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"ऐसी घटनाओं के कारण श्रद्धा और विश्वास घट रहा है": इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने नाबालिग से बलात्कार के आरोपी साधु को जमानत देने से इनकार किया

LiveLaw News Network
2 Sep 2021 11:48 AM GMT
ऐसी घटनाओं के कारण श्रद्धा और विश्वास घट रहा है: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने नाबालिग से बलात्कार के आरोपी साधु को जमानत देने से इनकार किया
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इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पिछले सप्ताह एक नाबालिग से रेप के आरोपी एक बाबा को जमानत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने नोट किया कि बाबा पीड़िता के पिता को जानता था और उसके घर अक्सर आता-जाता रहता था।

जस्टिस संजय कुमार सिंह की खंडपीठ ने कहा, " इस मामले में एक असहाय लड़की को आरोपी ने कुचल दिया। यौन उत्पीड़न का कृत्य किसी भी लड़की के मन में, समाज में उसकी सामाजिक स्थिति जैसी भी हो, आघात और आतंक पैदा करता है ... वास्तव में, यह अपराध न केवल के पीड़िता के खिलाफ है, बल्‍कि यह पूरे समाज के खिलाफ है। यह न्यायालय से उचित निर्णय की मांग करता है और ऐसी मांग के लिए न्यायालय कानूनी मानकों के भीतर जवाब देने के लिए बाध्य हैं।"

तथ्य

अभियोजन पक्ष के मामले के अनुसार, एक अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ IPC की धारा 363 के तहत FIR दर्ज की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि एक जून 2019 को सुबह लगभग 4.00 बजे उसकी नाबालिग बेटी नित्य क्रिया के लिए गई थी, लेकिन लौट कर घर नहीं आई।

पीड़िता को एक माह बाद जामनगर पुलिस की मदद से जामनगर से आवेदक (भूतनाथ उर्फ ​​रामदास उर्फ ​​बाबाजी) के कब्जे से बरामद किया गया।

आवेदक को 2 जुलाई, 2019 को गिरफ्तार किया गया, और ट्रांजिट रिमांड प्राप्त करने के बाद उसे 5 जुलाई, 2019 को जिला फतेहपुर, उत्तर प्रदेश की अदालत में पेश किया गया। धारा 161 और 164 CrPC के तहत पीड़िता ने अपने बयान में कहा कि आवेदक ने उसे जबरन फुसलाया था। उसने आवेदक के खिलाफ बलात्कार का भी आरोप लगाया।

उसने CrPC की धारा 161 के तहत अपने बयान में यह भी कहा कि आवेदक उसे कुछ दवाएं देता था, जिससे वह सो जाती थी। पीड़िता का यह भी आरोप था कि आरोपी ने उसे डंडे और चिमटे से मारा भी। इसके बाद जांच अधिकारी ने POCSO एक्ट की धारा 3/4 और IPC की धारा 376, 323 को जोड़ा गया।

अभियोजन पक्ष ने दलील दिया कि आवेदक पीड़िता के परिवार के सदस्यों से अच्छी तरह परिचित था और वह एक साधु है और उससे एक लड़की के साथ इस तरह के जघन्य अपराध को अंजाम देने की उम्मीद नहीं थी, जो उस पर श्रद्धा और विश्वास रखती थी।

दूसरी ओर, आवेदक के वकील ने प्रस्तुत किया कि पीड़िता की चिकित्सा जांच रिपोर्ट के अनुसार, वह लगभग 18 वर्ष की है और पीड़िता ने आवेदक के साथ अवैध संबंध बनाए थे और उसने यह सहमत‌ि से किया था।

न्यायालय की टिप्पणियां

अदालत ने कहा कि पोक्सो अधिनियम की धारा 2(1)(डी) के अनुसार, "बच्चे" का अर्थ अठारह वर्ष से कम आयु का कोई भी व्यक्ति है, और इस मामले में अपहरण और बलात्कार के जघन्य अपराध किए गए हैं। आरोपी लगभग 50 वर्ष की उम्र का बाबा है और पीड़ित के पिता को जानता था और उसके घर आता-जाता था, उसे इसके परिणाम भुगतने होंगा ।

" इस तरह की घटनाओं के कारण व्यक्ति में श्रद्धा और विश्वास कम हो रहा है। एक बलात्कारी न केवल पीड़ित की व्यक्तिगत अखंडता का उल्लंघन करता है बल्कि असहाय लड़की की आत्मा पर अमिट छाप छोड़ता है। इस मामले में, आरोपी ने एक असहाय लड़की को तबाह कर दिया है।"

इस दलील के जवाब में कि वह सहमति थी, कोर्ट ने कहा, "एक बच्चा/लड़की, जो यौन उत्पीड़न की शिकार है, अपराध की सहभागी नहीं है, बल्कि किसी अन्य व्यक्ति की वासना की शिकार है और इसलिए, उसके बयान को इस स्तर पर उसी संदेह के साथ परीक्षण करने की आवश्यकता नहीं है जैसे कि एक साथी के बयान का किया जाता है..।"

अंत में, मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करते हुए अदालत ने आरोपी बाबा को जमानत देने से इनकार कर दिया।

उल्लेखनीय है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में इस बात पर जोर देते हुए कि भारत कन्याओं की पूजा करता है, फिर भी देश में पीडोफिलिया के मामले बढ़ रहे हैं एक ऐसे व्यक्ति को जमानत देने से इनकार कर दिया था जिस पर 13 वर्षीय लड़की के साथ बलात्कार का मामला दर्ज किया गया था।

महत्वपूर्ण रूप से, जस्टिस संजय कुमार सिंह की खंडपीठ ने कहा- "ऐसी स्थिति में, अगर न्यायालय सही समय पर सही फैसला नहीं लेता है तो पीड़ित/आम आदमी का विश्वास न्याय व्यवस्था में उठ जाता है।"

केस शीर्षक - भूतनाथ बनाम यूपी राज्य और अन्य

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