Delhi Riots: 'बड़ी साज़िश' मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम की ज़मानत याचिकाओं पर कोर्ट ने फ़ैसला सुरक्षित रखा
Shahadat
4 July 2026 3:30 PM IST

दिल्ली कोर्ट ने शनिवार (4 जुलाई) को UAPA के तहत दर्ज 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों में 'बड़ी साज़िश' के मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम की ज़मानत याचिकाओं पर अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया।
कड़कड़डूमा कोर्ट के एडिशनल सेशंस जज समीर बाजपेयी ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा,
"मैं आज ही आदेश देने की कोशिश करूंगा। अगर आज नहीं हो पाया तो सोमवार को आदेश दिया जाएगा।"
खालिद की ओर से पेश हुए सीनियर वकील त्रिदीप पेस ने मौजूदा ज़मानत याचिका तक की घटनाओं का ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने खालिद को ज़मानत देने से इनकार करते हुए कहा था कि उमर और शरजील एक साल तक ज़मानत के लिए अर्ज़ी नहीं दे सकते, लेकिन इस बीच सुरक्षित गवाहों (प्रोटेक्टेड विटनेस) से पूछताछ की जानी चाहिए।
उन्होंने कहा,
"अगर पूछताछ नहीं होती है, तो जो भी पहले हो - या तो एक साल बीत जाए तो आप (ज़मानत के लिए) अर्ज़ी दे सकते हैं या फिर गवाहों से पूछताछ हो जाए... आप बिना ज़मानत के सालों तक जेल में रह सकते हैं; कोर्ट जब तय करता है कि आप काफ़ी अहम हैं, तभी आपको ज़मानत मिलती है, वरना नहीं।"
इसके बाद उन्होंने तस्लीम अहमद और खालिद सैफ़ी को छह महीने की अंतरिम ज़मानत देने वाले सुप्रीम कोर्ट के आदेश का ज़िक्र किया। साथ ही उन्होंने UAPA ज़मानत मामलों में फ़ैसलों के बीच 'दिखने वाले टकराव' (जब ट्रायल में देरी हो रही हो) के मुद्दे को एक बड़ी बेंच के पास भेजने का भी हवाला दिया।
तस्लीम अहमद मामले के फ़ैसले को पढ़ते हुए पेस ने कहा,
"ट्रायल के तुरंत पूरा होने की संभावना नहीं है। ये मेरे शब्द नहीं हैं।"
उन्होंने कहा कि बयानों के अलावा उमर के ख़िलाफ़ कोई आरोप नहीं है।
उन्होंने कहा,
"इनसे न तो पैसे या हथियार या किसी और चीज़ की बरामदगी हुई है। बयानों के अलावा मेरे ख़िलाफ़ कुछ भी नहीं है।"
उन्होंने कहा कि तस्लीम अहमद के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जो किया, उस पर हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच ने UAPA अपील के मामले में ध्यान दिया, जिसमें युद्ध छेड़ने और आतंकवाद के लिए पैसे इकट्ठा करने का आरोप है।
पैस ने ज़ोर देकर कहा,
"मैं लगातार कस्टडी में हूँ। SLP के लिए अर्ज़ी देने के दौरान भी मैं कस्टडी में ही था। कानून के तहत हालात बदले हैं, और आपने वे आदेश देखे हैं। अगर मुझे मेरिट्स पर अपनी बात रखनी हो, तो मैं तैयार हूँ। लेकिन संक्षेप में बात यह है कि कोई रिकवरी नहीं हुई है, किसी खोज तक ले जाने वाला कोई बयान नहीं है, मैं वहाँ मौजूद नहीं था, हिंसा का कोई आरोप नहीं है; बस एक वीडियो है जो 17 दिन पहले अमरावती का है। मेरा कहना है कि मैं ज़मानत का हकदार हूँ।"
शरजील इमाम की ओर से पेश वकील तालिब मुस्तफ़ा ने दलील दी कि याचिकाकर्ता पहले ही काफी समय जेल में बिता चुका है और जल्द ही ट्रायल खत्म होने की कोई संभावना नहीं है। उन्होंने कहा कि जब दूसरे आरोपियों को राहत दी गई है, तो वह फायदा शरजील को भी मिलना चाहिए।
ज़मानत याचिकाओं का विरोध करते हुए अभियोजन पक्ष के वकील ने दलील दी,
"दोनों आरोपियों की ज़मानत की अर्ज़ी पर विचार तभी हो सकता है - रोक (embargo) हटने से पहले नहीं - जब सुरक्षित गवाहों (protected witnesses) से पूछताछ हो जाए या आदेश के एक साल पूरे हो जाएँ। उन्होंने रिव्यू याचिका भी दायर की थी, जिसे खारिज कर दिया गया।"
संदर्भ के लिए, खालिद और शरजील ने सुप्रीम कोर्ट के 5 जनवरी के आदेश की समीक्षा के लिए याचिका दायर की थी, जिसे खारिज कर दिया गया था।
वकील ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निष्कर्ष कायम हैं और आज की तारीख में वह आदेश "अटल" (set in stone) है; उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई रोक के निर्देश बाध्यकारी बने हुए हैं।
वकील ने कहा,
"अगर उन्हें कोई शिकायत थी तो वे सुप्रीम कोर्ट जा सकते थे और स्पष्टीकरण मांग सकते थे कि गुलफिशा मामले के बाद ये फैसले आए हैं। सही मंच सुप्रीम कोर्ट ही था।"
उन्होंने आगे कहा कि ट्रायल कोर्ट आदेश में कुछ जोड़ नहीं सकता क्योंकि उस पर सीमाएँ (limitation) लागू थीं।
इसके बाद कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।


