दिल्ली हाईकोर्ट ने AISA अध्यक्ष नेहा बोरा की याचिका खारिज की, शांति बनाए रखने के लिए ₹10,000 का बॉन्ड भरने के नोटिस को दी थी चुनौती
Praveen Mishra
23 Oct 2026 9:56 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने ₹10,000 के निजी मुचलके और एक जमानतदार के साथ शांति बनाए रखने का बॉन्ड भरने संबंधी नोटिस को चुनौती दी थी। नेहा बोरा को 16 अक्टूबर को मंडी हाउस में विरोध-प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिया गया था।
जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने आदेश सुनाते हुए कहा कि मामले में पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं। अदालत ने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (Special Executive Magistrate) को निर्देश दिया कि जांच से संबंधित कोई भी आदेश पारित करने से पहले नेहा बोरा को सभी सामग्री उपलब्ध कराई जाए और उनकी बात पर उचित ध्यान दिया जाए।
BNSS की धाराओं के तहत जारी हुआ था नोटिस
नेहा बोरा ने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट द्वारा 17 अक्टूबर को जारी नोटिस को चुनौती दी थी। यह नोटिस भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126, धारा 130 और धारा 135(3) के तहत जारी किया गया था।
BNSS की धारा 126 के तहत, यदि मजिस्ट्रेट को ऐसी जानकारी मिलती है कि कोई व्यक्ति शांति भंग कर सकता है, तो वह उस व्यक्ति से शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने के संबंध में कारण बताने को कह सकता है।
वहीं, धारा 135(3) मजिस्ट्रेट को कुछ परिस्थितियों में जांच पूरी होने तक शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने का निर्देश देने और बॉन्ड न भरने की स्थिति में संबंधित व्यक्ति को हिरासत में रखने की शक्ति प्रदान करती है।
नेहा बोरा ने क्या दलील दी?
नेहा बोरा की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने दलील दी कि AISA नेता ने 16 अक्टूबर को शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन का आह्वान किया था और उन्होंने कभी भी हिंसा के लिए नहीं कहा।
उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र में सरकार बदलने की मांग करना गलत नहीं है। उनके अनुसार, संबंधित नोटिस बिना पर्याप्त विचार-विमर्श के यांत्रिक तरीके से जारी किया गया था।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि अंतरिम बॉन्ड भरने के लिए कहने से पहले प्रारंभिक जांच आवश्यक थी। याचिका में कहा गया कि नोटिस में ऐसी कोई ठोस सामग्री नहीं बताई गई, जिससे यह साबित हो कि नेहा बोरा से शांति भंग होने की आशंका थी।
नेहा बोरा ने नोटिस और उससे उत्पन्न कार्यवाही को रद्द करने के साथ-साथ अधिकारियों को उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने से रोकने का निर्देश देने की मांग की थी।
सरकार की ओर से क्या कहा गया?
केंद्र सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल शर्मा ने दलील दी कि धारा 126 के तहत मजिस्ट्रेट को प्राप्त जानकारी के आधार पर व्यापक विवेकाधिकार प्राप्त है। उनके अनुसार, संबंधित जानकारी का प्रत्येक पहलू आवश्यक रूप से साक्ष्य या स्थापित तथ्य के रूप में सामने आना जरूरी नहीं है, लेकिन यह स्पष्ट होना चाहिए कि कार्रवाई किस सूचना के आधार पर की गई।
उन्होंने यह भी बताया कि जिस क्षेत्र में नेहा बोरा को हिरासत में लिया गया था, वहां निषेधाज्ञा लागू थी।
क्या है पूरा मामला?
याचिका के अनुसार, नेहा बोरा ने 16 अक्टूबर को शाम 5 बजे मंडी हाउस में शांतिपूर्ण सभा का आह्वान किया था। इसका उद्देश्य मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन के तहत कनॉट प्लेस स्थित सेंट्रल पार्क में राष्ट्रीय ध्वज फहराना था।
नेहा बोरा का आरोप है कि उन्हें शाम करीब 5:30 बजे हिरासत में लिया गया, जिसके बाद पहले किसी अज्ञात स्थान पर और फिर आर.के. पुरम पुलिस स्टेशन ले जाया गया। वहां उन्हें रातभर हिरासत में रखा गया और 17 अक्टूबर को सुबह 6 बजे रिहा किया गया।
उन्हें 18 अक्टूबर को प्राप्त नोटिस में मंडी हाउस में नारेबाजी करने, जंतर-मंतर के आसपास निषेधाज्ञा लागू होने के बावजूद बार-बार विरोध-प्रदर्शन करने और 16 अक्टूबर को कनॉट प्लेस में प्रदर्शन के लिए लोगों को उकसाने के आरोपों का उल्लेख किया गया था।
नेहा बोरा ने इन कार्यवाहियों को चुनौती देते हुए कहा कि नोटिस में शांति भंग होने की आशंका स्थापित करने वाली आवश्यक सामग्री का खुलासा नहीं किया गया है।
हालांकि, दिल्ली हाईकोर्ट ने पर्याप्त सुरक्षा उपायों और विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट को दिए गए निर्देशों का उल्लेख करते हुए याचिका खारिज कर दी।

