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"भ्रष्टाचार अव्यवस्‍था की जननी": गुजरात हाईकोर्ट ने कथित रिश्वतखोरी में शामिल सब-इंस्पेक्टर की अग्रिम जमानत याचिका खारिज की

LiveLaw News Network
9 March 2022 6:30 AM GMT
भ्रष्टाचार अव्यवस्‍था की जननी: गुजरात हाईकोर्ट ने कथित रिश्वतखोरी में शामिल सब-इंस्पेक्टर की अग्रिम जमानत याचिका खारिज की
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गुजरात हाईकोर्ट ने दोहराया है कि "भ्रष्टाचार को दर्जे से ना आंका जाए, भ्रष्टाचार अव्यवस्‍था की जननी है, प्रगति की सामाजिक इच्छाशक्ति को नष्ट करती है, अवांछित महत्वाकांक्षाओं को गति देती है, विवेक की हत्या करती है, संस्थानों की महिमा को घटाती है, देश के आर्थिक स्वास्थ्य को अपाहिज बना देती है, भद्रता की भावना को नष्ट करती है और शासन की मज्जा में आघात करता है।"

इन्हीं टिप्पण‌ियों के साथ कोर्ट ने आईपीसी की धारा 384, 114, 294बी, 506 (2) और भ्रष्टाचार निवारण अधि‌नियम, 1988 की धारा 7, 12, 13(1)(ए) सहपठित धारा 13 (2) के तहत दर्ज मामले में आरोपी को सीआरपीसी की धारा 438 के तहत अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया।

आवेदक (फ‌िलहाल निलंबित) भुज के एक महिला पुलिस थाने में पुलिस उपनिरीक्षक के पद पर कार्यरत थी। आवेदक ने ड्राइवर के साथ एक कार को रोका था। उन्हें कार में पॉलिथीन बैग में रखा नशीला पदार्थ मिला।

चालक ने शिकायतकर्ता को धमकी दी कि अगर उन्हें एक लाख रुपये नहीं दिए गए तो एनडीपीएस एक्ट के तहत झूठा मामला दर्ज किया जाएगा। दोनों के बीच हुई सौदेबाजी के बाद 50,000 रुपये पर अंतिम राशि तय हुई थी।

आवेदक को यह कहते हुए उद्धृत किया गया था, "एक प्रमुख व्यक्ति के रूप में जब वह बची हुई राशि की व्यवस्‍था नहीं कर सका तो उस पर एनडीपीएस एक्ट पर मुकदमा दर्ज किया गया।"

इसके बाद, चालक और आवेदक ने शिकायतकर्ता को पैसे का भुगतान करने के लिए मजबूर किया और उसे तिगुना भी कर दिया।

शि‌कायतकर्ता ने आरोपी चालक और आवेदक के खिलाफ आपराधिक धमकी और जबरन वसूली के आरोप में एफआईआर दर्ज कराई। उन पर आईपीसी की धारा 384, 114, 294 (बी) और 506 (2) के तहत एफआईआर दर्ज की गई। यह भी आरोप लगा कि चालक ने आवेदक को 15,000 रुपये दिए थे। नतीजतन, जांच अधिकारी ने मामले में अधिनियम की धारा 7, 13, 13(1)(ए) सहपठित धारा 13 (2) को जोड़ दिया।

आवेदक की अग्रिम जमानत अर्जी को सत्र न्यायालय ने इस आधार पर खारिज कर दिया कि वह घटना के दरमियान मौजूद थी और अपने पद के बावजूद वह पैसे की मांग और जबरन वसूली के कृत्य में शामिल रही। हालांकि, आवेदक ने तर्क दिया कि सह-आरोपी के बयान के आधार पर उसे मामले में झूठा फंसाया गया है। इसके अलावा, यह बताने के लिए कोई सबूत नहीं था कि उसने गूगल पे के माध्यम से 15,000 प्राप्त किए थे।

धारा 384 के तहत कोई अपराध नहीं बनाया गया क्योंकि जब कार को रोका गया था तब उसने शिकायतकर्ता से कोई बातचीत नहीं की थी। अधिनियम की धारा 17ए राज्य सरकार के पूर्वानुमोदन के बिना लोक सेवक द्वारा कथित रूप से किए गए अपराध में किसी गिरफ्तारी, जांच या जांच की अनुमति नहीं देती है, जिसकी मांग मौजूदा मामले में नहीं की गई थी।

इसके विपरीत प्रतिवादी प्राधिकारी ने दलील दी कि आवेदक के अपराध की गंभीरता और बड़े पैमाने पर समाज के हित को देखते हुए जमानत से वंचित किया जाना चाहिए।

जस्‍टिस इलेश वोरा ने कहा कि धारा 438 सीआरपीसी के तहत शक्तियां असाधारण प्रकृति की हैं और उन्हें संयम से प्रयोग किया जाना चाहिए। इसलिए, अग्रिम जमानत केवल उन असाधारण परिस्थितियों में दी जा सकती है जहां न्यायालय का प्रथम दृष्टया यह विचार है कि आवेदक को गलत तरीके से फंसाया गया है।

हालांकि, उन्होंने कहा कि यहां ऐसा प्रतीत नहीं होता क्योंकि कथित कृत्य आवेदक की जानकारी में था। यह उसका कर्तव्य था कि वह मुखबिर को परेशान न करे या पदार्थ पाए जाने पर मामले की रिपोर्ट करे।

"एफआईआर को पढ़ने मात्र से पता चलता है कि पूरी घटना के दरमियान उसने ड्राइवर हरिभाई को कथित जबरन वसूली और अवैध रिश्वत की मांग से रोका नहीं, जिसे उसने झूठे मामला दर्ज कराने की आड़ में किया था।"

धारा 17ए का हवाला देते हुए, अदालत ने पुष्टि की कि यह प्रावधान मामले पर लागू नहीं होता क्योंकि मामला आधिकारिक कार्य या कर्तव्यों के निर्वहन में आवेदक द्वारा की गई किसी भी सिफारिश या निर्णय से संबंधित नहीं है।

वेल्लुस्वामी बनाम राज्य, 2019 (8) एससीसी 396 पर भरोसा रखा गया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने यह देखा कि "मांग और स्वीकृति या साजिश के लिए प्रत्यक्ष साक्ष्य की कार्रवाई, अप्रासंगिक है यदि परिस्थितिजन्य साक्ष्य बिना किसी हिचकिचाहट के आरोपी की ओर अवैध संतुष्टि प्राप्त करने की योजना का हिस्सा होने की ओर इशारा करते हैं। इसलिए, इस स्तर पर, कोई गुण नहीं होने का मुद्दा उठता है।"

सुब्रमण्यम स्वामी बनाम सीबीआई,(2014) 8 एससीसी 682 में यह देखा गया कि "भ्रष्टाचार राष्ट्र का दुश्मन है और भ्रष्ट लोक सेवकों को ट्रैक करना और ऐसे व्यक्तियों को दंडित करना 1988 के अधिनियम का एक आवश्यक आदेश है।"

तदनुसार, इन मिसालों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए गिरफ्तारी पूर्व जमानत अर्जी को खारिज कर दिया गया।

केस शीर्षक: अर्चना मुकेश रावल बनाम गुजरात राज्य

केस नंबर: आर/सीआर.एमए/6233/2020

निर्णय पढ़ने/डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें

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