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वर्चुअल अदालती कार्यवाही में धूम्रपान करते पाए गए वकील की माफी गुजरात हाईकोर्ट ने स्वीकार की, कहा- उन्हें पेशे में अभी लंबा रास्ता तय करना है"

LiveLaw News Network
7 Oct 2020 8:31 AM GMT
वर्चुअल अदालती कार्यवाही में धूम्रपान करते पाए गए वकील की माफी गुजरात हाईकोर्ट ने स्वीकार की, कहा- उन्हें पेशे में अभी लंबा रास्ता तय करना है
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गुजरात हाईकोर्ट के एक वकील ने, जिसे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से हो रही अदालती कार्यवाही के दौरान धूम्रपान करते पाए जाने के बाद गुजरात हाईकोर्ट ने 10,000 रुपए जमा करने का निर्देश दिया था, अदालत के सामने बिना शर्त माफी मांगी है और रुपए जमा कर दिए हैं।

सोमवार (05 अक्टूबर) को जस्ट‌िस एएस सुपेहिया की खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा था कि अधिवक्ता की माफी को बिना किया कठोर भावना या दुर्भावना के साथ स्वीकार किया जा रहा है। बेंच ने टिप्पणी की थी, "मैं उन्हें सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के प्रति सावधान रहने की सलाह देता हूं क्योंकि उन्हें पेशे में अभी लंबा रास्ता तय करना है।"

उल्लेखनीय है कि , रजिस्ट्रार, न्यायिक ने अपनी पूरी रिपोर्ट दिनांक 04.10.2020 को प्रस्तुत की थी। खंडपीठ ने उसी का अवलोकन किया था। रिपोर्ट को बार काउंसिल ऑफ गुजरात और बार एसोसिएशन ऑफ हाईकोर्ट ऑफ गुजरात को अवलोकन के लिए भेजा गया था।

उल्लेखनीय है कि बेंच ने दोनों शासी निकायों के रचनात्मक उपयोग के लिए सुप्रीम कोर्ट की कुछ टिप्पणियों को शामिल करने की इच्छा जताई थी।

बेंच ने इन री वर्सस विनय चंद्र मिश्रा रिपोर्टेड इन 1995 में एससीसी 584, में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया था, जिसमें देखा गया था- "एक वकील को पहले एक सज्जन व्यक्ति होना पड़ता है। उसकी सबसे मूल्यवान संपत्ति वह सम्मान और सद्भावना, जिसे वह अपने सहयोगियों के बीच कोर्ट में प्राप्त करता है।"

खंडपीठ ने आरडी सक्सेना बनाम बलराम प्रसाद शर्मा, 2000 (7) एससीसी 264 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि, "यदि एक वकील, हर समय, खुद को इस प्रकार तैयार रखता है, जो कि न्यायालय में उसके ओहदे, समुदाय के एक विशेषाधिकार प्राप्त सदस्य और एक सज्जन व्यक्ति के अनुरूप हो, यह ध्यान रखे कि एक व्यक्ति के लिए क्या वैध और नैतिक हो सकता है......"

बेंच ने अंत में, देवेंद्र भाई शंकर मेहता बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, 1993 (1) जीएलएच 36 के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था, "अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के तहत पंजीकृत एक अधिवक्ता से, जिसके पास प्रतिनिधित्व करने का लाइसेंस हो, मुकदमों के मामले में नैतिकता का उच्च स्तर और कानूनी और नैतिक योग्यता की निष्कलंक भावना बनाए रखने की उम्मीद है।"

मौजूदा मामले में कोर्ट ने टिप्पणी की, "हालांकि मैं दोनों सम्मानित संगठनों को अपने सदस्यों के लिए आवश्यक वार्तालाप शुरू करने का निर्देश नहीं दे सकता, लेकिन मुझे उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्वोक्त टिप्पणियों से उन्हें अवगत कराया जाएगा ताकि इस तरह की असंगतता और अफसोसजनक घटनाओं से बचा जा सके।"

इस प्रकार, वकील को सलाह दी गई कि वह सुप्रीम कोर्ट की पूर्वोक्त टिप्पणियों का ध्यान रखें, जिनमें वकीलों के लिए स्वीकार्य आचार संहिता की चर्चा है। उपर्युक्त टिप्पणियों के साथ, अदालत ने "अवांछनीय अध्याय को इस उम्मीद के साथ बंद कर दिया कि भविष्य में ऐसी घटना नहीं होनी चाहिए"।

यह भी स्पष्ट किया गया कि रजिस्ट्रार, न्यायिक का र‌िपोर्ट अग्रेषित करना और इस न्यायालय की टिप्पणियों" किसी भी प्रकार से अध‌िवक्ता श्री अजमेरा के खिलाफ प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेंगी।"

उल्लेखनीय है कि गुरुवार (24 सितंबर) को जस्ट‌िस एएस सुपेहिया की खंडपीठ ने कहा था कि वीडियो के जर‌िए हो रही सुनवाइयों में अधिवक्ताओं को "न्यूनतम गरिमापूर्ण व्यवहार" बनाए रखने की आवश्यकता है ताकि कार्यवाही के साथ-साथ संस्थान की महिमा और गरिमा बनी रहे।

मौजूदा मामले में, मूल शिकायतकर्ता श्री जेवी अजमेरा को कार में बैठकर धूम्रपान कर रहे थे।

अधिवक्ता के आचरण को खारिज करते हुए न्यायालय ने कहा था, "एक वकील से यह अपेक्षा नहीं की जाती है कि वह अदालत की कार्यवाही के दौरान कार में बैठकर धूम्रपान करे। अधिवक्ता के इस तरह के व्यवहार की कड़ी निंदा करने की आवश्यकता है।"

न्यायालय ने उन्हें एक सप्ताह के भीतर हाईकोर्ट रजिस्ट्री के पास 10,000 रुपए जमा करने का निर्देश दिया था। पूर्व में भी ऐसी घटनाएं हुई हैं, जहां अधिवक्ता अनुचित कपड़े में वर्चुअल कोर्ट में पेश होते पाए गए हैं।

गुजरात हाईकोर्ट ने बुधवार (23 सितंबर) को एक आवेदन को उठाते हुए पाया था कि आवेदक-अभियुक्त नंबर 1, अजीत कुभभाई गोहिल, जो वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत के समक्ष उपस्थित थे, खुलेआम थूक रहे थे।

आरोपी के इस तरह के आचरण को देखते हुए जस्ट‌िस एएस सुपेहिया की खंडपीठ ने कहा था, "यह अदालत आवेदक-अभियुक्त नंबर 1 के आचरण को देखते हुए मामला को आज उठाने की इच्छुक नहीं है।"

जून में, सुप्रीम कोर्ट ने एक वकील की माफी स्वीकार की थी। वह कोर्ट की सुनवाई के दौरान टी-शर्ट पहने हुए बिस्तर पर लेटा था।

राजस्थान हाईकोर्ट ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के जर‌िए हो रही सुनवाई में एक वकील को बनियान पहने देखकर जमानत याचिका स्थगित कर दी थी।

उड़ीसा हाईकोर्ट ने वकीलों द्वारा वाहनों, बगीचों और भोजन करते समय वीडियो के जर‌िए बहस करने की निंदा की।

इसके अलावा, कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड के खिलाफ स्वतः संज्ञान मानहानी का मामला शुरु किया था। उसने अदालत की सुनवाई का स्क्रीनशॉट ल‌िंक्‍डइन पर लगाया ‌था।

कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा था कि वर्चुअल कोर्ट की कार्यवाही का स्क्रीनशॉट लेना वास्तविक अदालती कार्यवाही की एक तस्वीर लेने के बराबर है। हालांकि, अवमानना ​​कार्यवाही को बाद में वकील को यह चेतावनी देकर हटा दिया गया कि भविष्य में इस तरह के आचरण को न दोहराया जाए।

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