरू होनी चाहिए।

    उन्होंने कहा,

    "युवाओं को प्रशिक्षित करने के बजाय, इसकी शुरुआत हमसे होनी चाहिए। युवा पहले से ही तकनीक-प्रेमी हैं।"

    उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि कानूनी शिक्षा में कंप्यूटर और AI के कोर्स शामिल किए जाने चाहिए।

    प्रौद्योगिकी, पारदर्शिता और खुला न्याय

    डिजिटल कार्यवाही के संदर्भ में कोर्टरूम की पारदर्शिता और गोपनीयता के बारे में बात करते हुए जज सुखी गिल ने बताया कि यूके की न्याय प्रणाली खुले न्याय पर ज़ोर देती है।

    उन्होंने कहा,

    "यूके में यह पारदर्शी और खुला न्याय है। टैब्लॉइड्स को सक्रिय रूप से आने और भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। बंद दरवाज़ों के पीछे हमें इंसाफ़ नहीं मिलता।"

    साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि संवेदनशील मामलों की सुनवाई के दौरान आने-जाने पर सख़्त पाबंदी होती है।

    उन्होंने आगे कहा,

    "कुछ अदालतें ऐसी हैं, जो आम लोगों के लिए खुली नहीं होतीं। उन पर सख़्त निगरानी रखी जाती है और वहां सिर्फ़ कुछ खास लोगों को ही जाने की इजाज़त होती है।"

    जज जिंदर सिंह बोरा ने भी जजों और वकीलों, दोनों के लिए नई टेक्नोलॉजी की ज़रूरत पर ज़ोर दिया और बताया कि UK न्यायिक सॉफ़्टवेयर पर काफ़ी संसाधन खर्च करता है।

    उन्होंने कहा,

    "यूके में जजों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले सॉफ़्टवेयर पर लाखों पाउंड खर्च किए जाते हैं। टेक्नोलॉजी अच्छी है, लेकिन इसे वकीलों के लिए भी उपलब्ध कराया जाना चाहिए, वरना इसका कोई खास फ़ायदा नहीं है।"

    टेक्नोलॉजी को इंसानी रचनात्मकता की जगह नहीं लेनी चाहिए

    चर्चा के आखिर में सीनियर एडवोकेट क्षितिज शर्मा ने टेक्नोलॉजी और इंसानी फ़ैसले के बीच संतुलन पर अपने विचार रखे।

    उन्होंने आगे कहा,

    "मेरे पिता 72 साल के हैं, मैं 42 का हूँ और मेरा बेटा 10 साल का है। जब हम गाड़ी से घूमने जाते हैं तो भी हम पार्क में टहलना और अपने आस-पास की सुंदरता का आनंद लेना नहीं भूले हैं।"

    उन्होंने अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए कहा,

    "गाड़ी चलाते समय भी, हम अपनी आँखें बंद नहीं करते — हम चौकस रहते हैं। AI को इंसानी दिमाग की रचनात्मकता और सूझ-बूझ की जगह न लेने दें। आइए याद रखें कि सर्वशक्तिमान ने हमें एक सुंदर दिमाग का वरदान दिया है।"

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