दिल्ली दंगों में पुलिसकर्मी पर बंदूक तानने वाले शाहरुख पठान को जमानत से इनकार

Amir Ahmad

13 March 2026 12:46 PM IST

  • दिल्ली दंगों में पुलिसकर्मी पर बंदूक तानने वाले शाहरुख पठान को जमानत से इनकार

    उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के दौरान एक पुलिसकर्मी पर बंदूक तानने के आरोपी शाहरुख पठान को दिल्ली कोर्ट ने जमानत देने से इनकार किया। अदालत ने कहा कि पहले भी हाइकोर्ट इस मामले में जमानत देने से मना कर चुका है और परिस्थितियों में कोई ऐसा बदलाव नहीं आया है जिससे अब राहत दी जा सके।

    कड़कड़डूमा अदालत के एडिशनल सेशन जज समीर बाजपेई ने यह आदेश देते हुए शाहरुख पठान की नियमित जमानत याचिका खारिज की। यह मामला जाफराबाद थाना में दर्ज वर्ष 2020 की FIR नंबर 51 से जुड़ा है।

    अदालत ने अपने आदेश में कहा,

    “जब माननीय हाइकोर्ट 22 अक्टूबर, 2024 के आदेश में आरोपी को जमानत देने से इनकार कर चुका है और परिस्थितियों में कोई बदलाव नहीं आया है केवल इतना कि लगभग डेढ़ वर्ष का समय बीत गया तो इस अदालत के लिए भी जमानत देना उचित नहीं होगा।”

    यह मामला उस घटना से जुड़ा है, जिसमें वर्ष 2020 के दंगों के दौरान शाहरुख पठान को एक पुलिसकर्मी की ओर बंदूक तानते हुए देखा गया था। इस घटना की तस्वीरें उस समय सामाजिक माध्यमों पर तेजी से फैल गई थीं।

    शाहरुख पठान की ओर से अदालत में कहा गया कि वह मार्च, 2020 से न्यायिक हिरासत में है और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 307 के तहत अधिकतम सजा के आधे से अधिक समय जेल में बिता चुका है। इसी आधार पर दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 436ए के सिद्धांत का हवाला देते हुए जमानत देने की मांग की गई।

    हालांकि, अभियोजन पक्ष ने जमानत का विरोध करते हुए बताया कि यह आरोपी की 11वीं जमानत याचिका है। इससे पहले ट्रायल कोर्ट तथा दिल्ली हाइकोर्ट दोनों ही उसकी याचिकाएं खारिज कर चुके हैं। अभियोजन ने यह भी कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 479(2) के अनुसार यदि आरोपी किसी अन्य मामले में भी मुकदमे का सामना कर रहा हो तो अधिकतम सजा के आधे समय के आधार पर रिहाई का लाभ नहीं दिया जा सकता।

    अदालत ने अपने आदेश में कहा कि नई आपराधिक प्रक्रिया व्यवस्था लागू होने के बाद जमानत की मांग का परीक्षण BNSS की धारा 479 के तहत ही किया जाएगा और पुराने प्रावधान का लाभ पूर्व प्रभाव से नहीं लिया जा सकता।

    जस्टिस बाजपेई ने यह भी कहा कि यद्यपि आरोपी अधिकतम सजा के आधे से अधिक समय हिरासत में बिता चुका है लेकिन दिल्ली दंगों से जुड़े एक अन्य मामले में भी उसका मुकदमा चल रहा है, इसलिए वह धारा 479 के तहत जमानत पाने का पात्र नहीं है।

    अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि हाइकोर्ट पहले ही दो बार उसकी जमानत याचिका खारिज कर चुका है और अक्टूबर, 2024 के बाद से परिस्थितियों में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं आया है। साथ ही यह भी कहा गया कि मुकदमे में हुई देरी के लिए केवल अभियोजन को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता कई बार कार्यवाही में देरी स्वयं आरोपी के आचरण के कारण भी हुई।

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