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कोरोना की दूसरी लहर : दिल्ली हाईकोर्ट ने बड़े पैमाने पर मौत और नकारात्मक रिपोर्टिग करने से मीडिया को रोकने की मांग वाली जनहित याचिका खारिज की

LiveLaw News Network
3 May 2021 11:00 AM GMT
कोरोना की दूसरी लहर : दिल्ली हाईकोर्ट ने बड़े पैमाने पर मौत और नकारात्मक रिपोर्टिग करने से मीडिया को रोकने की मांग वाली जनहित याचिका खारिज की
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दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को उस जनहित याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें टीवी समाचार चैनलों पर ''संवेदनशील प्रकृति'' के समाचारों (जिसमें कोरोना की दूसरी लहर के मद्देनजर बड़े पैमाने पर होने वाली मौत की रिपोर्टिंग, लोगों की पीड़ाएं शामिल हैं)की रिपोर्टिंग के लिए आचार संहिता/नियमों का उद्विकास करने व लागू करने का निर्देश देने की मांग की गई थी। वहीं यह भी मांग की गई थी कि ऐसा करते समय प्रसारकों या टीवी चैनलों को नकारात्मकता, जीवन के प्रति असुरक्षा की भावना, चोट,पीड़ा, दुख, क्षति आदि को फैलाने से रोका जाए।

मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल और न्यायमूर्ति जसमीत सिंह की खंडपीठ ने जनहित याचिका को खारिज करते हुए कहा कि कोरोना महामारी से होने वाली मृत्यु की संख्या के बारे में जनता को सूचित करना नकारात्मक खबर नहीं है।

ललित वलेचा ने यह जनहित याचिका अपने अधिवक्ता आरके गोसाईं और सदफ इलियास खान के माध्यम से दायर की थी और इस बात पर प्रकाश डाला था कि कोरोना महामारी की दूसरी लहर के मद्देनजर समाचार चैनल और मीडिया ने ''नकारात्मक छवि/दृश्य/खबरों को सबसे गैरजिम्मेदार तरीके से'' से प्रसारित किया है।

याचिका में कहा गया है कि,''यह एक स्पष्ट तथ्य है कि टीवी न्यूज चैनल सातों दिन और 24 घंटे समाचार बुलेटिनों को प्रसारित कर रहे हैं और अधिकांश बार ऐसे समाचार बुलेटिन रिपिट किए गए टेलीकास्ट होते हैं। हालांकि वही नकारात्मक चित्र/दृश्य/खबरें दोहराए जाने वाले कार्यक्रमों में दिखाए जाते हैं, लेकिन यह ऐसा प्रभाव देते हैं कि जैसे यह इस समय ताजा घटनाएं होे रही हैं। जबकि वर्तमान समय में लोग घरों के अंदर बंद हैं और बार-बार न्यूज चैनल देख रहे हैं।''

यह कहते हुए कि इस तरह की रिपोर्ट को बच्चे, बूढ़े, बीमार और गंभीर रूप से बीमार, दुर्बल व्यक्तियों सहित सभी लोगों द्वारा देखा जाता है, याचिका में कहा गया है किः

''जांच व संतुलन के जरिए प्रेस की स्वतंत्रता को संतुलित करने के साथ-साथ जिम्मेदारी की भावना पैदा करने और इस स्वतंत्रता के दुरुपयोग को रोकने की भी मांग की जाती है,वो भी पत्रकारिता की स्वतंत्रता को एक बड़ी चुनौती प्रदान करने वाले ''चिलिंग इफेक्ट'' के बिना। यह मीडिया का कर्तव्य है कि नागरिकों को पर्याप्त और उचित जांच और सुरक्षा उपायों के साथ शासन की स्थिति के बारे में सूचित रखे। विशेषरूप से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जो उस मार्ग को परिभाषित कर सकता है जो उच्चतम स्तर के मानको के अनुरूप हो और मीडिया का उसके संवैधानिक कर्तव्य को पूरा करने के लिए मार्गदर्शन कर सके।''

याचिका में कहा गया है कि यह जरूरी है कि न्यूज चैनल इस बात को स्वीकार करें कि उन पर समाचारों को प्रसारित करते समय रिपोर्टिंग के उच्च मानकों,दायित्वों और नैतिकता का पालन करने के मामले में एक विशेष जिम्मेदारी है क्योंकि वे बड़े पैमाने पर जनता पर सबसे शक्तिशाली प्रभाव ड़ालते हैं।

आर्टिकल 19 के तहत भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार पूर्ण नहीं है,यह कहते हुए याचिका में कहा गया है किः

'' टीवी चैनल को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसी नकारात्मक छवियों/दृश्यों/खबरों को प्रसारित करके, वे महिमामंडन में लिप्त न हों। समाचार लेख को बड़े स्तर पर दर्शकों व नागरिकों बीच सकारात्मकता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से प्रसारित किया जाना चाहिए। यह आवश्यक है कि दर्द, भय या पीड़ा, और किसी भी तरह के आत्म-नुकसान के दृश्य या विवरण को दिखाते समय पर्याप्त सावधानी बरती जाए, ताकि वे गुड टेस्ट और शालीनता की सीमाओं को पार न करें और बड़े पैमाने पर जनता को कोई नुकसान न हो।''

याचिका में निम्नलिखित प्रार्थनाएं की गई हैंः

- परमादेश की प्रकृति में एक रिट, आदेश या निर्देश जारी किया जाए, जिसमें भारत सरकार को प्रसारकों/टीवी चैनलों के लिए संवेदनशील प्रकृति के समाचार जैसे बड़े पैमाने पर मौत की रिपोर्टिंग, लोगों द्वारा पीड़ा आदि के प्रसारण संबंध में समयबद्ध तरीके से दिशानिर्देश तैयार करने के लिए कहा जाए और प्रसारकों/टीवी चैनलों को नकारात्मकता, जीवन के प्रति असुरक्षा की भावना, चोट, पीड़ा, क्षति आदि को भावना को फैलाने से रोका जाए।

- कोई भी अन्य उपयुक्त रिट, आदेश या निर्देश को जारी करने के लिए जो माननीय न्यायालय को वर्तमान मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में उचित लगता है।

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