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राज्य में शिक्षा को व्यवसाय के रूप में ले लिया गया है या डिग्री बेचने के उद्योग के रूप मेंः इलाहाबाद हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
25 Jan 2021 6:18 AM GMT
राज्य में शिक्षा को व्यवसाय के रूप में ले लिया गया है या डिग्री बेचने के उद्योग के रूप मेंः इलाहाबाद हाईकोर्ट
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार (19 जनवरी) को कहा कि,''यह अज्ञात नहीं है कि राज्य में शिक्षा को व्यवसाय या उद्योग के रूप में ले लिया गया है। यह डिग्री बेचने का व्यवसाय है। इसे रोकने की आवश्यकता है।''

न्यायमूर्ति मुनीश्वर नाथ भंडारी और न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल की खंडपीठ ने बी.एड में 25 सीटों को भरने के लिए अपीलकर्ताओं/याचिकाकर्ताओं की संस्था द्वारा उठाए गए कदम पर नाराजगी दिखाते हुए यह टिप्पणी की। इन सभी सीटों को सीधे तौर पर भर दिया गया था,जबकि केंद्रीकृत काउंसलिंग के जरिए इन सभी सीटों के लिए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के 25 उम्मीदवारों के नामों की सिफारिश की गई थी।

न्यायालय के समक्ष मामला

अपील के माध्यम से, 08 दिसंबर 2020 के निर्णय को चुनौती दी गई थी। इस निर्णय के तहत अपीलकर्ताओं/याचिकाकर्ताओं (शिक्षा संस्थानों) की तरफ से दायर की गई रिट याचिका को खारिज कर दिया गया था।

अपीलकर्ताओं/ याचिकाकर्ताओं ने प्रस्तुत किया था कि उन्हें सुनवाई का अवसर दिए बिना, गैर-अपीलकर्ताओं/ प्रतिवादियों द्वारा किए गए तर्क पर विचार करते हुए रिट याचिका पर निर्णय ले लिया गया था।

इस प्रकार, न्यायालय के समक्ष यह तर्क दिया गया था कि एकल न्यायाधीश द्वारा पारित किए गए निर्णय को पूर्वोक्त आधार पर रद्द कर दिया जाना चाहिए।

केस के तथ्य

बी.एड कोर्स में प्रवेश के लिए केंद्रीकृत काउंसलिंग में पच्चीस अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों/ छात्रों के नाम की सिफारिश की गई थी।

हालांकि, उन उम्मीदवारों/ छात्रों में से किसी को भी प्रवेश नहीं दिया गया, बल्कि अपीलकर्ताओं/ याचिकाकर्ताओं के संस्थान ने खाली सीटों को सीधे भर दिया। संस्थान ने तर्क दिया कि जब कोई भी छात्र प्रवेश के लिए इच्छुक नहीं था तो अपीलकर्ताओं/याचिकाकर्ताओं के संस्थान ने नियमों के अनुसार रिक्त सीटों को भर दिया।

यह भी तर्क दिया गया था कि नियम ऐसी स्थिति में सीधे प्रवेश की अनुमति देते हैं, जब उम्मीदवार प्रवेश लेने में विफल हो जाते हैं और इसप्रकार संस्थान द्वारा पच्चीस अन्य उम्मीदवारों/छात्रों के इन सीटों पर सीधे प्रवेश देने की कार्रवाई में कोई अवैधता नहीं थी।

अपनी कार्रवाई को सही ठहराने के लिए, एक दलील दी गई थी कि केंद्रीकृत काउंसलिंग में प्रवेश के लिए जिन उम्मीदवारों के नाम की सिफारिश की गई थी,उनमें से कोई भी प्रवेश लेने के लिए इच्छुक नहीं था और इसके लिए कुछ उम्मीदवारों के हलफनामे की एक प्रति संलग्न की गई थी।

न्यायालय का अवलोकन

अदालत ने हलफनामों (कथित रूप से इनको 25 एससी/ एसटी छात्रों में से कुछ ने दायर किया था)को देखा और उन्हें चक्रलिखित तरीके का पाया।

महत्वपूर्ण रूप से, न्यायालय ने देखा,

''यह केवल तभी हो सकता है जब हलफनामों को किसी ने इनको बनाने में रुचि रखते हुए तैयार किया हो। इस मामले में अपीलकर्ता/ याचिकाकर्ताओं की संस्था खुद इनको बनाने के लिए इच्छुक थी अन्यथा जब कोई व्यक्ति अपनी भाषा में शपथ पत्र देता है तो उसका एक-एक शब्द दूसरे हलफनामों जैसा नहीं हो सकता है।''

न्यायालय ने आगे कहा,

''अपीलकर्ता/याचिकाकर्ताओं की संस्था द्वारा एक ही भाषा वाले हलफनामे प्राप्त किए गए थे,लेकिन अगर इन हलफनामों को अलग-अलग तारीखों पर अलग-अलग उम्मीदवारों द्वारा दिया गया था,तो ऐसा नहीं हो सकता है। एक ही भाषा वाले हलफनामों को अपीलकर्ताओं/ याचिकाकर्ताओं के संस्थान के निर्देश पर तैयार किया गया था और ऐसा लगता है कि ऑनलाइन भुगतान की गई राशि का रिफंड देने के लिए इनको तैयार किया गया है।''

न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि प्रवेश के लिए पच्चीस उम्मीदवारों/ छात्रों के नाम की सिफारिश की गई थी। ऐसा नहीं हो सकता है कि इनमें से किसी ने भी प्रवेश न लिया हो।

कोर्ट ने कहा कि,

''यह एक असाधारण स्थिति होगी जब प्रवेश के लिए केंद्रीकृत परामर्श द्वारा अनुशंसित उम्मीदवारों में से कोई भी प्रवेश लेने से इनकार करेगा, जबकि हर किसी को शिक्षक के पद पर नियुक्ति के लिए बी.एड. कोर्स करने की बहुत ज्यादा आवश्यकता है।''

तथ्यों को समग्रता को देखते हुए, न्यायालय को एकल न्यायाधीश के फैसले में कोई अवैधता नहीं मिली क्योंकि यह एक एक्ट-पार्टी आदेश नहीं था, बल्कि अपीलकर्ता/ याचिकाकर्ताओं की तरफ से दायर याचिका पर सुनवाई के समय उनकी उपस्थिति के समय उठाए गए मुद्दे पर चर्चा करने के बाद दिया गया था।

इस प्रकार, 8 दिसम्बर 2020 को दिए गए फैसले को चुनौती देने वाली अपील विफल रही और खारिज कर दी गई।

अंत में, अदालत ने कहा कि वह उचित कार्रवाई के लिए इस मामले को राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एन.सी.टी.ई) को भेजने के लिए इच्छुक थी (उनके आचरण को देखते हुए संस्था की मान्यता समाप्त करने सहित), लेकिन इस अपील में व याचिका में एन.सी.टी.ई एक पक्षकार नहीं थी,इस कारण से अदालत ने सू-मोटो संज्ञान लेने से अपने आप को रोक लिया, लेकिन संस्था को चेतावनी दी है कि वह इस तरह की प्रैक्टिस में लिप्त न रहें।

गैर-अपीलीय विश्वविद्यालय को हालांकि यह लिबर्टी दी गई है कि यदि अपीलकर्ताओं/याचिकाकर्ताओं की संस्था भविष्य में इसी तरह की प्रैक्टिस में लिप्त पाई जाए तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है और उस बारे में एन.सी.टी.ई. को भी सूचित किया जाए ताकि आवश्यक कार्यवाही की जा सकें।

केस का शीर्षक - साईं कॉलेज ऑफ एजुकेशन व अन्य बनाम यू.पी राज्य व तीन अन्य [Special Appeal Defective No. - 39 of 2021]

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