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चेक बाउंस का मामलाः विशेष आरोपों का उल्लेख किया जाए, यह आरोप पर्याप्त नहीं कि अभियुक्त कंपनी का सीईओ या निदेशक थाः दिल्ली हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
30 Nov 2020 2:34 PM GMT
चेक बाउंस का मामलाः विशेष आरोपों का उल्लेख किया जाए, यह आरोप पर्याप्त नहीं कि अभियुक्त कंपनी का सीईओ या निदेशक थाः दिल्ली हाईकोर्ट
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दिल्ली हाईकोर्ट ने चेक बाउंस के एक मामले में एक कंपनी की पूर्व सीईओ के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने माना कि पूर्व सीईओ के खिलाफ न तो लेनदेन के मामले में और न ही कंपनी के बिजनेस में उसकी कथित भूमिका के बारे में कोई विशेष आरोप लगाए गए है। ऐसे में उसके खिलाफ चेक बाउंस के मामले में दायर शिकायत खारिज करने योग्य है।

न्यायमूर्ति ज्योति सिंह की एकल पीठ ने कहा कि यह कानून है कि किसी कंपनी में एक अधिकारी का पदनाम ही केवल उस अधिकारी को निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट (एनआई अधिनियम) की धारा 138 के तहत किसी मामले में उत्तरदायी बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है।

पीठ ने कहा, ''मेरे विचार में,याचिकाकर्ता की विशिष्ट भूमिका के संबंध में आरोपों की अनुपस्थिति, शिकायतकर्ता के मामले के लिए घातक है।''

पीठ ने इस तथ्य पर भी भरोसा किया कि विचाराधीन चेक जारी होने से पहले ही याचिकाकर्ता ने कंपनी से इस्तीफा दे दिया था, और कहीं भी यह आरोप नहीं लगाया गया है कि कंपनी से इस्तीफा देने के बाद भी याचिकाकर्ता किसी भी रूप में कंपनी के साथ जुड़ी हुई थी या ऐसी किसी ऐसे पद पर थी कि जो उसे उसके व्यवसाय के संचालन के लिए या चेक के नकदीकरण के लिए निर्देश जारी करने के लिए जिम्मेदार ठहराता हो।

उपरोक्त सभी की अनुपस्थिति में, अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता कंपनी की सीईओ थी,केवल इस आधार पर उस पर प्रतिनिधिक दायित्व ड़ाल दिए गए थे। इसलिए उसके खिलाफ दायर शिकायत खारिज किए जाने योग्य है। न्यायालय ने एस.एम.एस फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड बनाम नीता भल्ला व अन्य (2005) 8 एससीसी 89 और सुदीप जैन बनाम मैसर्स ईसीई इंडस्ट्रीज लिमिटेड 2013 एससीसी ऑनलाइन डीईएल 1804 के मामलों में की गई टिप्पणियों पर भरोसा जताया।

वर्तमान मामले के संक्षिप्त तथ्य यह थे कि आर्यन इन्फ्राटेक प्राइवेट लिमिटेड ने एक मेसर्स रिंगिंग बेल्स प्राइवेट लिमिटेड व याचिकाकर्ता सहित पांच अन्य के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी,जो एनआई अधिनियम की धारा 138/141/142 के तहत की गई थी।

शिकायत में आरोप लगाया गया था कि कानूनी देयता के निर्वहन में, रिंगिंग बेल्स ने दो करोड़ रुपये की राशि का एक चेक जारी किया था। जिस पर एक अन्य आरोपी के हस्ताक्षर थे और यह चेक याचिकाकर्ता सहित अन्य सह-अभियुक्तों की सहमति और जानकारी के तहत जारी किया गया था। चेक को प्रस्तुतिकरण पर उसे अस्वीकृत कर दिया गया था और मांग का कानूनी नोटिस भेजने के बावजूद भी आरोपी व्यक्ति कथित बकाया राशि को भेजने में विफल रहे थे।

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