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'बलात्कार पीड़िता की गरिमा को बरकरार रखा जाना चाहिए, जिरह में निंदनीय प्रश्नों को रोकना जज का कर्तव्य': बॉम्बे हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
1 Oct 2021 6:40 AM GMT
बलात्कार पीड़िता की गरिमा को बरकरार रखा जाना चाहिए, जिरह में निंदनीय प्रश्नों को रोकना जज का कर्तव्य: बॉम्बे हाईकोर्ट
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने निचली अदालतों को चेतावनी दी है कि वे यह सुनिश्चित करें कि बलात्कार पीड़िता की गरिमा की रक्षा की जाए और जिरह के दरमियान पूछताछ का मकसद पीड़िता का अपमान करना या उसे परेशान करना न हो। जस्टिस साधना जाधव और जस्टिस सारंग कोतवाल की पीठ ने निचली अदालतों को भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 148, 151 और 152 का इस्तेमाल करने की ताकीद की है। साथ ही कहा है कि अदालतें जिरह की ऐसी द‌िशा को रोक दें। पीठ ने पीड़िता को भी याद दिलाया है कि उसे बचाव पक्ष के वकीलों के प्रश्नों के जवाब देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है।

जिरह के दरमियान पीड़िता के साथ हुई वारदात की चित्रात्मक पूछताछ और उस पर ट्रायल जज के "निष्क्रिय दृष्टिकोण" का उल्लेख करते हुए पीठ ने अपने फैसले में कहा, "हम गवाह को दिए इन सभी सुझावों का पुरजोर विरोध करते हैं। इन सवालों की अनुमति देने में विद्वान जज द्वारा अपनाए गए निष्क्रिय दृष्टिकोण के कारण हमें अधिक पीड़ा हुई है। इन सुझावों ने बुनियादी गरिमा की सभी सीमाओं को पार कर दिया। सुझाव देने की आड़ में, कृत्या की गवाह के समक्ष चित्रात्मक विवरण रखे गए थे। यह पूरी तरह से अनुचित था। विद्वान जज ने दर्ज किया है कि उस समय गवाह सिसक रही थी। विद्वान जज को हस्तक्षेप करना चाहिए था और जिरह की इस पंक्ति को रोकना चाहिए ‌था।"

अदालत ने 25 वर्षीय विवाहिता से सामूहिक बलात्कार के एक मामले में पुणे की सत्र अदालत द्वारा आजीवन कारावास की सजा पाए तीन दोषियों की अपील को खारिज करते हुए ये टिप्पणियां कीं। मामले के अनुसार, अप्रैल 2010 में पीड़िता ने पुणे के आईटी पार्क के हिंजेवाड़ी से दो आरोपियों से यह सोचकर लिफ्ट ली थी कि यह एक साझा टैक्सी है। तीसरा आरोपी बाद में दोनों के साथ शामिल हो गया और पीड़िता को अंततः एक सुनसान जगह पर ले जाया गया और तीनों ने सामूहिक बलात्कार किया।

हाईकोर्ट की खंडपीठ ने ट्रायल जज की ट्रायल आयोजित करने के तरीके पर सराहना की, हालांकि वह पीड़िता से जिरह करते समय बचाव पक्ष को दी गई स्वतंत्रता से सहमत नहीं था।

पीठ ने कहा,

"यह सच है कि आरोपी को अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए जिरह करने का अधिकार है, लेकिन इन सुझावों को किसी भी तरह उचित जिरह नहीं कहा जा सकता है। यहां तक ​​कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 152 के तहत, अदालत किसी भी प्रश्न को मना करने के लिए कर्तव्यबद्ध है, अगर उसे लगता है कि प्रश्न पीड़िता को अपमानित करने या नाराज करने के इरादे से पूछा गया प्रतीत होता है या जो प्रश्न अपने आप में ठीक लगे लेकिन अदालत को अनावश्यक रूप से आक्रामक प्रतीत हो।"

पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 151 ( अश्लील और निंदनीय प्रश्न ) भी लागू कर सकती है , जो न्यायालय को किसी भी प्रश्न या पूछताछ को रोकने का अधिकार देता है, जिसे वह अशोभनीय या निंदनीय मानता है।

अदालत ने कहा,

"विद्वान ट्रायल जज पीडब्ल्यू -1 की गरिमा की रक्षा करने और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 151 और 152 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करने में विफल रहे।"

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 148 (न्यायालय को यह तय करना है कि कब सवाल पूछा जाएगा और कब गवाह को जवाब देने के लिए मजबूर किया जाएगा) पर पीठ ने कहा कि ट्रायल जज द्वारा धारा का इस्तेमाल यह तय करने के लिए किया जा सकता था कि क्या पीड़िता को सवालों के जवाब देने के लिए मजबूर किया जा सकता है। यह देखते हुए कि पीड़िता से पूछे गए प्रश्न बुनियादी गरिमा का उल्लंघन हैं, पीठ ने कहा, "अदालत से अपेक्षा की जाती है कि वह गवाह को सचेत कर दे कि यदि इस प्रकार के प्रश्न अनुचित हैं और यदि गवाह के चरित्र के खिलाफ लगाए गए आरोप के महत्व और उसके साक्ष्य के महत्व के बीच बहुत अधिक अनुपात नहीं है तो वह जवाब देने के लिए बाध्य नहीं है।"

आरोपी की सजा के मसले पर पीठ ने पुरुषोत्तम दशरथ बोराटे और एक अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य (2015 Cri.L.J. 2862) के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा किया, जहां अदालत ने कहा था कि महिलाओं के खिलाफ हाल के वर्षों में हिंसक अपराधों में वृद्धि हुई है, इसलिए न्यायालयों द्वारा अपनाई गई सजा नीति, ऐसे मामलों में एक कठोर मानदंड होना चाहिए ताकि एक निवारक के रूप में कार्य किया जा सके। बॉम्बे हाईकोर्ट की बेंच ने तीन दोषियों की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी।

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