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बेटे द्वारा घर से निकालने के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और उनकी पत्नी पहुंचे हाईकोर्ट, कोर्ट ने दिया जिला मजिस्ट्रेट के पास जाने का निर्देश

LiveLaw News Network
17 Oct 2020 8:26 AM GMT
बेटे द्वारा घर से निकालने के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और उनकी पत्नी पहुंचे हाईकोर्ट, कोर्ट ने दिया जिला मजिस्ट्रेट के पास जाने का निर्देश
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गुरुवार को जिला मजिस्ट्रेट, प्रयागराज को निर्देश दिया है कि वह दो महीने के भीतर इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और उनके बेटे के बीच संपत्ति के स्वामित्व/कब्ज़े को लेकर चल रहे विवाद का हल निकालें।

न्यायमूर्ति शशिकांत गुप्ता और न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की खंडपीठ ने मजिस्ट्रेट को यह भी निर्देश दिया है कि एक ''सशब्द और तर्कपूर्ण आदेश'' पारित करें। साथ ही मामले के पक्षकारों को स्वतंत्रता प्रदान की है कि वह आगे के निर्देशों के लिए इस अदालत के समक्ष उस आदेश को रख सकते हैं।

यह आदेश न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) अंजनी कुमार और उनकी पत्नी की तरफ से दायर एक रिट याचिका में आया है, जिसमें आरोप लगाया गया था कि वह विवादित घर के पंजीकृत मालिक थे, हालांकि, उनके बेटे चंदन कुमार ने उन्हें अवैध रूप से बेदखल कर दिया है।

(न्यायमूर्ति कुमार को अप्रैल 2001 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किया गया था और उन्होंने 13 सितंबर, 2008 तक अपनी सेवा दी थी)

वरिष्ठ नागरिक होने के नाते, उन्होंने उत्तर प्रदेश मेन्टेनंस एंड वेल्फेयर ऑफ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटिजन एक्ट 2007 और मेन्टेनंस एंड वेल्फेयर आॅफ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटिजन रूल्स 2014 के तहत सुरक्षा की मांग की थी।

उन्होंने अदालत की सहायता मांगते हुए दलील दी थी कि भले ही विधानमंडल ने वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा के लिए पूर्वोक्त कानून बनाए हैं, लेकिन इन कानूनों के तहत दिए जाने वाले आदेशों को लागू करने के लिए कोई तंत्र उपलब्ध नहीं कराया गया है।

गौरतलब है कि यूपी राज्य ने सितंबर 2012 में एक्ट 2007 को अपनाया था। अधिनियम के तहत, माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों को अपने बच्चों से रखरखाव और सुरक्षा का दावा करने का अधिकार है। अधिनियम की धारा 4 के अनुसार, अपने माता-पिता को बनाए रखने के लिए बच्चों का दायित्व ऐसे माता-पिता या माता या पिता या दोनों की जरूरतों को पूरा करने का है, जैसा कि मामला हो सकता है, ताकि ऐसे माता-पिता एक सामान्य जीवन जी सकें।

इसके अलावा, अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने के लिए, एक उप-विभागीय अधिकारी की अध्यक्षता के तहत तहसील/ सब-डिविजन लेवल पर न्यायाधिकरणों की स्थापना करने के लिए कहा गया है। इसके अलावा, एक्ट के तहत जिला स्तर पर अपीलीय न्यायाधिकरण की स्थापना के लिए भी कहा गया हैै, जिसकी अध्यक्षता जिला मजिस्ट्रेट के रैंक के अधिकारी द्वारा की जाएगी।

हालांकि अदालत को सूचित किया गया कि अधिनियम को लागू करने के लिए अभी तक कोई प्राधिकरण स्थापित नहीं किया गया है, इसलिए कोर्ट ने आदेश दिया है कि-

''जिला मजिस्ट्रेट मामले पर विचार करें और याचिकाकर्ताओं व प्रतिवादी संख्या 5 का पक्ष सुनने के बाद कानून के अनुसार इस आवेदन का निपटारा करें। ऐसा करते समय एक सशब्द और तर्कपूर्ण आदेश दिया जाए,जिसमें पक्षकारों द्वारा उठाए गए सभी मुद्दों को ध्यान में रखा जाए। वहीं इस मामले में आवेदन/याचिका दायर होने के दो माह के भीतर उसे निपटा दिया जा। यदि याचिकाकर्ता जिला मजिस्ट्रेट के आदेश से क्षुब्ध महसूस करते हैं, तो उनको इस बात की स्वतत्रंता है कि वह उस अदालत के आदेश की काॅपी इस कोर्ट के समक्ष रख सकते हैं ताकि यह कोर्ट उस पर विचार कर सकें और आगे के आदेश दे सकें।''

विशेष रूप से, न्यायालय ने कोई अंतरिम राहत प्रदान नहीं की है। यह मामला अब 8 फरवरी, 2021 को आदेशों के लिए सूचीबद्ध किया गया है।

केस का विवरण-

केस का शीर्षक- जस्टिस अंजनी कुमार एव अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य।

प्रतिनिधित्व-वकील तरुण अग्रवाल (याचिकाकर्ताओं के लिए), वरिष्ठ अधिवक्ता अनूप त्रिवेदी साथ में एडवोकेट अंकुश टंडन (प्रतिवादी के लिए)

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