जेन Z के विरोध-प्रदर्शनों से भरोसा मिला कि भारत में लोकतंत्र खत्म नहीं होगा, 'दिमागी नक्सल' का लेबल उन्हें रोक नहीं पाएगा: एस. मुरलीधर

Shahadat

25 Aug 2026 10:00 AM IST

  • जेन Z के विरोध-प्रदर्शनों से भरोसा मिला कि भारत में लोकतंत्र खत्म नहीं होगा, दिमागी नक्सल का लेबल उन्हें रोक नहीं पाएगा: एस. मुरलीधर

    सीनियर एडवोकेट और हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस डॉ. एस. मुरलीधर ने आज जंतर-मंतर पर हुए हालिया छात्र विरोध-प्रदर्शन की तारीफ़ करते हुए इसे भारतीय लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत बताया। साथ ही, उन्होंने सरकार द्वारा क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम के गलत इस्तेमाल और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को सरकार को अस्थिर करने की कोशिश करने वाले बताने की आलोचना की।

    उन्होंने कहा,

    "जेन-Z के हालिया विरोध-प्रदर्शन हमें भरोसा दिलाते हैं कि भारत में लोकतंत्र को खत्म नहीं होने दिया जाएगा और लोग देश के भविष्य की रक्षा और उसे सुरक्षित रखने के लिए संविधान का सहारा लेंगे। इस साल 20 जुलाई का हफ़्ता राहत और खुशी भरा था। यह जानकर अच्छा लगा कि हमारी युवा पीढ़ी ताकतवर भाषणों, प्रोपेगैंडा और 'अच्छे दिन' व 'विकसित भारत' जैसे खोखले वादों से गुमराह नहीं होगी। 'दिमागी नक्सल' कहकर बदनाम किए जाने के बावजूद वे डरे नहीं। इससे पता चलता है कि इस पीढ़ी के लिए देने की भावना, दया और सच्चाई का साथ देना अहम है। यह पीढ़ी सत्ता में बैठे लोगों से सवाल पूछने में हिचकिचाती नहीं है और हाँ, जेन Z में ह्यूमर की भी ज़बरदस्त समझ है। जेन Z का बेबाक अंदाज़ लोकतांत्रिक तरक्की का पक्का संकेत है।"

    मुरलीधर 'माई विज़न ऑफ़ इंडिया' (भारत के बारे में मेरा नज़रिया) विषय पर 28वें डी.एस. बोरकर मेमोरियल लेक्चर में बोल रहे थे। भारत के बारे में अपने नज़रिए पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि भारत का भला तभी होगा जब कानून सरकार की ईमानदार आलोचना को अपराध न माने।

    एस. मुरलीधर ने आगे कहा,

    "2047 का भारत बेहतर होगा अगर कानून सरकार या उसे चलाने वालों की ईमानदार आलोचना को, या कार्टून या स्टैंड-अप कॉमेडियन के मज़ाक में उनका मज़ाक उड़ाने को अपराध न माने। 2047 का भारत बेहतर होगा अगर आज का भारत बुनियादी अधिकारों से वंचित किए जाने के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध करने वालों के खिलाफ कानून का हथियार की तरह इस्तेमाल करना बंद कर दे और उन्हें सरकार को अस्थिर करने की 'साज़िश' करार देना बंद कर दे।"

    उन्होंने विधायिका के बारे में अपनी सोच भी बताई और प्रिवेंटिव डिटेंशन कानूनों और UAPA और PMLA जैसे सख्त कानूनों को रद्द करने की मांग की, जिनमें 'ट्विन-बेल' शर्तों की वजह से ज़मानत नहीं मिलती है। साथ ही, उन्होंने 2047 में न्यायपालिका कैसी होनी चाहिए, इस पर भी अपनी सोच रखी।

    2047 की न्यायपालिका नोटबंदी या जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल करने जैसे मामलों पर फ़ैसला लेने के लिए सालों तक इंतज़ार नहीं करेगी।

    मुरलीधर ने कहा कि मौजूदा न्यायपालिका के विपरीत, 2047 की न्यायपालिका यह तय करने के लिए 4 साल तक इंतज़ार नहीं करेगी कि किसी राज्य को केंद्र शासित प्रदेश बनाना संवैधानिक रूप से सही है या नहीं। उन्होंने आगे कहा कि उन्हें उम्मीद नहीं है कि भविष्य की न्यायपालिका नोटबंदी या चुनावी बॉन्ड की प्रक्रिया संवैधानिक थी या नहीं, यह तय करने के लिए 6 साल तक इंतज़ार करेगी।

    पूर्व जज ने न्यायिक प्रणाली में खाली पदों, लंबित मामलों और देरी जैसे कई मुद्दों पर बात की। उन्होंने एक स्वतंत्र 'बार' (वकीलों के संगठन) की ज़रूरत पर भी बात की। 'बार' के बारे में अपनी सोच बताते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें एक ऐसे सुधारे हुए BCI की उम्मीद है, जो कामकाज में लोकतांत्रिक हो और कार्यपालिका और न्यायपालिका के दखल से दूर हो।

    उन्होंने प्रधानमंत्री की हालिया घोषणा का भी ज़िक्र किया कि सरकार भारत में पेपर लीक के मामलों और उसके बाद आए 'पब्लिक एग्ज़ामिनेशन्स (प्रिवेंशन ऑफ़ अनफेयर मीन्स) अमेंडमेंट एक्ट, 2026' के तहत समय पर मुक़दमा चलाने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाएगी। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाने से समस्या हल हो जाएगी।

    पूर्व जज ने कहा,

    "प्रधानमंत्री का एक ट्वीट है, जिसमें पेपर लीक के मामलों से निपटने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाने की बात कही गई है। हममें से कई लोग समझते हैं कि इससे कुछ नहीं होने वाला क्योंकि वही मौजूदा जज स्पेशल कोर्ट, फास्ट-ट्रैक कोर्ट या कमर्शियल कोर्ट में नियुक्त कर दिए जाते हैं। यह अलग-अलग टोपियां पहनने जैसा है। अगर आप मेघालय जाएं तो वही जज कमर्शियल कोर्ट, स्पेशल कोर्ट, CBI कोर्ट या MP/MLA मामलों की कोर्ट में होता है। तो, हम इसे बड़े तामझाम के साथ करते हैं, यह सोचकर कि इससे समस्याएँ हल हो जाएँगी, लेकिन इससे न्यायपालिका के लिए समस्याएँ और बढ़ रही हैं।"

    डॉ. मुरलीधर ने कोर्ट और 'बार' के डिजिटाइज़ेशन पर भी बात की। उन्होंने कहा कि हालांकि देश भर की ज़्यादातर कोर्ट ने तरक्की की है, लेकिन वकीलों के बीच डिजिटाइज़ेशन को लेकर अंतर (डिजिटाइज़ेशन डिवाइड) दिखता है। उन्होंने एक घटना का ज़िक्र किया जब दिल्ली हाई कोर्ट के एक जज के सामने रोक (Injunction) का मामला आया; ये जज अपने बहुत धैर्यवान स्वभाव के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने बताया कि जब मामले पर सुनवाई शुरू हुई, तो एक सीनियर वकील ने बहस करना शुरू किया और 20 मिनट तक बोलते रहे। इसके बाद जब वे रुके, तो जज ने उन्हें बताया कि उन्हें तो अभी तक केस की फाइलें ही नहीं मिली थीं।

    इस पर मुरलीधर ने कहा:

    "हमारी अदालतों में रिकॉर्ड्स के अटके रहने की समस्या को आसानी से हल किया जा सकता है अगर हम अपने कोर्ट रिकॉर्ड्स को डिजिटाइज़ करें। इससे केस तेज़ी से आगे बढ़ेंगे।"

    उन्होंने इस बात की भी आलोचना की कि न्यायिक व्यवस्था पूरी तरह से हर चीज़ पर केंद्रित हो गई, सिवाय मुक़दमा लड़ने वाले व्यक्ति के। यह बताते हुए कि न्यायिक प्रक्रिया पूरी तरह से लोकतांत्रिक नहीं रही है, मुरलीधर ने जजों को संबोधित करते समय "योर लॉर्डशिप" जैसे पुराने शब्दों के इस्तेमाल पर भी बात की। उन्होंने इन शब्दों को "पितृसत्ता" और "सामंतवाद" की निशानी बताया।

    एक घटना का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा:

    "प्रोटोकॉल, संबोधन के पुराने तरीकों और खास तरह के शब्दों के इस्तेमाल को लेकर एक तरह का जुनून है। जब जस्टिस एपी शाह मद्रास हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस थे तो उन्होंने चेन्नई से मदुरै तक सड़क मार्ग से यात्रा की। उन्होंने देखा कि हर ज़िले के टोल गेट पर उनका स्वागत करने के लिए ज़िला जज और स्थानीय मजिस्ट्रेट मौजूद थे। उन्होंने पूछा, 'यह क्या हो रहा है? ये लोग कोर्ट में बैठकर उनका इंतज़ार क्यों नहीं कर रहे हैं?' [उन्होंने कहा] यह प्रोटोकॉल है, 'योर लॉर्डशिप' यात्रा कर रहे हैं, इसलिए हमें सम्मान देना होगा। फिर वे एक ज़िले में पहुँचे और घूमते हुए उन्हें एक सर्कुलर मिला, जिसे कोई दराज में रखना भूल गया था, जिसमें लिखा था 'कृपया योर लॉर्डशिप के मनोरंजन फंड में योगदान दें।'"

    उन्होंने सवाल उठाया कि जब कोई जज कोर्ट का दौरा करे तो कोर्ट के कर्मचारियों को योगदान क्यों देना चाहिए।

    साथ ही उन्होंने बिना न्यायिक प्रभाव का आकलन किए कानून में संशोधन करने के लिए कार्यपालिका को भी समान रूप से दोषी ठहराया। उन्होंने 'नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट' में किए गए उस संशोधन का ज़िक्र किया, जिसने चेक बाउंस होने को अपराध बना दिया और मजिस्ट्रेट कोर्ट पर इसके असर की बात की, जहाँ अब लाखों केस पेंडिंग हैं।

    अंत में उन्होंने कहा,

    "'नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट' में 1988 के संशोधन ने, जिसने चेक बाउंस होने को अपराध बना दिया, मजिस्ट्रेट कोर्ट का काम काज बहुत बढ़ा दिया। हमारे पास चेक बाउंस होने के 40 लाख केस हैं, जो कुल पेंडिंग केस का 40% हैं। इसलिए चेक बाउंस होने के अपराध को गैर-आपराधिक बनाना और पुरानी स्थिति बहाल करना एक बहुत ही साफ़ और ज़रूरी कदम है।"

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