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कानूनी शिक्षा के मौजूदा और प्रस्तावित केंद्रों को बार काउंसिल ऑफ इंडिया से 'नियमित स्वीकृति' प्राप्त करनी होगी: बॉम्बे हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
10 April 2020 3:01 PM GMT
कानूनी शिक्षा के मौजूदा और प्रस्तावित केंद्रों को बार काउंसिल ऑफ इंडिया से नियमित स्वीकृति प्राप्त करनी होगी: बॉम्बे हाईकोर्ट
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने कानूनी शिक्षा नियम, 2008 के नियम 2 (xxiv) को बरकरार रखा है, जिसके तहत कानूनी शिक्षा के केंद्रों को बार काउंसिल ऑफ इंडिया की स्वीकृति के बिना शिक्षा प्रदान करने पर रोक थी।

जस्टिस अमित बोरकर और एएस चंदुरकर की पीठ ने कहा कि जब तक कानूनी ‌शिक्षा का कोई केंद्र 2008 के नियमों के तहत नियमित मंजूरी नहीं पाता, बावजूद इसके कि वह पहले ही स्‍थायी मंजूरी पा चुका था, तब तक, 2009-10 के बाद से वह केंद्र न किसी छात्र का दाखिला नहीं ले सकता और न शिक्षा प्रदान कर सकता है।

डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर कॉलेज ऑफ लॉ और राष्ट्र संत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय ने बॉम्‍बे हाईकोर्ट में नियम 2 (xxiv)को चुनौती दी थी, जिसके तहत "नियमित अनुमोदन" को परिभाषित किया गया है। नियम 2 (xxiv) की परिभाषा के अनुसार, "नियमित अनुमोदन" का अर्थ है, 2008 के नियमों के प्रभाव में आने से पहले किसी कानूनी शिक्षा के केंद्र को दी गई पुरानी मंजूरी समेत ऐसी मंजूरी जो 5 साल से अध‌िक अवधि के ‌‌लिए न हो।

याचिका में यह घो‌षणा किए जाने की भी मांग की गई थी कि लॉ कॉलेज को बार काउंसिल ऑफ इंडिया से नई मंजूरी लेने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उन्हें पहले ही स्थायी मंजूरी दे दी गई थी।

अधिवक्ता अधिनियम और बीसीआई नियमों का उल्लेख करते हुए, कोर्ट ने कहा कि कानूनी शिक्षा को बढ़ावा देना बार काउंसिल ऑफ इंडिया का कार्य है। कानूनी शिक्षा प्रदान करने वाले भारत के विश्वविद्यालयों ओर स्टेट बार काउंसिल ऑफ इंडिया के साथ परामर्श करके ऐसी शिक्षा के मानक तय करना भी बार काउंसिल ऑफ ‌इंडिया का काम है। साथ ही उन विश्वविद्यालयों को भी मान्यता देना भी बार काउंसिल ऑफ ‌इंडिया का ही कार्य है, जिनकी डिग्री लेकर एक व्य‌क्ति एडवोकेट के रूप में नामांकित होने की योग्यता रखता है।

"बार काउंसिल ऑफ इंडिया को कानूनी शिक्षा को बढ़ावा देने और ऐसी शिक्षा के मानकों को तय करने के साथ, विश्वविद्यालयों द्वारा दी जाने वाली कानूनी शिक्षा के मानकों को तय करने और नियमों को निर्धारित करने आवश्यक शक्ति प्रदान की गई है। इसमें विश्वविद्यालयों में कानूनी शिक्षा के मानकों को बनाए रखने और सुधार करने के लिए मौजूदा नियमों को संशोधित करने की शक्ति भी शामिल है।"

श‌िक्षा केंद्रों द्वारा नए सिरे से अनुमोदन प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं होने की घोषणा की प्रार्थना को खारिज करते हुए, बेंच ने कहा:

2008 के नियमों के नियम 2 (xxiv) में "नियमित अनुमोदन" परिभाषित किया गया है, जिसका अर्थ है कि ऐसा अनुमोदन जो पांच साल से अधिक समय के लिए नहीं हो, और 2008 के नियमों के प्रभावी होने से पहले दी गई स्थायी स्वीकृति। 2008 के नियमों के तहत नियमित अनुमोदन के अनुदान में नए विश्वविद्यालय या कानूनी शिक्षा के किसी भी संबद्ध केंद्र का नियमित निरीक्षण सन्न‌िहित है। यह बार काउंसिल ऑफ इंडिया से मान्यता प्राप्त करने का आधार भी है।

2008 के नियमों से पहले के स्थायी अनुमोदन को अब नियमित अनुमोदन माना जाता है, जो कि आवश्यक अनुपालन के अधीन पांच साल की अवधि के लिए संचालित होता है। इस प्रकार पहले दी गई स्वीकृति मौजूदा अधिकार होगी, निहित अधिकार नहीं। ...2008 के नियमों के लागू होने से पहले दी गई स्थायी मंजूरी को छोड़कर नियमित मंजूरी के प्रावधान की व्याख्या करने की कोई गुंजाइश नहीं है।

प्रतिनिध‌ित्वः याचिकाकर्ताओं के ‌लिए वकील श्री एम.जी. भंगड़े, वरिष्ठ अधिवक्ता श्री पीबी पाटिल। श्री जे.वाई घुरडे, सहायक सरकारी वकील, प्रतिवादी नंबर 1 के ‌‌लिए। श्री ए.एस. जायसवाल, वरिष्ठ अधिवक्ता, श्री के.आर. नरवड़े, प्रतिवादी नंबर 2 के लिए वकील।

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